7 टिप्पणियाँ

T-20/52 इनको छूना न ख़बरदार संभाले हुए हैं,दिनेश कुमार स्वामी “शबाब” मेरठी

इनको छूना न ख़बरदार संभाले हुए हैं
अब ये दरवाज़े ही दीवार संभाले हुए हैं

हाय वो आँखें, वो रुख़सार, वो सीने की उठान
इक बदन में कई तलवार संभाले हुए हैं

कितनी सदियों से अजंता के ये बुत देखो तो
लब पे ख़ामोशी की गुफ़्तार संभाले हुए हैं

ज़िंदा रहने को ज़रूरी हैं बहुत सी चीज़ें
आप बस सांसों की रफ़्तार संभाले हुए हैं

जंग के बाद ही खाई में लगायेंगे शजर
हम अभी हाथों में तलवार संभाले हुए हैं

रौशनी थक चुकी तारीकी से लड़ते-लड़ते
हम चराग़ों को तो बेकार संभाले हुए हैं

रो पड़े लोग लतीफ़े जो सुनाये मैंने
ये भी शायद मिरे आज़ार संभाले हुए हैं

इस हुनर ने ही मिरे ज़िंदा रखा है अब तक
मेरे ग़म को मिरे अशआर संभाले हुए हैं

ज़िन्दगी तेरी उदासी की सड़क लम्बी है
और तलवों को मिरे ख़ार संभाले हुए हैं

अब भी रौशन है घनी धूप से यादों की गली
अब भी आँखें तिरे दीदार संभाले हुए हैं

रेत से जूझ रही हैं ये शिकस्ता नावें
और हम हाथों में पतवार संभाले हुए हैं

सारी दुनिया में है ये जंग उन्हीं की ख़ातिर
वो जो हथियार का बाज़ार संभाले हुए हैं

दिनेश कुमार स्वामी “शबाब” मेरठी 09997220102

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7 comments on “T-20/52 इनको छूना न ख़बरदार संभाले हुए हैं,दिनेश कुमार स्वामी “शबाब” मेरठी

  1. बहुत खूब शबाब साहब, अच्छी ग़ज़ल हुई है। दिली दाद कुबूल कीजिए

  2. हुज़ूर साहिब

    हाय वो आँखें, वो रुख़सार, वो सीने की उठान
    इक बदन में कई तलवार संभाले हुए हैं
    रवायती तेवर संभाले हुए शेर !!

    ज़िंदा रहने को ज़रूरी हैं बहुत सी चीज़ें
    आप बस सांसों की रफ़्तार संभाले हुए हैं
    जिन्दा रहना सिर्फ साँसों के बस की बात नहीं

    ज़िन्दगी तेरी उदासी की सड़क लम्बी है
    और तलवों को मिरे ख़ार संभाले हुए हैं
    जबरदस्त शेर दाद क़ुबूल करें साहब

  3. रो पड़े लोग लतीफ़े जो सुनाये मैंने…..,
    ज़िन्दगी तेरी उदासी की सड़क लम्बी है…
    रेत से जूझ रही हैं ये शिकस्ता नावें…..

    और कहने को क्या रह गया शबाब साहब,क्या ही उम्दा ग़ज़ल हुई है
    पूरी की पूरी ग़ज़ल ही निहायत खूबसूरत है
    सभी अशआर लाज़वाब हैं
    ढेर सारी दाद

    प्रणाम सहित
    आलोक मिश्रा

  4. इनको छूना न ख़बरदार संभाले हुए हैं
    अब ये दरवाज़े ही दीवार संभाले हुए हैं
    अह्हह्ह ??!! शबाब साहब !! हाय !!! कहाँ थे सरकार !! अभी तक ??!! –जबी मैं कहूँ कि गज़लो की हाफ सेंचुरी हो जाने के बाद भी महफिल मे शबाब उमीद से कम क्यों है !! अब कमी पूरी हो गई !!
    दरवाज़े तो दीवार के ख़ादिम होते हैं –लेकिन अब दीवार का वज़ूद खतरे मे है !! गर दरवाज़े दीवार की अज़मत का ख्याल न करें तो दीवार हाथ के धक्के से गिर जायेगी –ये है आज की दीवारों की सचाई !! वह वाह !! क्या बात है क्या शेर कहा है !!
    हाय वो आँखें, वो रुख़सार, वो सीने की उठान
    इक बदन में कई तलवार संभाले हुए हैं
    घायल हो गये हम ये शेर पढ कर !!!
    कितनी सदियों से अजंता के ये बुत देखो तो
    लब पे ख़ामोशी की गुफ़्तार संभाले हुए हैं
    जी सर !! इतनी खूबसूरती से तो नही जितनी खूबसूरती से आपने कहा है –लेकिन इस ख्याल को महाकवि जयशंकर प्साद जे ने अपने खण्ड काव्य आँसू मे यूँ ज़रूर कहा है — मुख सिये झेलती अपनी , अभिशाप ताप ज्वालाये
    देखी अतीत के युग से चिर मौन शैल मालाये –प्रसाद !!
    ज़िंदा रहने को ज़रूरी हैं बहुत सी चीज़ें
    आप बस सांसों की रफ़्तार संभाले हुए हैं
    इस शेर के जवाब मे दलील है मेरे पास !! —
    मैं वो पत्थर हूँ जिसमे मुद्दत से
    साँस आती है , साँस जाती है –मयंक
    जंग के बाद ही खाई में लगायेंगे शजर
    हम अभी हाथों में तलवार संभाले हुए हैं
    तारीख़ गवाह है कि अभी तक मानव जाति मे 6000 युद्ध हो चुके हैं –लेकिन इतिहास से मैने यहीं सीखा है कि आदमी इतिहास से कुछ नहीं सीखता !!
    रौशनी थक चुकी तारीकी से लड़ते-लड़ते
    हम चराग़ों को तो बेकार संभाले हुए हैं
    शबाब साहब शेर का शिल्प आपका है इस्लिये ज़िन्दाबाद –लेकिन ये विचार आपके हवाले से ??!! आप तो योद्धा हैं !! कामरेड हैं !! फिर आपके युयुत्सु को ताबिन्दा रहना चाहिये न!!
    क्यों रो रहे हो राह के अन्धे चराग़ को
    क्या बुझ गया हवा से लहू का शरार भी –शिकेब
    रो पड़े लोग लतीफ़े जो सुनाये मैंने
    ये भी शायद मिरे आज़ार संभाले हुए हैं
    पहले आती थी हाले दिल पे हंसी
    अब किसी बात पर नही आती !!-गालिब
    देख कर मुझको खुशी अब छुप गई जाने किधर
    किस तरह रिश्ता बना ले एक अनजाने के साथ –मयंक
    इस हुनर ने ही मिरे ज़िंदा रखा है अब तक
    मेरे ग़म को मिरे अशआर संभाले हुए हैं
    जी सर !! जी सर !!हमने भी जिजाजी है इस ख्याल को अब आपके शेर ने तस्दीक़ कर दी तो खुद पर फख़्र महसूस हो रहा है—मेरे आँसू मेरे अश आर सम्हाले हुये हैं // मेरे बच्चे मेरा संसार सम्हाले हुये हैं !!!
    ज़िन्दगी तेरी उदासी की सड़क लम्बी है
    और तलवों को मिरे ख़ार संभाले हुए हैं
    क्या बात है !! क्या बात है !! आपकी ज़ंजीर मे तो काँटे लगे हैं !1 बहुत खूब शबाब साहब –दिल जीत लिया इस शेर ने !! बेहतरीन कहा है बेहतरीन !!!
    अब भी रौशन है घनी धूप से यादों की गली
    अब भी आँखें तिरे दीदार संभाले हुए हैं
    मुहब्बत, माजी, मैं और मेरी तनहाई !! बहुत खूब कहाँ है !!!
    रेत से जूझ रही हैं ये शिकस्ता नावें
    और हम हाथों में पतवार संभाले हुए हैं
    आखिर क्यों हम आपके मुरीद हैं साहब !!! क्या कमाल का शेर कहाँ है !!! और एक बात यहाँ बता दूँ आपको –आपने ऐसे ऐसे शेर ऐसी ऐसी ज़मीनो पर कह दिये हैं कि यकीनन आपने रेत पर नाव चला दी है !!
    सारी दुनिया में है ये जंग उन्हीं की ख़ातिर
    वो जो हथियार का बाज़ार संभाले हुए हैं
    सच है !1 इसी कैपिटलिस्ट सिस्टम की उपज है ये सारा फसाद !! ईराक -लीबिया –मिस्र-अफगानिस्तान सब जगह इनके बरपाये हुये कहर ने ही इनके हथियारों के बाज़ार को चमका रखा है !!कौन नही जनता कि हथियारोन के सौदागर कौन हैं !!
    “शबाब” मेरठी साहब !! अब जा के मैं सैराब हुआ !! सादर –मयंक

  5. जब पूरी ग़ज़ल असरदार हो तो उसमें एक आध शेर अलग से छांटना बहुत मुश्किल काम होता है। इस मुकम्मल ग़ज़ल के लिए शबाब साहब आपकी जितनी तारीफ़ की जाय कम है। मैं इसे इस तरही की चंद बेहतरीन ग़ज़लों में शुमार करता हूँ। मेरी दिली दाद कबूल करें।

  6. इनको छूना न ख़बरदार संभाले हुए हैं
    अब ये दरवाज़े ही दीवार संभाले हुए हैं

    वाह, कमाल का मतला कह दिया है साहब,

    ज़िन्दगी तेरी उदासी की सड़क लम्बी है
    और तलवों को मिरे ख़ार संभाले हुए हैं

    और यह शेर क्या बात है…

    इस हुनर ने ही मिरे ज़िंदा रखा है अब तक
    मेरे ग़म को मिरे अशआर संभाले हुए हैं

    अब इस पर क्या कहने …

    ……
    ….
    ….
    ..
    नमन करता हूँ….

  7. pranam shabab sahab … yun to poori ghazal behad umda hai… lekin aakhir ke ye do sher jaaanleva hain… waah

    रेत से जूझ रही हैं ये शिकस्ता नावें
    और हम हाथों में पतवार संभाले हुए हैं

    सारी दुनिया में है ये जंग उन्हीं की ख़ातिर
    वो जो हथियार का बाज़ार संभाले हुए हैं

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