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T-20/45 हम तहे-दिल से ग़मे-यार संभाले हुए हैं-प्रेम कुमार पहाड़पुरी

हम तहे-दिल से ग़मे-यार संभाले हुए हैं
और हमको कईं ग़मख़ार संभाले हुए हैं

वक़्त ज़ाया न करें, इक नई तामीर करें
आप गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

और चीज़ों से मकां की नहीं हमको मतलब
हम फ़क़त संगे-दरे यार संभाले हुए हैं

मैं न होता तो तरस खाता तू किस पर या रब
तेरी रहमत को गुनहगार संभाले हुए हैं

आज फ़िर से है वो सरशार ख़ुदा ख़ैर करे
आज फ़िर शेख़ को मयख़ार संभाले हुए हैं

मिल भी जाए जो वो शायद ही उन्हें पहचानें
फ़िर भी हम हसरते-दीदार संभाले हुए हैं

ग़ैर-महफूज़ हैं इंसान की जां और इज़्ज़त
आप बाज़ार ही बाज़ार संभाले हुए हैं

प्रेम कुमार पहाड़पुरी 09352589810

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10 comments on “T-20/45 हम तहे-दिल से ग़मे-यार संभाले हुए हैं-प्रेम कुमार पहाड़पुरी

  1. vah shandaar

  2. बड़े खूबसूरत अश’आर हुए हैं प्रेम साहब। दाद कुबूल करें

  3. बहुत अच्‍छी ग़ज़ल।
    दाद स्‍वीकार करें प्रेम साहब।

  4. प्रेम साहब
    अच्छी ग़ज़ल और इस शेर पर खास दाद क़ुबूल फरमाएं

    मैं न होता तो तरस खाता तू किस पर या रब
    तेरी रहमत को गुनहगार संभाले हुए हैं

  5. वक़्त ज़ाया न करें, इक नई तामीर करें
    आप गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं
    prem sahab yun to poori ghazal hi bahut umda hai… par ye she’r bataure khaas pasand aaya… kya hi umda sher hua hai…

  6. वक़्त ज़ाया न करें, इक नई तामीर करें
    आप गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

    और चीज़ों से मकां की नहीं हमको मतलब
    हम फ़क़त संगे-दरे यार संभाले हुए हैं

    मैं न होता तो तरस खाता तू किस पर या रब
    तेरी रहमत को गुनहगार संभाले हुए हैं

    प्रेम साहब बहुत कामयाब ग़ज़ल हुई है। मेरी दाद कबूल करें

  7. हम तहे-दिल से ग़मे-यार संभाले हुए हैं
    और हमको कईं ग़मख़ार संभाले हुए हैं

    kya khoob……………..daad hazir hai zanaab…

  8. हम तहे-दिल से ग़मे-यार संभाले हुए हैं
    और हमको कईं ग़मख़ार संभाले हुए हैं
    तुम गम ए इश्क का सहारा हो
    हम गम ए इश्क के सहारे हैं ..
    दिल गया रौनके हयात गई
    गम गया सारी काइनात गई –जिगर
    अपने कबीले मे सुकून मिलत है –हम गम ए यार सम्हाले और हमें ग़म ख़ार सम्हाले वाह वाह !!! खूब !!
    वक़्त ज़ाया न करें, इक नई तामीर करें
    आप गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं
    उचित मश्वरा है !!
    जो स्ंवरने को किसी तौर भी राजी न हुई
    भाड मे फेंक दी दुनिया वो निगोडी हमने
    और चीज़ों से मकां की नहीं हमको मतलब
    हम फ़क़त संगे-दरे यार संभाले हुए हैं
    दाइम पडा हुआ तेरे दर पे नही हूँ मै // है ख़ाक ऐसी ज़िन्दगी … जैसी बात है और मजाज़ी और हकीकी के दोनो पहलू बदे खूबसूरत तरीके से शेर मे आये हैं !!!
    मैं न होता तो तरस खाता तू किस पर या रब
    तेरी रहमत को गुनहगार संभाले हुए हैं
    बात दिल मे उतरती है और हमाहंग करती है पढने वाले को !!
    आज फ़िर से है वो सरशार ख़ुदा ख़ैर करे
    आज फ़िर शेख़ को मयख़ार संभाले हुए हैं
    आज या अब तलक शेख़ को …..??!!!
    मिल भी जाए जो वो शायद ही उन्हें पहचानें
    फ़िर भी हम हसरते-दीदार संभाले हुए हैं
    ना जाने कहि भेस मा नरायण मिल जायें !!!
    ग़ैर-महफूज़ हैं इंसान की जां और इज़्ज़त
    आप बाज़ार ही बाज़ार संभाले हुए हैं
    क्योंकि बाज़ार आँगन तक पहुंच चुका है !!
    प्रेम कुमार पहाड़पुरी साहब !! अच्छी गज़ल कही है –मयंक

  9. Badhiya gazal huii hai Prem kumar ji

    Dher saari daad
    Regards
    Alok mishra

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