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T-20/51 आज भी अज़मते-किरदार संभाले हुए हैं-असलम इलाहाबादी

आज भी अज़मते-किरदार संभाले हुए हैं
तेज़ आंधी में भी दस्तार संभाले हुए हैं

कुछ तिरे लोग भी करते हैं तिरा ज़िक्र बहुत
कुछ तिरी साख को अख़बार संभाले हुए हैं

किसकी हिम्मत है इधर आँख उठा कर देखे
इस इलाक़े को तो सरकार संभाले हुए हैं

अहले-सरवत तो निकलते ही नहीं हैं घर से
शहर को मुफ़्लिसो-नादार संभाले हुए हैं

सूखे पत्तों की तरह कब का बिखर जाता मैं
मेरे बच्चे मिरा पिन्दार संभाले हुए हैं

अपनी आँखों में भरे अश्क किया करते हैं ज़िक्र
उसकी रहमत को गुनहगार संभाले हुए हैं

वहां कुछ फ़ैज़ मसीहा से मसीहा को नहीं
यहाँ बीमार को बीमार संभाले हुए हैं

दो क़दम तुमसे चला जाता नहीं है लोगो
हम यहाँ वक़्त की रफ़्तार संभाले हुए हैं

असलम इलाहाबादी 09919306515

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3 comments on “T-20/51 आज भी अज़मते-किरदार संभाले हुए हैं-असलम इलाहाबादी

  1. बहुत खूब असलम साहब, अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल कीजिए

  2. आज भी अज़मते-किरदार संभाले हुए हैं
    तेज़ आंधी में भी दस्तार संभाले हुए हैं
    अना का पैरोकार शेर है !!! मतला अच्छा है !!
    कुछ तिरे लोग भी करते हैं तिरा ज़िक्र बहुत
    कुछ तिरी साख को अख़बार संभाले हुए हैं
    ये मीडिया मैनेजमेण्ट है !! लेकिन ईर्ष्या की बात नही !! ये फलक सबके लिये खुला है –उडेगा वही जिसमे कुव्वते परवाज़ होगी !!!
    किसकी हिम्मत है इधर आँख उठा कर देखे
    इस इलाक़े को तो सरकार संभाले हुए हैं
    सरकार लफज़ मे तंज़ है !!!!
    अहले-सरवत तो निकलते ही नहीं हैं घर से
    शहर को मुफ़्लिसो-नादार संभाले हुए हैं
    अमीरे शहर का रिश्ते मे कोई कुछ नही लगता
    गरीबी चाँद को भी अपना मामा मान लेती है-मु रा
    सूखे पत्तों की तरह कब का बिखर जाता मैं
    मेरे बच्चे मिरा पिन्दार संभाले हुए हैं
    मुबारक हो मुहत्तरम !! मेरा अहसास अपने बच्चो से जो है वो इससे जुदा है !!!
    अपनी आँखों में भरे अश्क किया करते हैं ज़िक्र
    उसकी रहमत को गुनहगार संभाले हुए हैं
    शिकवा के बाद जवाब ए शिकवा भी कहा था अल्लामा साहब ने उसमे जवाब है इस शेर का !!!
    वहां कुछ फ़ैज़ मसीहा से मसीहा को नहीं
    यहाँ बीमार को बीमार संभाले हुए हैं
    मैं कम्नज़र हूँ इसलिये नस्र करने पर भी अव्वल मिसरे का मफ्हूम मुझसे पर नही खुल (वहाँ -?!! –कहाँ ??!!) सानी खूब है !!
    दो क़दम तुमसे चला जाता नहीं है लोगो
    हम यहाँ वक़्त की रफ़्तार संभाले हुए हैं
    करोडो हो के भी तुम लोग घुटने टेक देते हो
    मुझे वो तीन सौ तेरह का लश्कर याद आता है
    असलम इलाहाबादी साहब !! मुबारक बाद कुबूल कीजिये !! –मयंक

  3. कुछ तिरे लोग भी करते हैं तिरा ज़िक्र बहुत
    कुछ तिरी साख को अख़बार संभाले हुए हैं

    सूखे पत्तों की तरह कब का बिखर जाता मैं
    मेरे बच्चे मिरा पिन्दार संभाले हुए हैं

    वहां कुछ फ़ैज़ मसीहा से मसीहा को नहीं
    यहाँ बीमार को बीमार संभाले हुए हैं

    अहह हा क्या खूबसूरत ग़ज़ल हुई है – सुभान अल्लाह। सभी शेर लाजवाब हैं। दिली दाद कबूलें असलम साहब।

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