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T-20/38 अपनी हिम्‍मत सरे-बाज़ार संभाले हुए हैं-मनोज मित्तल “कैफ”

अपनी हिम्‍मत सरे-बाज़ार संभाले हुए हैं
ये भरम हम हैं ख़रीदार संभाले हुए हैं

मुंजमिद हैं कोई असरार संभाले हुए हैं
या कोई अज्‍़म ये कोहसार संभाले हुए हैं

वक्‍़त का है ये तकाज़ा कि फ़रामोश करें
और हम याद के अंबार संभाले हुए हैं

अब तो लाज़ि‍म है उन्‍ही पर मेरी बै’अत हो जाय
जो हसीं हाथ मिरा प्‍यार संभाले हुए हैं

इल्‍म ही कल न कहीं ज़ौक़ को महदूद करे
जान कर हम जिसे उपहार संभाले हुए हैं

हम से आलम के अनासिर को फ़राहम है असास
हम वो नुक्‍़ते हैं कि परकार संभाले हुए हैं

एक मुद्दत से नहीं इस में कोई हलचल भी
यानी धड़ है कि जो सरदार संभाले हुए हैं

ख़ल्‍वतों में तिरा किरदार यही होगा क्‍या
जल्‍वतों में तो ये अन्‍ज़ार संभाले हुए हैं

कोई सुर दिल मे नहीं है कि निकालें जिसको
मुफ़्त हम बीन के सब तार संभाले हुए हैं

मुद्दआ ये है इन्हें कौन बचा पायेगा
इन हवाओं को तो अशजार संभाले हुए हैं

सर्दमेहरी-ओ-रिया बुग्ज़ो-हवस, ऐयारी
तेरी फि़तरत तिरे मुख्‍़तार संभाले हुए हैं

मनोज मित्तल “कैफ” 09887099295

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7 comments on “T-20/38 अपनी हिम्‍मत सरे-बाज़ार संभाले हुए हैं-मनोज मित्तल “कैफ”

  1. मनोज साहब
    अच्छी ग़ज़ल

    हम से आलम के अनासिर को फ़राहम है असास
    हम वो नुक्‍़ते हैं कि परकार संभाले हुए हैं
    कमाल का शेर है वाह वाह

  2. Bahut umda gazal huii hai Manoj mittal kaif sahab

    dher saari daad
    regards

  3. अपनी हिम्म त सरे-बाज़ार संभाले हुए हैं
    ये भरम हम हैं ख़रीदार संभाले हुए हैं
    सानी की गढन जटिल है लेकिन मतला नया और आकर्षक है !!! ( कैसे बाज़ार का दस्तूर तुझे समझाऊँ –बिक गया जो वो खरीदार नही हो सकता जैसी बात है पसमनज़र मे कुछ कुछ )
    मुंजमिद हैं कोई असरार संभाले हुए हैं
    या कोई अज़् म ये कोहसार संभाले हुए हैं
    बर्फ जुनून मे नही !!! अज़मत ही है कुहसारों की जो ये बर्दाश्त करते हैं शेर तहदार और गहरा है !!
    वक़् त का है ये तकाज़ा कि फ़रामोश करें
    और हम याद के अंबार संभाले हुए हैं
    ताके निसियाँ पे जमी गर्द है सदियों की मगर
    हम बदे शौक से लम्हो की सनद रखते हैं –मयंक जादूनगरी है ये प्यारे आवाज़ो पर ध्यान न दो
    पीछी मुड कर देखने वाला पत्थर का हो जायेगा –कतील
    मित्तल साहब फौरन फरामोश कीजिये –ज़िन्दगी के मआनी इमरोज़ !!! न गुज़रा हुआ कल न आने वाला कल !!!
    अब तो लाज़ि‍म है उन्हीा पर मेरी बै’अत हो जाय
    जो हसीं हाथ मिरा प्या र संभाले हुए हैं
    आखिरी हिचकी तेरे जानू पे आये
    मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ
    इल्मा ही कल न कहीं ज़ौक़ को महदूद करे
    जान कर हम जिसे उपहार संभाले हुए हैं
    अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने अक्ल –लेकिन कभी कभी इसे तनहा भी छोड दे !! दो और दो का जोड हमेशा अगर चार होने लगा तो जीवन के अर्थ ही खत्म हो जायेंगे !! इसलिये इल्म से नादानी बेहतर है !!
    हम से आलम के अनासिर को फ़राहम है असास
    हम वो नुक़्ेते हैं कि परकार संभाले हुए हैं
    बहुत उम्दा शिल्प है शेर का !! हमी से इस दुनिया के पंचततत्वो को सम्रद्धै मिलती है !! नुक्ते जो प्रकार सम्हाले हुये हैं –कि बेहद सूक्ष्म ही सही लेकिन हम गतिविधियो का केन्द्र है –फलस्फहा बहुत उम्दा निकाला है इस ज़मीन से !!!
    एक मुद्दत से नहीं इस में कोई हलचल भी
    यानी धड़ है कि जो सरदार संभाले हुए हैं
    तिरी दस्तार तुझको ढो रही है
    तेरे काँधो पे तेरा सर नहीं है
    (कहाँ पहुंचा गई वो रहनुमाई मुक्ल को यारों
    जिधर बेगम बतती थे उधर सरदार जाता था )
    बहुत सुन्दर कन्धो पे सर नही है को प्समंज़र मे धड कह कर क्या चिन्हित किया है बिम्ब को आपने वाह वाह !!)
    ख़ल्वसतों में तिरा किरदार यही होगा क्याड
    जल्ववतों में तो ये अन्ज़ायर संभाले हुए हैं
    सटीक सवाल है जल्वतो मे जिस किरदार का अर्र्ज़ है उसी का ख़ल्वतो मे जवाल भी छुपा है सवाल मे बिना कहे जवाब पिरो दिया आपने सोचने वाले को बहुत मुहलत दे दी लेकिन सब कुछ कह दिया !!!
    मुद्दआ ये है इन्हें कौन बचा पायेगा
    इन हवाओं को तो अशजार संभाले हुए हैं
    जो इक चराग हवाओ की धुन पे रक्साँ है
    उसे बताओ अभी वक्त है सुधर जाये !!!
    जब हवाओ को अश्जार सम्हालेगे तो अंजाम क्या होगा !!! हवाये तुन्द है चाहे उत्तर पश्चिम की हो चाहे उत्तर पूर्व की और अश्जार हर स्टेट मे है ऐसे !!!
    सर्दमेहरी-ओ-रिया बुग्ज़ो-हवस, ऐयारी
    तेरी फि़तरत तिरे मुख़्हतार संभाले हुए हैं
    बिल्कुल !!राधे राधे !! हम तो जन्मे ही इसीलिये थे कि चरित्र शिक्षा और संस्कार के नाम पर ज़माने के हर फितने को ढोये !!! –तेरी फितरत तेरे मुख़्तार सम्हाले हुये है !! मनोज साहब !! ऊंचे मेयार की इस गज़ल के लिये बहुत बहुत बधाई आपको !!-मयंक

  4. दाद हाजि़र है जनाबेआली।
    बहुत उम्‍दा ग़ज़ल। हर अंदाज़ से।
    शुक्रिया
    सादर
    नवनीत

  5. मनोज मित्तल कैफ साहब क्या ही उम्दा ग़ज़ल कही आपने वाह वाह। हम वो नुक़्ते हैं जो परकार संभाले हुए हैं। क्या ही उम्दा शेर हुआ है। वाह वाह। साथ ही इन हवाओं को तो अश्जार संभाले हुए हैं भी बेहद पसंद आया। दिली दाद।

  6. मनोज साहब क्या ख़ूब ग़ज़ल हुई है. मज़ा आ गया. और ये शेर तो हमेशा याद रहेगा:
    मुद्दआ ये है इन्हें कौन बचा पायेगा
    इन हवाओं को तो अशजार संभाले हुए हैं…वाह!वाह!

  7. कोई सुर दिल मे नहीं है कि निकालें जिसको
    मुफ़्त हम बीन के सब तार संभाले हुए हैं

    अहा हा। सुभान अल्लाह , उर्दू के चुनिंदा खूबसूरत लफ़्ज़ों से सजी आपकी इस ग़ज़ल की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। रिवायती ग़ज़ल की के सारी खूबियां समेटे इस ग़ज़ल का हर शेर दाद पाने लायक है।

    नीरज

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