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वो बेअसर था मुसलसल दलील करते हुये-आलोक

वो बेअसर था मुसलसल दलील करते हुये
मैं मुतमइन था ग़ज़ल को वकील करते हुये

वो मेरे ज़ख्म को नासूर कर गये आख़िर
मैं पुरउमीद था जिनसे अपील करते हुये

अजीब ख़ाब था आँखों में ख़ून छोड़ गया
कि नींद गुज़री है मुझको ज़लील करते हुये

सबब है क्या कि मैं सैराब हूँ सरे-सहरा
जुदा हुआ था वो आँखों को झील करते हुये

मरा हुआ मैं वो किरदार हूँ कहानी का
जो जी रहा है कहानी तवील करते हुये

आलोक मिश्रा 9711744221

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6 comments on “वो बेअसर था मुसलसल दलील करते हुये-आलोक

  1. बेहतरीन ग़ज़ल एकदम आलोक जी की तरह
    इक इक अक्षर मजा हुआ है ।

    जिंदाबाद आलोक भाई

  2. खूबसूरत मतला हुआ है |
    बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है |

    अजीब ख़ाब था आँखों में ख़ून छोड़ गया
    कि नींद गुज़री है मुझको ज़लील करते हुये

    क्या बात है |
    ये शेर बहुत पसंद आया. दिली दाद ||

  3. क्या ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई है। मतला तो एकदम ज़बंजाद हो गया। क्वोटेबिलिटी भरपूर है ।’ जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो’ वाली खूबी है इसमें। हार्दिक बधाई।

  4. क्या ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई है। मतला तो एकदम ज़बंजाद हो गया। क्वोटेबिलिटी भरपूर है ।’ जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो’ वाली खूबी है इसमें। हार्दिक बधाई।

  5. pyaare donon ghazalen zabardast hain… har she’r bharpoor hua hai…

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