9 Comments

T-20/53 दर्दो-वहशत का इक अंबार संभाले हुए हैं-मुमताज़ नाज़ां

दर्दो-वहशत का इक अंबार संभाले हुए हैं
कितने ग़म हैं, कि यूँ ही यार संभाले हुए हैं

तेरी गुफ़्तार, तेरा लुत्फ़, तेरा ग़म, तेरी याद
कितनी चीज़ें हैं कि बेकार संभाले हुए हैं

दौरे-सरमाया में बिकते हुए नाकाम उसूल
सर पे कब से ये गराँ बार संभाले हुए हैं

इनमें आबाद हैं टूटे हुए कुछ ख़्वाब, तो यूँ
अपने माज़ी के सब आसार संभाले हुए हैं

रखना पड़ता है अना का भी भरम तो आख़िर
सो गरेबाँ का हर इक तार संभाले हुए हैं

तेरे दीदार की उम्मीद में कब से जानां
चंद साँसें तिरे बीमार संभाले हुए हैं

तोड़ डाला है क़फ़स जोशे-जुनूँ में हम ने
“आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

रूह “मुमताज़” शिकस्ता है, बदन भी शल है
हम ये गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

मुमताज़ नाज़ां 09867641102

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

9 comments on “T-20/53 दर्दो-वहशत का इक अंबार संभाले हुए हैं-मुमताज़ नाज़ां

  1. Behad umdaa ghazal hai Muhtarma..waah waahhh…sare she’r khoob pasand aaye ..dher sari daad..
    -kanha

  2. क्या खूब गज़ल हुई है, सिधे दिल पर असर करती हुई, दाद कबूल करें….

  3. सब से पहले तो इतनी देर से जवाब देने के लिए आप सब से माज़रत ख़्वाँ हूँ। क्या करूँ, वक़्त नहीं मिला। सज्जन धर्मेन्द्र जी, बहोत शुक्रिया। अनिल जलालपुरी जी, आप को ग़ज़ल पसंद आई, बेहद मशकूर हूँ। पवन कुमार जी, सताइश के लिए तह ए दिल से मशकूर हूँ, नीरज1950 (ये 1950 क्या हुआ भला) इतनी बेशुमार दाद से नवाज़ने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। मयंक अवस्थी जी, आप की बेपनाह दाद ओ तहसीन के लिए मैं दिल की अमीक़ गहराइयों से ममनून ओ मशकूर हूँ। हौसला अफ़ज़ाई के लिए आप सब का बहुत बहुत शुक्रिया।

  4. बहुत खूब मुमताज जी, दाद कुबूल करें

  5. jawaab shaam ko dungi insha Allah

  6. Lajawab behatreen shaandar

  7. मुमताज़ साहिबा

    तेरी गुफ़्तार, तेरा लुत्फ़, तेरा ग़म, तेरी याद
    कितनी चीज़ें हैं कि बेकार संभाले हुए हैं
    ग़ज़ल शायद इसी एहसास का नाम है !

    तोड़ डाला है क़फ़स जोशे-जुनूँ में हम ने
    “आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”
    बेहतरीन गिरह

    रूह “मुमताज़” शिकस्ता है, बदन भी शल है
    हम ये गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं
    इस शेर पर खास दाद क़ुबूल करें !

  8. दर्दो-वहशत का इक अंबार संभाले हुए हैं
    कितने ग़म हैं, कि यूँ ही यार संभाले हुए हैं

    रखना पड़ता है अना का भी भरम तो आख़िर
    सो गरेबाँ का हर इक तार संभाले हुए हैं

    तोड़ डाला है क़फ़स जोशे-जुनूँ में हम ने
    “आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

    बेहतरीन शेर और लाजवाब गिरह से सजी आपकी इस ग़ज़ल की जितनी तारीफ़ की जाय कम है। मेरी दिली दाद कबूल करें।

  9. दर्दो-वहशत का इक अंबार संभाले हुए हैं
    कितने ग़म हैं, कि यूँ ही यार संभाले हुए हैं
    अव्वल मिस्रा ही एक मुकम्मल बयान है !! और सानी मिसरा अर्थ को एक दिल्चस्प ट्विस्त दे रहा है ” यूँ ही”” के बेहतरीन इस्तेमाल से !! वाह !!
    तेरी गुफ़्तार, तेरा लुत्फ़, तेरा ग़म, तेरी याद
    कितनी चीज़ें हैं कि बेकार संभाले हुए हैं
    तर्क ए ताल्लुक की पैरवी है जो अगले वक्त की शाइरा मे कमतर थी –लेकिन पहले अदा ज़ाफरी बाद मे परवीन ने बयानो को हौसले दिये और अब इज़हारे –इश्क की साफगोई परवान चढ रही है –”बेकार सम्हाले हुये हैं मे बात है !!!
    दौरे-सरमाया में बिकते हुए नाकाम उसूल
    सर पे कब से ये गराँ बार संभाले हुए हैं
    बेच दे अपनी अना अपना जिगर अपने उसूल
    तेरे हाथों मे भी सोने के निवाले होंगे
    तिजारत के इस दौर मे सब कुछ बिकता है !!!
    इनमें आबाद हैं टूटे हुए कुछ ख़्वाब, तो यूँ
    अपने माज़ी के सब आसार संभाले हुए हैं
    ख़्वाबो की किर्चियाँ लहूरंग नही होती –श्फ्फ़ाफ होती हैं –सिर्फ गालिब का घराना देख सकता है इनका रंग और कह सकता है कि –जो आँख से ही न टपका तो फिर लहू क्या है !!
    रखना पड़ता है अना का भी भरम तो आख़िर
    सो गरेबाँ का हर इक तार संभाले हुए हैं
    बहुत खूब !! रिवायत के सरमाये मे इज़ाफा होता है ऐसे अशार से !!!
    तेरे दीदार की उम्मीद में कब से जानां
    चंद साँसें तिरे बीमार संभाले हुए हैं
    अगर कुछ थी तो बस ये थी तमन्ना आखिरी अपनी
    कि तुम साहिल पे होते और कश्ती डूबती अपनी
    तोड़ डाला है क़फ़स जोशे-जुनूँ में हम ने
    “आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”
    बहुत खूबसूरत !! बहुत खूबसूरत गिरह बेहद रवाँ और शायद मूल शेर से बेहतर होगा ये शेर !!!
    रूह “मुमताज़” शिकस्ता है, बदन भी शल है
    हम ये गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं
    यहाँ शीराजा बिखर रहा है लेकिन उडने से पेश्तर जो रंग है उसमे एक अराजक सौन्दर्य है जिसे मौसिकी के घराने वाले ही देखते और जानते हैं !!
    मुहतरमा !!! आपकी गज़ल बेहद खूबसूरत है – मयंक

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: