22 टिप्पणियाँ

T-20/42 – कुछ नये ज़ख्म हैं, कुछ दाग़ पुराने है,मगर … मयंक अवस्थी

मेरी सांसे मेरे अशआर सम्हाले हुये हैं
मेरे बच्चे मेरा संसार सम्हाले हुये हैं

बेलियाकत हैं जो तलवार सम्हाले हुये हैं
फिर भी हम सर नही दस्तार सम्हाले हुये हैं

चन्द ख़ैरात के अशआर का मतलब ये नही
आप अब मीर का दरबार सम्हाले हुये हैं

कुछ नये ज़ख्म हैं, कुछ दाग़ पुराने है,मगर
मेरे दिल को ये मददगार सम्हाले हुये है

पासाबानो की हकीकत भी समझ ले नादाँ
कुछ लुटेरे तेरा घरबार सम्हाले हुये हैं

आज अंग्रेज़ नही हैं , मगर अंग्रेज़ी है
“आप ज़ंजीर की झंकार सम्हाले हुये है”

हमने अपनो पे कभी तीर चलाया ही नहीं
सिर्फ गाँडीव की टंकार सम्हाले हुये हैं

मयंक अवस्थी ( 08765213905)

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22 comments on “T-20/42 – कुछ नये ज़ख्म हैं, कुछ दाग़ पुराने है,मगर … मयंक अवस्थी

  1. Is ghazal se kuchh she’r chun ke post karna bada mushkil kaam hai..sare she’r behad umdaa aur lajawab hain…behatreen ghazal hai bhaiya…har ek she’r moti ki maanind roshani bikherta hua..daad qubul farmaye’n..sadar pranam
    -Kanha

  2. wah, kya baat hai, achhe ashaar nikaale hain, nae khayaalaat pesh kiye hain, kya kehne, bahot khoob

  3. बेलियाकत हैं जो तलवार सम्हाले हुये हैं
    फिर भी हम सर नही दस्तार सम्हाले हुये हैं

    AAP KE HAUSLE KI DAAD DENA PADEGI MAYANK SAAHAB, NAA-AHLO’N. KE HAATH ME’N TALWAAR HONE KE BAAWAJOOD SAR NA BACHAAKAR DASTAAR BACHAANA HAUSLAMAND LOGO’N KA HI KAAM HAI, WAAH.

    चन्द ख़ैरात के अशआर का मतलब ये नही
    आप अब मीर का दरबार सम्हाले हुये हैं ,

    BHAI KHOOB KAHA HAI KYA KAHNE, AAJ KAL SHAAIR KAM AUR MUTA-SHAAIR ZYAADA HAIN, MUTA-SHAAIR TO YAHI SAMAJHTA HAI, SACHCHA SHAAIR TO HAMESHA APNE KO ” TIFL-E-MAKTAB” HI SAMAJHTA HAI.

    आज अंग्रेज़ नही हैं , मगर अंग्रेज़ी है
    “आप ज़ंजीर की झंकार सम्हाले हुये है”
    SAB SE ALAG AUR UMDA GIRAH, UMDA GHAZAL KE LIYE BAHUT BAHUT MUBAARAKBAAD MAYANK SAAHAB.

  4. चन्द ख़ैरात के अशआर का मतलब ये नही
    आप अब मीर का दरबार सम्हाले हुये हैं
    आदरणीय मयंक भाईसाहब ,आईना दिखाता हुआ शेर है ,यह हिम्मत सिर्फ और सिर्फ आपके बस की बात है |

    कुछ नये ज़ख्म हैं, कुछ दाग़ पुराने है,मगर
    मेरे दिल को ये मददगार सम्हाले हुये है
    सबका यही हाल है |दिलिदाद कबूल फरमावें |

    पासाबानो की हकीकत भी समझ ले नादाँ
    कुछ लुटेरे तेरा घरबार सम्हाले हुये हैं
    देश का अभी यही हाल है ,कातिल मसीहाई के दावेदार हुये है |
    आदरणीय मयंक भाईसाहब ,तहेदिल से दाद कबूल फरमावें |

  5. मयंक साहब
    प्रणाम

    आज अंग्रेज़ नही हैं , मगर अंग्रेज़ी है
    “आप ज़ंजीर की झंकार सम्हाले हुये है”
    अच्छी गिरह है भाई

    और

    चन्द ख़ैरात के अशआर का मतलब ये नही
    आप अब मीर का दरबार सम्हाले हुये हैं
    बहुत अच्छा … सीख देता हुआ ये शेर !

  6. मयड़्क भाई इस बेहद क़ामयाब तरही की बहुत ही शानदार ग़ज़ल पेश की है आप ने। मतले से ले कर आख़िली शेर तक एक से बढ कर एक शेर। कमाल है भाई कमाल। ग़ज़ल क्या है – एक परिपूर्ण सम्वाद की बेहतरीन पेशकश है। आप के मतले की शान में पुरानी डायरी से

    अपने सीने से लगा लेंगे मुझे
    मेरे बच्चे ही सम्हालेंगे मुझे

    मददगार वाला शेर ख़ास शेर है। बहुत-बहुत मुबारक़ बाद।

  7. वाह ! वाह!! वाह!!! हर शेर बाकमाल कहा है आपने, आपकी लेखनी को नमन सरकार….

  8. Kya hi umda gazal huii hai Mayank bhaiya
    puri ki puri gazal achhii hai

    Dher sari daad

    Regards
    Alok mishra

  9. मेरी सांसे मेरे अशआर सम्हाले हुये हैं
    मेरे बच्चे मेरा संसार सम्हाले हुये हैं

    चन्द ख़ैरात के अशआर का मतलब ये नही
    आप अब मीर का दरबार सम्हाले हुये हैं

    आज अंग्रेज़ नही हैं , मगर अंग्रेज़ी है
    “आप ज़ंजीर की झंकार सम्हाले हुये है”

    हमने अपनो पे कभी तीर चलाया ही नहीं
    सिर्फ गाँडीव की टंकार सम्हाले हुये हैं

    क्या कहूँ ? कैसे कहूँ ? उस्तादना तेवर वाली इस ग़ज़ल के बारे में , मयंक भाई नमन करता हूँ आपकी लेखनी को , लाजवाब ग़ज़ल कही है और बहुत अनूठी गिरह लगायी है आपने -कमाल –मकता तो सच जान लेवा है। मेरी दिली दाद कबूल करें।

  10. शिल्‍प से लेकर भाव के स्‍तर पर क्‍या उम्‍दा ग़ज़ल हुई है भाई साहब।

    मेरी सांसे मेरे अशआर सम्हाले हुये हैं
    मेरे बच्चे मेरा संसार सम्हाले हुये हैं

    वाह… कभी ग़ज़लें वार संभालती हैं और आदमी बच जाता है और कभी अशआर बच्‍चे बन कर सारा संसार संभाल लेते हैं। एक संवेदना हमें जिं़दा रखे रहती है। वाह…वाह…।

    बेलियाकत हैं जो तलवार सम्हाले हुये हैं
    फिर भी हम सर नही दस्तार सम्हाले हुये हैं

    वाकई। बेलियाकत ही तलवार संभालते हैं लेकिन हम लोगों के लिए सर से अधिक ज़रूरी दस्‍तार है यानी आत्‍मसम्‍मान बहुत ज़रूरी है। हम तलवार के लिए बने ही नहीं हैं।

    चन्द ख़ैरात के अशआर का मतलब ये नही
    आप अब मीर का दरबार सम्हाले हुये हैं
    …………बहुत अच्‍छी नसीहत बहुत सद्यप्रस्‍तुत उस्‍तादों के लिए।

    कुछ नये ज़ख्म हैं, कुछ दाग़ पुराने है,मगर
    मेरे दिल को ये मददगार सम्हाले हुये है
    ज़ख्‍़म और दाग़ जब मददगार बन जाएं तो रहा ही क्‍या। आह…आह…।

    पासाबानो की हकीकत भी समझ ले नादाँ
    कुछ लुटेरे तेरा घरबार सम्हाले हुये हैं

    इसी बात को समझाने-समझने की कुव्‍वत नहीं बची है भाई साहब दुनिया में।

    आज अंग्रेज़ नही हैं , मगर अंग्रेज़ी है
    “आप ज़ंजीर की झंकार सम्हाले हुये है”

    बहुत अलग और कई कुछ कहती हुई गिरह।

    हमने अपनो पे कभी तीर चलाया ही नहीं
    सिर्फ गाँडीव की टंकार सम्हाले हुये हैं

    आह… ये शे’र मेरे लिएण्‍ कई स्‍तरों पर खुल रहा है। अपने अहिंसक संस्‍कारों के साथ भी और उनसे जुड़ी विडंबनाओं के स्‍तर पर भी।

    वाह…वाह..।

    सादर
    नवनीत

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