16 टिप्पणियाँ

T-20/40 अपना विरसा है ये किरदार, संभाले हुए हैं-तुफ़ैल चतुर्वेदी

अपना विरसा है ये किरदार, संभाले हुए हैं
इस हवा में हमीं दस्तार संभाले हुए हैं

कोई वीराना बसाना तो बहुत आसां था
हम तिरे शहर में घर-बार संभाले हुए हैं

वरना सैलाब ज़माने को बहा ले जाता
अपनी आँखें तिरे बीमार संभाले हुए हैं

दोस्ती काम बहुत आयी है अपने साहब
कब के मिट जाते मगर यार संभाले हुए हैं

जो मिला तुझसे, उसे जान! भुलाना कैसा
अब भी आंसू तिरा इंकार संभाले हुए हैं

क़द्र अब कोई नहीं करता शराफ़त की यहाँ
आजिज़ी हम तुझे बेकार संभाले हुए हैं

अब ग़ज़ल चाँद सितारों से पर जा निकली
” आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

मुसहफ़ी जी के घराने को ग़ज़ल आती है ?
……यही गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

हमने दस लोग भी देखे नहीं प्यारे तिरे साथ
बस तिरी साख को अख़बार संभाले हुए हैं

उनसे कहना की जिहाद इक बुरी ज़हनीयत है
वो जो ईराक़ में हथियार संभाले हुए हैं

झूटे गांधी हैं नहीं है कोई रिश्ता उनसे
ये फ़क़त नोटों के अम्बार संभाले हुए हैं

तुफ़ैल चतुर्वेदी 09711296239

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16 comments on “T-20/40 अपना विरसा है ये किरदार, संभाले हुए हैं-तुफ़ैल चतुर्वेदी

  1. क्या कहूं और क्या न कहूं ? ख़ाकसार की मामूली काविश को आप सबने हद से ज़ियादा नवाज़ा। हदिया-ए-ख़ुलूस क़ुबूल फ़रमाइये

  2. Matla ta Aakhari she’r lajawab ghazal hai dada..apko baya’n karti hui ghazal..har she’r khushboo bikher raha ..dher sari daad ..sadar charan sparsh
    -kanha

  3. अपना विरसा है ये किरदार, संभाले हुए हैं
    इस हवा में हमीं दस्तार संभाले हुए हैं….achha matla

    कोई वीराना बसाना तो बहुत आसां था
    हम तिरे शहर में घर-बार संभाले हुए हैं….wah wah wah, jawaab nahin

    जो मिला तुझसे, उसे जान! भुलाना कैसा
    अब भी आंसू तिरा इंकार संभाले हुए हैं…..subhan Allah, kya kehne

    क़द्र अब कोई नहीं करता शराफ़त की यहाँ
    आजिज़ी हम तुझे बेकार संभाले हुए हैं……bahot khoob

    हमने दस लोग भी देखे नहीं प्यारे तिरे साथ
    बस तिरी साख को अख़बार संभाले हुए हैं….mujhe ye sher bahot pasand aaya, haqeeqat bayaan kar di aapne aaj ke zamaane ki, salamat rahiye

  4. बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है दादा और घर-बार वाला शे’र तो पढ़ते ही दिल में घर कर गया। दिली दाद हाज़िर है कुबूल फ़रमाइये।

  5. TUFAIL SAHAB AAP NE SHURU ME’N HI KAHDIYA THA K ”IS BAAR GHAZAL KAHNI HI PADEGI” IS LIYE AAP KI GHAZAL KA SHIDDAT SE INTIZAAR THA, BEHTAREEN GHAZAL, LAFZIYAAT, MAZAAMEEN, BANDISH, USLOOB KIS KIS KI DAAD DI JAAYE, AAP KI GHAZAL KA MATLA

    अपना विरसा है ये किरदार, संभाले हुए हैं
    इस हवा में हमीं दस्तार संभाले हुए हैं

    KYA KAHNE MUHTARAM, WAAH, AUR YE SHER

    कोई वीराना बसाना तो बहुत आसां था
    हम तिरे शहर में घर-बार संभाले हुए हैं

    KITNI AASAANI SE MUSHKIL KAAM KO AAP AASAAN KAR GAYE

    हम तिरे शहर में घर-बार संभाले हुए हैं AAP KE HAUSLE KO SALAAM

    दोस्ती काम बहुत आयी है अपने साहब
    कब के मिट जाते मगर यार संभाले हुए हैं
    WAFAADAAR DOSTO’N KO MUBAARAK BAAD

    FAAYEDA AISI DOSTI SE KYA
    KAAM JO WAQT PAR NAHI’N AATI
    (Shafique Raipuri)

    क़द्र अब कोई नहीं करता शराफ़त की यहाँ
    आजिज़ी हम तुझे बेकार संभाले हुए हैं
    HAQUE HAI,
    BEHTAREEN SHER JANAAB

    अब ग़ज़ल चाँद सितारों से पर जा निकली (पर= PARE)
    ” आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”
    WAAH, umda girah

    URDU GHAZAL KAHA’N SE KAHA’N TAK PAHUNCH GAYI
    HAM HAI’N KE LE KE BAITHE HAI’N RUKHSAAR-O-LAB KI BAAT
    (Shafique Raipuri)
    WAISE AAP KI GHAZAL KO DAAD-O-TAHSEEN SE NAWAAZNA GOYA AAFTAAB KO CHARAAGH DIKAHAANE KE MUTARAADIF HAI, PHIR BHI
    UMDA GHAZAL PAR DAAD-O-TAHSEEN PESH KARTA HOO’N, QABOOL KARE’N.

  6. आदरणीय दादा ,सादर प्रणाम |इस बह्र पर इससे उम्दा ग़ज़ल नहीं हो सकती है |मैं तो इस लायक भी नहीं कि आपके अशहार पर अपनी टिप्पणी रखूं |समकालीन सियासी मसलों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय उथल पुथल सब एक मुक़म्मल शायर के मुक़म्मल क़लाम में समाया हुआ है |आदर सहित दिलिदाद कबूल फरमावें |
    सादर

  7. बड़े भाई
    प्रणाम
    तरही का असली आकर्षण तो आपकी ग़ज़ल है
    मतला ता मकता मंझी हुयी ग़ज़ल एक एक शेर चमकता दमकता हुआ

    अपना विरसा है ये किरदार, संभाले हुए हैं
    इस हवा में हमीं दस्तार संभाले हुए हैं
    क्या मतला है वाह।

    जो मिला तुझसे, उसे जान! भुलाना कैसा
    अब भी आंसू तिरा इंकार संभाले हुए हैं
    जान ! ,…… क्या अंदाज़ है कुरबान

    अब ग़ज़ल चाँद सितारों से पर जा निकली
    ” आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”
    बंदगी बड़े भाई बंदगी !!

    हमने दस लोग भी देखे नहीं प्यारे तिरे साथ
    बस तिरी साख को अख़बार संभाले हुए हैं
    ये मीडिया और कई कदावर लोग …. सच है आपका शेर !!!!

  8. दादा !! बहुत कमयाब तरही रही ये !! आपकी गज़ल का ही इंतज़ार था !!!
    अपना विरसा है ये किरदार, संभाले हुए हैं
    इस हवा में हमीं दस्तार संभाले हुए हैं
    बिल्कुल !! ये बयान सजता है आप पर !! और इस बयान के सच्चे हकदार बहुत कम होंगे अब !!! मतला रवाँ भी है पुर असर भी और इसमे सर्व्भौमता भी है लेकिन निजत्व ज़ियादा है !! बहुत खूब !!!
    कोई वीराना बसाना तो बहुत आसां था
    हम तिरे शहर में घर-बार संभाले हुए हैं
    इस तरही के सबसे खूबसूरत शेरो मे शर्तिया शुमार करेगा कोई भी तनकीदकार !! मै इसे अव्वल न पर रखूंगा !!! आह !! छू गई इस शेर की नर्मी और गहराई !! सहरा को नम कर गया ये शेर !!
    वरना सैलाब ज़माने को बहा ले जाता
    अपनी आँखें तिरे बीमार संभाले हुए हैं
    एक और बहुत खूबसूरत शेर !!! शिल्प सबसे महीन होता है तो दीखता नही यही उसकी उत्कृष्तता भी है !! यही शीशागरी भी है !!!
    दोस्ती काम बहुत आयी है अपने साहब
    कब के मिट जाते मगर यार संभाले हुए हैं
    मै सहमत नही हूँ इस घोषणा से –लेकिन आपके बडप्पन का काइल हूँ –दोस्तों की लाज रख ली आपने !!!!
    जो मिला तुझसे, उसे जान! भुलाना कैसा
    अब भी आंसू तिरा इंकार संभाले हुए हैं
    मै उसी मोडपे पत्थर सा खडा हूँ कि जहाँ
    कौन है तू ?!! ये मेरे ख्वब ने पूछा मुझसे !!
    क़द्र अब कोई नहीं करता शराफ़त की यहाँ
    आजिज़ी हम तुझे बेकार संभाले हुए हैं
    फिर भी संस्कार नही जाते अपने न !!
    तेरा शेवा है मेरे कत्ल का सामाँ होना .
    मेरा हासिल है तेरा ज़ूद पशेमाँ होना !!
    अब ग़ज़ल चाँद सितारों से पर जा निकली
    ” आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”
    पहले ही कह चुके है आप इसे –लेकिन इस शेर ने अर्जुन के तेर का कम किया !! ऐसी जलधार प्रथ्वी से निकली कि भीष्म की प्यास बुझ गई एक से बढकर एक मुरस्सा गज़ले इस तरही मे आईं !!!
    मुसहफ़ी जी के घराने को ग़ज़ल आती है ?
    ……यही गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं
    जो प्रश्न चिन्ह अव्वल मिसरे मे लगा है वो काफी है शेर की दूरी और मार को बयाँ करने के लिये !!!!
    हमने दस लोग भी देखे नहीं प्यारे तिरे साथ
    बस तिरी साख को अख़बार संभाले हुए हैं
    प्यारे !! सम्बोधन पर बहुतो के दिल पर आरे चला दिये आपने !!!
    उनसे कहना की जिहाद इक बुरी ज़हनीयत है
    वो जो ईराक़ में हथियार संभाले हुए हैं
    कह दिया हमने !! और मालूम है कैसी आवाज़ आई उधर से –साफ कहूँ तो ………हम तो अब श्वान की भुंकार सम्हाले हुये हैं !!!
    झूटे गांधी हैं नहीं है कोई रिश्ता उनसे
    ये फ़क़त नोटों के अम्बार संभाले हुए हैं
    फिरोज़ गान्धी नही थे पारसी थे .. जिसने नाम चुरा लिया वो और क्या नही चुरा सकता ??!!!!
    दादा !! बहुत खूब शेर कहे है आपने नूर का घराना आबाद है !!! –सादर –मयंक

  9. वीराने को छोड़ कमज़ोर करने वाला समझे जाते शह्र में घर बार संभालने से लेकर ईराक को दिए गए संदेश तक …. ग़ज़ल कई कुछ दे गई है।
    उस्‍तादों की ग़ज़ल पर और क्‍या कहा जाए।
    आनंद आ गया दादा।
    प्रणाम और शुक्रिया।
    नवनीत

  10. क्या ही उम्दा ग़ज़ल हुई है दादा। मतला बेहद पसंद आया। तेज़ हवा में पगड़ी संभालने की इमेज क्या ही उम्दा बन पड़ी है। कोई वीराना बसाना… मेरे ख़याल में इस मुशायरे का सबसे अच्छा शेर है ये। आप से फ़ोन पर सुनने के बाद से ही सर धुन रहा हूँ। गिरह तो लाजवाब है ही। ढेर सारी दाद।

  11. Koi veerana basana to bahut aasaa..n tha
    Ham tire shahr me ghar baar sambhaale huye hain
    Kya hi umda sher h dada…waaahh waah

    Warna sailaab zamaane ko baha le jata
    Apni aankhe tire beemar sambhaale huye hain
    Waaahhhh
    Tarahi misre par girah bhi ab tak sabse umda gurah hai
    Bahut umda gazal huii h dada

    Dili daad qubul keejiye

    With regards
    Alok mishra

  12. कोई वीराना बसाना तो बहुत आसां था
    हम तिरे शहर में घर-बार संभाले हुए हैं…..दादा क्या कहने!! आपका ये शेर तरही की बेशतर ग़ज़लों पर भारी पड़ रहा है. इस ख़याल का फ़लक वाकई बहुत बड़ा हैऔर ये उतने ही मानी अपने में समेटे हुए है..बाक़ी अश’आर भी पुरअसर हैं. दाद और शुक्रिया.

  13. कोई वीराना बसाना तो बहुत आसां था
    हम तिरे शहर में घर-बार संभाले हुए हैं

    अब ग़ज़ल चाँद सितारों से पर जा निकली
    ” आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

    उस्ताद के कहन पर हम जैसे तलिबेइल्म क्या कॉमेंट करेंगे ? पढ़ रहे हैं सीख रहे हैं और दुआ कर रहे हैं कि ऐसे अशआर आइन्दा भी पढ़ने को मिलते रहें।

  14. दादा
    आपकी रचनात्मकता को नमन।
    कमाल की ग़ज़ल।
    दिली दाद।

  15. एक से एक बढ़िया शेर पढने को मिले, आपको नमन…..

  16. मैं इसे अपनी ख़ुश-नसीबी ही कहूँगा कि घर-बार वाला शेर दादा ने मुझे ख़ुद सुनाया और सुनते ही दिल से आवाज़ आयी थी – ग़ज़ल के शेर कहाँ रोज़-रोज़ होते हैं। दादा आप के अशआर का इन्तख़ाब करने वाले इसे इग्नोर नहीं कर पायेंगे। ईराक वाला शेर भी बहुत अपीलिंग शेर है। फुल ग़ज़ल, बढिया ग़ज़ल, उस्ताज़ाना ग़ज़ल।

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