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T-20/50 कितनी मुश्किल से ये आज़ार संभाले हुए हैं-मनीष शुक्ल

कितनी मुश्किल से ये आज़ार संभाले हुए हैं
लड़खड़ाती हुई गुफ़्तार संभाले हुए हैं

अब तो आवाज़ बिखरने सी लगी है अपनी
फिर भी हम क़ूवते-इज़हार संभाले हुए हैं

बदहवासी में गुज़र जाते कभी के हद से
आबले पांव के रफ़्तार संभाले हुए हैं

ख़ुद को होने न दिया ठीक किसी भी सूरत
अब तलक हम तिरा पिन्दार संभाले हुए हैं

और कुछ ज़ह्न में आये भी तो कैसे आये
हम तिरी याद का अम्बार संभाले हुए हैं

हम तो मिस्मार हुए कबके बदन में अपने
हमको अहबाब ये बेकार संभाले हुए हैं

अब वो पहली सी मुहब्बत तो नहीं है फिर भी
हम तिरे इश्क़ का पिन्दार संभाले हुए हैं

इक मसीहा का भरम रखने की ख़ातिर अब तक
ख़ुद को तदबीर से बीमार संभाले हुए हैं।

मनीष शुक्ल 09415101115

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7 comments on “T-20/50 कितनी मुश्किल से ये आज़ार संभाले हुए हैं-मनीष शुक्ल

  1. Behad umdaa ghazal hui hai Manish ji..sare she’r khoob pasand aaye..waahh..daad qubule’n
    -Kanha

  2. bahut bahut shukria mayank awasthi sahab…zarranawazion ka shukria

  3. कितनी मुश्किल से ये आज़ार संभाले हुए हैं
    लड़खड़ाती हुई गुफ़्तार संभाले हुए हैं
    लडखडाती हुई गुफ़्तार ??!!! – दौरे हाज़िर मे राब्ते घायल हैं !!!–चेतना श्लथ है !! अहसास लहूरंग है और इसलिये किसी भी संवाद का सेतु दरका हुआ है !! तअल्लुक या सरोकार चाहे व्यक्ति वय्क्ति के बीच हों व्यक्ति समाज के बीच हों – समाज की विभिन्न इकाइयों के बीच हों लेकिन सभी जगह यकीन अब वसवसे की ज़द मे है –इसलिये इस मतले पर भरपूर दाद !! इसमे ज़बर्दस्त नावेल्टी है !!
    अब तो आवाज़ बिखरने सी लगी है अपनी
    फिर भी हम क़ूवते-इज़हार संभाले हुए हैं
    ये मतले के ख्याल से ही उपजा दूसरा शेर है जिसने ऊपर के शेर के विचार को और पुष्ट किया है !!!
    बदहवासी में गुज़र जाते कभी के हद से
    आबले पांव के रफ़्तार संभाले हुए हैं
    सुन्दर है !! आबले अनुभव हैं सफर के और मुहब्बत की रहगुज़र पर तो ये हासिल होते है जीस्त के !! इसलिये कही हम हद से न गुज़र जायें इसका ध्यान आबले रखते हैं !!!
    ख़ुद को होने न दिया ठीक किसी भी सूरत
    अब तलक हम तिरा पिन्दार संभाले हुए हैं
    इस शेर मे मुहब्बत और समर्पण का अच्छा रंग है !!!!
    और कुछ ज़ह्न में आये भी तो कैसे आये
    हम तिरी याद का अम्बार संभाले हुए हैं
    मिलन का नाम मत लो , मुझको विरह मे चूर रहने दो –(महादेवी वर्मा) जैसी बात है ….
    हम तो मिस्मार हुए कबके बदन में अपने
    हमको अहबाब ये बेकार संभाले हुए हैं
    खडी है दर पे अजल और मुझमे जान नही
    कहो वो देर से आई है , अपने घर जाये !!
    अब वो पहली सी मुहब्बत तो नहीं है फिर भी
    हम तिरे इश्क़ का पिन्दार संभाले हुए हैं
    4थे शेर जैसा ही ख्याल है ये भी !!!
    इक मसीहा का भरम रखने की ख़ातिर अब तक
    ख़ुद को तदबीर से बीमार संभाले हुए हैं
    हासिले ग़ज़ल शेर है !!!! ऐसा सामाजिक इकाइयों मे अक्सर होता है !!
    मनीष भाई !! देर से अपकी ग़ज़ल की आमद हुई लेकिन आपके उपस्थिति सुखमय लगी !!! –मयंक

  4. इक मसीहा का भरम रखने की ख़ातिर अब तक
    ख़ुद को तदबीर से बीमार संभाले हुए हैं

    Bahut khoob…behtariin ghazal. Daad kabool karen .

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