8 टिप्पणियाँ

T-20/46 जो मिरी सोच का मेयार संभाले हुए हैं-भुवन निस्तेज

जो मिरी सोच का मेयार संभाले हुए हैं
वो तो ख़ुद में कई किरदार संभाले हुए हैं

बड़ी ख़ूबी से जो बाज़ार संभाले हुए हैं
आज वो देश की सरकार संभाले हुए हैं

अब सुख़न को है किया जिनके हवाले हमनें
वो तो इस पार से उस पार संभाले हुए हैं

ग़ौर से सुनिये नया राग, हवा लायी है
‘आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’

हुस्न का सानी हो पर्वत के सिवा क्या जिसका
वादियाँ सोलहों श्रृंगार संभाले हुए हैं

दिन जो इन्साफ़ का आयेगा खुलेगा पर्दा
ख़ुद में हम कितने गुनहगार संभाले हुए हैं

तू जो रुसवा हो तो प्यासे वो मरेंगे साकी
जो तिरी हसरते-दीदार संभाले हुए हैं

दर्द बढ़ जाये मज़ा और बढे जीने का
हम जो ज़ख़्मों में तिरा प्यार संभाले हुए हैं

अश्क मोती हैं, सजावट हैं मिरी आँखों की
आप कहते हैं,”ये बेकार संभाले हुए हैं”

आज ‘निस्तेज’ हुये हैं वो चमन में आकर
जो हमेशा से ही दो-चार संभाले हुए हैं

भुवन निस्तेज- नेपाल

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8 comments on “T-20/46 जो मिरी सोच का मेयार संभाले हुए हैं-भुवन निस्तेज

  1. अश्क मोती हैं, सजावट हैं मिरी आँखों की
    आप कहते हैं,”ये बेकार संभाले हुए हैं”।।

    वाह् , क्या कहने ! कोई क्या जाने कि लोग क्योँकर यह बोझ ढो लेते हैँ !

  2. बहुत खूब भुवन साहब। खूबसूरत अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल कीजिए

  3. भुवन साहब
    अच्छी ग़ज़ल और गिरह काफी उम्दा

    ग़ौर से सुनिये नया राग, हवा लायी है
    ‘आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’

  4. अश्क मोती हैं, सजावट हैं मिरी आँखों की
    आप कहते हैं,”ये बेकार संभाले हुए हैं”

    भुवन साहब को पहली बार पढ़ने का मौका मिला है। उनकी सोच और कहन का अंदाज़ प्रभावशाली है। उन्हें ढेरों दाद।

  5. जो मिरी सोच का मेयार संभाले हुए हैं
    वो तो ख़ुद में कई किरदार संभाले हुए हैं
    तनकीदकार कई चेहरे रखते हैं !! शाइर की आर्थिक सामाजिक हैसियत के हिसाब से उनकी नज़र बदलती है –लेकिन मेयार की ये कसौटी कतई नही होती !! सिर्फ और सिर्फ शाइर का बयान कसौटी होता है !! भुवन जे !! मतले पर आपको दाद !!
    बड़ी ख़ूबी से जो बाज़ार संभाले हुए हैं
    आज वो देश की सरकार संभाले हुए हैं
    बेशक !!
    अब सुख़न को है किया जिनके हवाले हमनें
    वो तो इस पार से उस पार संभाले हुए हैं
    बधाई आपको!! बयान की रसाई दूर दूर तक होनी चाहिये और क्या चाहिये !!!
    ग़ौर से सुनिये नया राग, हवा लायी है
    ‘आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’
    अच्छी गिरह है !!!
    दिन जो इन्साफ़ का आयेगा खुलेगा पर्दा
    ख़ुद में हम कितने गुनहगार संभाले हुए हैं
    वक्त सौ मुंसिफो का मुंसिफ है
    वक्त आयेगा इंतज़ार करो –बशीर !!!
    तू जो रुसवा हो तो प्यासे वो मरेंगे साकी
    जो तिरी हसरते-दीदार संभाले हुए हैं
    न भी रुसवा हो तो भी सैराब होने के आसार कम है क्योंकि — सबकी साकी पे नज़र हो ये ज़रूरी है मगर
    सबपे साकी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नही !!
    दर्द बढ़ जाये मज़ा और बढे जीने का
    हम जो ज़ख़्मों में तिरा प्यार संभाले हुए हैं
    दर्द के दवा बनने तक इंतज़ार करना है !!!
    अश्क मोती हैं, सजावट हैं मिरी आँखों की
    आप कहते हैं,”ये बेकार संभाले हुए हैं”
    सुन्दर कहा है !!!!
    आज ‘निस्तेज’ हुये हैं वो चमन में आकर
    जो हमेशा से ही दो-चार संभाले हुए हैं
    ज़मी खा गई आस्माँ कैसे कैसे !!!!
    भुवन निस्तेज भाई !! पिछली ग़ज़लो से ये प्रस्तुति बहुत अधिक प्रभावशाली बन पडी है –मयंक

  6. दिन जो इन्साफ़ का आयेगा खुलेगा पर्दा
    ख़ुद में हम कितने गुनहगार संभाले हुए हैं…

    क्या कहने..

    हुस्न का सानी हो पर्वत के सिवा क्या जिसका
    वादियाँ सोलहों श्रृंगार संभाले हुए हैं ||

    पर्वतों से जुडी ये खूबसूरती, और उस खूबसूरती का सानी ढूंढता ये शे’र. वो समझ सकता है जो मजबूरन पहाड़ों से दूर हो

    बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है |
    मुबारकबाद

  7. Bahut achhii gazal huii h
    Bhuwan sahab
    Tarhi msre par girah bhi khoob hai

    Dher sari daad
    Regards
    Alok mishra

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