8 टिप्पणियाँ

T-20/39 इतनी नफ़रत में भी कुछ प्‍यार संभाले हुए हैं-पवनेंद्र ‘पवन’

इतनी नफ़रत में भी कुछ प्‍यार संभाले हुए हैं
हम अभी तक सभी त्‍योहार संभाले हुए हैं

बाप दादाओं के उपकार संभाले हुए हैं
मां-बहन का भी तभी भार संभाले हुए हैं

बस दहकते हुए अंगार संभाले हुए हैं
बेवफ़ा के लिए उद्गार संभाले हुए हैं

डालियां फूलाें की कुछ ख़ार संभाले हुए हैं
बस कि जीवन का यही सार संभाले हुए हैं

लूटने सीता को आते हैं जो रावण यारो
मंच पर राम का किरदार संभाले हुए हैं

हम बड़ी तेजी से आकाश को छू आए मगर
सोच में हाथी की रफ़्तार संभाले हुए हैं

बेडि़यां कट गईं, इक उम्र हुई है फिर भी
”आप ज़ंजीर की झनकार संभाले हुए हैं”

बस यही सोच ‘पवन’ बैठे हुए हैं अब तक
हम ही गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

देखिए बनता है क्‍या देश की कश्‍ती का ‘पवन’
नाख़ुदा अब नये पतवार संभाले हुए हैं

पवनेंद्र ‘पवन’ 09418252675

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8 comments on “T-20/39 इतनी नफ़रत में भी कुछ प्‍यार संभाले हुए हैं-पवनेंद्र ‘पवन’

  1. बहुत खूब पवन साहब, अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल कीजिए

  2. पवन साहब
    अच्छी ग़ज़ल

    लूटने सीता को आते हैं जो रावण यारो
    मंच पर राम का किरदार संभाले हुए हैं
    नगीना शेर !!!!

    बेडि़यां कट गईं, इक उम्र हुई है फिर भी
    ”आप ज़ंजीर की झनकार संभाले हुए हैं”
    इक उम्र के बाद रिहा होने में ये भी एक खतरा होता है

  3. इतनी नफ़रत में भी कुछ प्या र संभाले हुए हैं
    हम अभी तक सभी त्योुहार संभाले हुए हैं
    विस्ंगतियों मे भी जीवन के मूल्यो का स्वीकार्य एक बडी चारित्रिक विशेष्ता है जो अब बहुत दुर्लभ है !!!
    बाप दादाओं के उपकार संभाले हुए हैं
    मां-बहन का भी तभी भार संभाले हुए हैं
    कुछ भार ईश्वरीय उपहार होते हैं !!
    बस दहकते हुए अंगार संभाले हुए हैं
    बेवफ़ा के लिए उद्गार संभाले हुए हैं
    वो ज़िन्दगी थी इसलिये हमने निभा दिया
    उस बेवफा का संग वफाओ के साथ साथ
    डालियां फूलाें की कुछ ख़ार संभाले हुए हैं
    बस कि जीवन का यही सार संभाले हुए हैं
    दर्शन है और मर्यादा पूर्ण वैचारिकता से आपूर्ण है कथ्य !!!
    लूटने सीता को आते हैं जो रावण यारो
    मंच पर राम का किरदार संभाले हुए हैं
    ज़बान का शेर कहा है आपने !!
    हम बड़ी तेजी से आकाश को छू आए मगर
    सोच में हाथी की रफ़्तार संभाले हुए हैं
    अंतरिक्ष यान का शुभरम्भ भी नारियल फोड कर किया जाता है !! –दूसरे कोण से शेर यही कह रहा है कि हमने तकनेकी प्रगति बहुत की है लेकिन मानस हमारा अभी भी अविकसित है !!!
    बेडि़यां कट गईं, इक उम्र हुई है फिर भी
    ”आप ज़ंजीर की झनकार संभाले हुए हैं”
    तार्किक बात !!
    बस यही सोच ‘पवन’ बैठे हुए हैं अब तक
    हम ही गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं
    अपनी गतिशीलता को दायित्वबोध के कारण विराम दे रख है हमने !!!
    देखिए बनता है क्याा देश की कश्तीा का ‘पवन’
    नाख़ुदा अब नये पतवार संभाले हुए हैं
    आशा और विश्वास देखिये कितने दिन टिकते है अब !!!
    पवनेंद्र ‘पवन’ साहब !!! बहुत बहुत बधाई !!! बहुत उज्ज्वल है ऐसी गज़ल का भविष्य जिसकी पतवार आप जैसे नाविक के हाथों मे है !!! शुभ्रकामनाये !!! –मयंक

  4. वाह..वाह..। खूब कहा सर।
    शुक्रिया
    नवनीत

  5. हम बड़ी तेजी से आकाश को छू आए मगर
    सोच में हाथी की रफ़्तार संभाले हुए हैं

    अपनी संस्कृति को बेहद ख़ूबसूरती से आपने अपने शेरों में ढाला है। खूबसूरत ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कबूल करें

  6. पवनेन्द्र भाई साहब
    बहुत खूब।
    हार्दिक बधाई।

  7. Kya kahne pawnendra Pawan ji
    Alag lahze ki badhiya hindi gazal

    Daad qubul keejiye

    Regards
    Alok mishra

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