8 टिप्पणियाँ

T-20/43 ये भले लोग तो दस्तार सँभाले हुए हैं-द्विजेन्द्र द्विज

ये भले लोग तो दस्तार सँभाले हुए हैं
सर मगर काँधों पे ख़ुद्दार सँभाले हुए हैं

यह अलग बात है आज़ार सँभाले हुए हैं
एक अजब नूर ये रुख़सार सँभाले हुए हैं

रू-ब-रू हमसे हमेशा रहा है हर मौसम
हम पहाड़ों का भी किरदार सँभाले हुए हैं

यह जो आवाज़ों का जमघट है हमारे अन्दर
ख़ुद में हम कितने ही किरदार सँभाले हुए हैं

ख़िदमते-लौहो-क़लम ने हमें बख़्शी है ज़िया
ये जो हम ताक़ते-गुफ़्तार सँभाले हुए हैं

कुछ हमारी भी शराफ़त को ग़नीमत कहिए
आप अपनी जो ये दस्तार सँभाले हुए हैं

आपके हाथ में ख़ंजर भी नहीं, हम फिर भी
आदतन आपका हर वार सँभाले हुए हैं

अपने अन्दर की सदाएँ भी तो सुनिए साहब
‘आप ज़ंजीर की झन्कार सँभाले हुए हैं’

वो जो मजनूँ है तो सहरा में मिलेगा यारो!
दरो-दीवार समझदार सँभाले हुए हैं

एक भी कोस तो चल पाए न ’द्विज’ नौ दिन में
और दावा ये कि रफ़्तार सँभाले हुए हैं।

द्विजेन्द्र द्विज 09418465008

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

8 comments on “T-20/43 ये भले लोग तो दस्तार सँभाले हुए हैं-द्विजेन्द्र द्विज

  1. waah..puri ghazal behad umdaa hai Dwij ji…khas tour pe ye do she’r bahut pasand aaye..daad qubule’n..sadar

    यह जो आवाज़ों का जमघट है हमारे अन्दर
    ख़ुद में हम कितने ही किरदार सँभाले हुए हैं

    कुछ हमारी भी शराफ़त को ग़नीमत कहिए
    आप अपनी जो ये दस्तार सँभाले हुए हैं

    -Kanha

  2. बहुत खूब द्विज साहब। क्या खूबसूरत अश’आर हुए हैं। दिली दाद हाज़िर है कुबूल फ़रमाइये।

  3. द्विज साहब !! तरही की सबसे उत्कृष्ट गज़लो मे से एक आपकी है !!! सभी शेर बहुत उम्दा कहे है आपने और कुछ तो कमाल के हैं !!!!
    ये भले लोग तो दस्तार सँभाले हुए हैं
    सर मगर काँधों पे ख़ुद्दार सँभाले हुए हैं
    इस विचार का इस तरही मे पहले भी काफी अनुमोदन हो चुका है !! सर और दस्तार का खूब इस्तेमाल किया गया है इसलिये ये विचार स्वीकार्य है और आपके मतले की की गढन औरो से बेहतर है इसलिये दाद !!!
    यह अलग बात है आज़ार सँभाले हुए हैं
    एक अजब नूर ये रुख़सार सँभाले हुए हैं
    अब नयापन नुमाया हुआ !! विसंगतियों मे मुस्कुराना ज़िन्दगी का सम्मान भी है और उस पर अधिकार भी !!! बहुत खूब !!!
    रू-ब-रू हमसे हमेशा रहा है हर मौसम
    हम पहाड़ों का भी किरदार सँभाले हुए हैं
    इस शेर पर दाद !! और पहाडॉ का किरदार एक नावेल्टी है –जिस प्रकार ऊचाई बढने पर पहाडो का मौसम बदलता है उसी प्रकार ऊंचे किरदार भी हर खुशी गम को खुद मे समो लेते हैं !! वाह !!
    यह जो आवाज़ों का जमघट है हमारे अन्दर
    ख़ुद में हम कितने ही किरदार सँभाले हुए हैं
    हमारे भीतर भी कई फोल्डर होते हैं और हर फोल्डर मे कई फाइले होती है !! जो शब्द –मौसम और महौल के मुताबिक खुल जाते हैं इसलिये आवाज़ों का जमघट हमारे भीतर रहता है और यथा ते मोहकलिलम बुद्ध्र्व्यतरिष्यति !! .. जब तक ये शोर शांत नही होता अपने आत्मा की आवाज़ हमें नही सुनाई दे सकती !!
    ख़िदमते-लौहो-क़लम ने हमें बख़्शी है ज़िया
    ये जो हम ताक़ते-गुफ़्तार सँभाले हुए हैं
    शाइर द्विजेन्द्र द्विज का सादर अभिवादन !!!!
    कुछ हमारी भी शराफ़त को ग़नीमत कहिए
    आप अपनी जो ये दस्तार सँभाले हुए हैं
    इस शेर मे “वर्ना” छिपा हुआ है !!!
    आपके हाथ में ख़ंजर भी नहीं, हम फिर भी
    आदतन आपका हर वार सँभाले हुए हैं
    एक मुहततर्म जिनके हाथ मे शंजर नही था –उनके लिये एक शेर कभी कहा था मैने !!!
    तीर! तलवार!! छुरी!! हाय ये क्या क्या निकला
    हम समझते थे तेरे मुँह मे ज़ुबाँ सा कुछ है –मयंक
    लिहाजा वार करने की नीयत बडी चीज़ है !! साधन के अभाव मे वो ज़बान का फिलहाल इस्तेमाल कर रहे है उन्हें आप जानते है !! अदतन हम उनका हर वार सम्हाले हुये है !!!
    अपने अन्दर की सदाएँ भी तो सुनिए साहब
    ‘आप ज़ंजीर की झन्कार सँभाले हुए हैं’
    जब तक वैचारिक बाध्यता समाप्त नही होती तब तक सुकून नही आता अपने अन्दर का सत्य नही प्र्स्फुटित होता –हाथ लगाने से पानी शंत नही होता –उसे हाथ न लगये तो शांत होता है इसलिये मन के शंत होने का इंतज़ार करना चाहिये –अगर किसी ज़ंजीर की झंकार से आप बाबस्ता है तो खुद की आवाज़ कैसे सुनेंगे !! वाह वाह वाह !!
    वो जो मजनूँ है तो सहरा में मिलेगा यारो!
    दरो-दीवार समझदार सँभाले हुए हैं
    कोई शक नही !!! अपना अपना मुकाम है – किसी को ग़ुर्बत किसी को कुर्बत –किसी को शरा –किसी को बस्ती !! किसी को हस्ती किसी को पस्ती –सब अपनी पनी ज़िन्दगी और अपनी पनी नियति है !!
    एक भी कोस तो चल पाए न ’द्विज’ नौ दिन में
    और दावा ये कि रफ़्तार सँभाले हुए हैं
    सुन्दर !! खैर जिस तरीके का जाम आजकल लगता है उसमे अधाई कोस भी उपल्ब्धि मे गिने जाने चाहिये !! हा हा हा !!!
    द्विजेन्द्र द्विज साहब !!! अति सुन्दर गज़ल कही है –बहुत बहुत बधाई !! –मयंक

  4. द्विज साहब
    प्रणाम

    इस तरही में आपकी ग़ज़ल का शिद्दत से इन्तिज़ार था

    रू-ब-रू हमसे हमेशा रहा है हर मौसम
    हम पहाड़ों का भी किरदार सँभाले हुए हैं
    नया प्रतीक ….

    एक भी कोस तो चल पाए न ’द्विज’ नौ दिन में
    और दावा ये कि रफ़्तार सँभाले हुए हैं।
    तंज़ बढ़िया है भाई … !

  5. Tamam gazal hi umda hai Dwijendra dwij sahab

    Dili daad

    Regards
    Alok mishra

  6. Kua baat hai, Aanand aa gaya Sir

    आपके हाथ में ख़ंजर भी नहीं, हम फिर भी
    आदतन आपका हर वार सँभाले हुए हैं

    Bahut hi Sunder She’r hua hai ||

  7. रू-ब-रू हमसे हमेशा रहा है हर मौसम
    हम पहाड़ों का भी किरदार सँभाले हुए हैं

    यह जो आवाज़ों का जमघट है हमारे अन्दर
    ख़ुद में हम कितने ही किरदार सँभाले हुए हैं

    वो जो मजनूँ है तो सहरा में मिलेगा यारो!
    दरो-दीवार समझदार सँभाले हुए हैं

    अपने अन्दर की सदाएँ भी तो सुनिए साहब
    ‘आप ज़ंजीर की झन्कार सँभाले हुए हैं’

    वाह वाह वाह सुभान अल्लाह द्विज साहब वाह आपकी ग़ज़ल ने तरही में चार चाँद लगा दिए हैं। सबसे अलग सोच अलग अंदाज़ और अलग तेवर वाली ग़ज़ल ने दिल लूट लिया। बार बार पढ़ रहा हूँ और दाद दिए जा रहा हूँ. ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद भाई जय हो।

  8. बहुत अच्‍छी ग़ज़ल। हर शे’र उम्‍दा मगर

    वो जो मजनूँ है तो सहरा में मिलेगा यारो!
    दरो-दीवार समझदार सँभाले हुए हैं

    इस शे’र की क्‍या बात…क्‍या बात…क्‍या बात।

    प्रणाम सहित दाद हाजिर है सर।

    शु्क्रिया
    नवनीत

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: