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T-20/54 रुख़ हवा का भी ख़रीदार संभाले हुए हैं-नकुल गौतम

रुख़ हवा का भी ख़रीदार संभाले हुए हैं
इश्तिहारों ने ही अख़बार संभाले हुए हैं

हर तरफ़ फैल रही है जो वबा लालच की
अब तबीबों ने भी बाज़ार संभाले हुए हैं

कर रही है ये बयानात का सौदा खुल के
ये अदालत भी गुनहगार संभाले हुए हैं

आप का हुस्न तो परवाने बयां करते हैं
आइना आप ये बेकार संभाले हुए हैं

अब वसीयत ही अयादत का सबब हो शायद
हम नगीने जो चमकदार संभाले हुए हैं

आप कह दें तो हक़ीक़त भी बने अफ़साना
आप की बात तरफदार संभाले हुए हैं

पासबां लूट रहे हैं ये ख़ज़ाने मिल कर
मयकदे आज तलबगार संभाले हुए हैं

कोशिशें आप करें लाख गिराने की घर
हम तो हर हाल में दीवार संभाले हुए हैं

क्या बढ़ाएंगे मिरा दर्द मुख़ालिफ़ मेरे
काम मेरा ये मेरे यार संभाले हुए हैं

बेड़ियां तोड़ रहे हैं ये बदलते रिश्ते
“आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

नकुल गौतम 9819057645

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7 comments on “T-20/54 रुख़ हवा का भी ख़रीदार संभाले हुए हैं-नकुल गौतम

  1. नकुल भाई

    रुख़ हवा का भी ख़रीदार संभाले हुए हैं
    इश्तिहारों ने ही अख़बार संभाले हुए हैं
    मीडिया का आज का सच तो वाकई यही है !!

    आप का हुस्न तो परवाने बयां करते हैं
    आइना आप ये बेकार संभाले हुए हैं
    वाह तारीफ़ का एक नया अंदाज़

    कोशिशें आप करें लाख गिराने की घर
    हम तो हर हाल में दीवार संभाले हुए हैं
    ऐसी कोशिशें हमेशा कामयाब होती हैं

    क्या बढ़ाएंगे मिरा दर्द मुख़ालिफ़ मेरे
    काम मेरा ये मेरे यार संभाले हुए हैं
    पुरानी बात मगर अंदाज़ हटकर है वाह !!

  2. नकुल भाई ,आपको फ़ोन करके इस ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद देना चाहता था लेकिन आपका मोबाईल नम्बर ही नहीं मिला। अगर संभव हो तो आप मुझे बताएं , मेरा मोबाइल नम्बर 9860211911 है।

    नीरज

    • आदरणीय नीरज
      तहे दिल से आपका शुक्रिया |
      मेरे पास आपको शुक्रिया कहने के लिया अलफ़ाज़ नहीं हैं |

      आपने मेरी ग़ज़ल पढ़ ली यही काफी है मेरे लिए|

      Mera phone number 919819057645

  3. आप का हुस्न तो परवाने बयां करते हैं
    आइना आप ये बेकार संभाले हुए हैं

    बेड़ियां तोड़ रहे हैं ये बदलते रिश्ते
    “आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

    नकुल साहब आपको बहुत नहीं पढ़ा लेकिन आपकी ग़ज़ल पढ़ कर आँखें चौंधिया गयीं , मुझे बताएं आपको और कहाँ और कैसे पढ़ा जा सकता है। ये दो शेर आपने कहे नहीं हैं ये आप पर ऊपर वाले ने उतारे हैं। अए हए कलेजा निकाल के रख दिया। भाई ,तारीफ़ के लायक मेरे पास मुकम्मल अलफ़ाज़ नहीं हैं इसलिए थोड़े में ज्यादा समझें और मेरी दिली दाद कबूल करें।

  4. ये तो आइना भी है और शीशा भी !! बेहिचक कह सकता हूँ कि सबसे अधिक मुझे इस तरही मे इस गज़ल ने चौंकाया भी और प्रभावित भी किया !! एक पर्फेक्शन जो बरसों के रियाज़ के बाद भी नहीं मिलता –वो इस गज़ल मे दिखाई दे रहा है और ये इत्तेफाक नही है – सितारो से आगे जहाँ और भी हैं !!! और ये गज़ल उसी जहान तक पहुंच रही है !! सादगी और पुरकारी( अरूज़ ए फिक्रे फन की) दोनो भरपूर हैं बयान मे !! नकुल गौतम साहब !! इस कमाल के लिये दाद !!!
    रुख़ हवा का भी ख़रीदार संभाले हुए हैं
    इश्तिहारों ने ही अख़बार संभाले हुए हैं
    ये इस आबशार की रवानी की इब्तिदा है जिसे हम नकुल गौतम की ग़ज़ल के नाम से पढना शुरू कर रहे हैं !!! बहुत सटीक और बहुत सच्चा मतला !!! अव्वल मिसरे की गढन तो कया कहने !!
    हर तरफ़ फैल रही है जो वबा लालच की
    अब तबीबों ने भी बाज़ार संभाले हुए हैं
    इस शेर का भी जवाब नही अल्फाज़ का सटीक इस्तेमाल देखते बनता है!!!
    कर रही है ये बयानात का सौदा खुल के
    ये अदालत भी गुनहगार संभाले हुए हैं
    क्या बात है भई !!
    आप का हुस्न तो परवाने बयां करते हैं
    आइना आप ये बेकार संभाले हुए हैं
    अह्ह अहह !!! ये गज़ल तो मुझसे गूँगे को गुड हो गई !! आप का हुस्न तो परवाने बयां करते हैं…. ये मिसरा कहने पर पहले दाद !! शेर पर हाथ पिराने तक तालियाँ !!
    अब वसीयत ही अयादत का सबब हो शायद
    हम नगीने जो चमकदार संभाले हुए हैं
    और तो तीमारदारी नही ही करता कोई अब !! लेकिन अब वसीयत ही अयादत का सबब हो शायद … एक विडम्बना है हमारे युग की कि अपने रिश्ते भी पैसों पर ही परवरिश और अयादत पाते हैं !!! कोई शक नही विचार पर –लेकिन शेर कितना साफ सुन्दर और संश्लिष्ट धंग से कहा गया है ये देखने लायक है !!
    आप कह दें तो हक़ीक़त भी बने अफ़साना
    आप की बात तरफदार संभाले हुए हैं
    फिर बेहद आसानी से बेहद गहरी बात !!! लफ़्ज़ चमक्ने लगते हैं आपके ख्याल के पैकर मे आ कर !!
    पासबां लूट रहे हैं ये ख़ज़ाने मिल कर
    मयकदे आज तलबगार संभाले हुए हैं
    जब कि मैकदे रिन्दों की नशिस्त हुआ करते थे अगले वक्तों मे !! तस्लीम !!
    कोशिशें आप करें लाख गिराने की घर
    हम तो हर हाल में दीवार संभाले हुए हैं
    दीवार सम्हालने पर और भी शेर कहे गये लेकिन ये शेर खूब है !!
    क्या बढ़ाएंगे मिरा दर्द मुख़ालिफ़ मेरे
    काम मेरा ये मेरे यार संभाले हुए हैं
    पुराना ख्याल लेकिन इज़हार की पुख्तगी को फिर से दाद !!
    बेड़ियां तोड़ रहे हैं ये बदलते रिश्ते
    “आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”
    नकुल गौतम साहब !! मैं सोच रहा हूँ कि अब शेर कहना छोड कर आपको पढना शुरूअ कर दूँ –फायदे मे रहूँगा –मयंक

    • आदरणीय मयंक जी

      तहे दिल से आपका शुक्रिया|
      आपने जो कुछ इस ग़ज़ल के बारे में कहा, आपका बड़प्पन है |
      कोशिश करूँगा की आप को कभी मायूस न करूँ|

      Nakul Gautam – 9819057645

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