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T-20/36 कभी टीवी कभी अखबार संभाले हुए हैं-डॉ मुहम्मद ‘आज़म’-दूसरी ग़ज़ल

कभी टीवी कभी अखबार संभाले हुए हैं
आज ये दोनों ही सरकार संभाले हुए हैं

क्यों न हों शहर के बाजार उदासी में ग़र्क़
लोग अब घर से ही बाज़ार संभाले हुए हैं

अब परखना है जिन्हें देखें बस उनका सेलफ़ोन
मेमोरी कार्ड सब असरार संभाले हुए हैं

नैट के दौरे-तरक़्क़ी का तमाशा देखो
घर के अफ़राद को अग़ियार संभाले हुए हैं

आज ”आज़म” हैं यहां जितने भी सोशल साइट्स
उन पे किरदार को बदकार संभाले हुए हैं

डॉ मुहम्मद “आज़म” 09817531331

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6 comments on “T-20/36 कभी टीवी कभी अखबार संभाले हुए हैं-डॉ मुहम्मद ‘आज़म’-दूसरी ग़ज़ल

  1. kya khoob Azam Sahab..behad umdaa ghazal hui hai..daad qubule’n
    -kanha

  2. kya kahne aazam sahab
    badhiya gazal huii hai

    dher sari daad

    regards

  3. बडी एडवांस गज़ल कही आज़म साहब !! लेकिन भाषा के विकास के लिये ये बहुत ज़रूरी भी है संवाद के और इस तकनीकी युग के शब्द आपने शुमार किये हैं इससे गज़ल की रसाई उन हल्को मे होगी जो अभी इसके लिये गैराआबाद हैं !!!
    कभी टीवी कभी अखबार संभाले हुए हैं
    आज ये दोनों ही सरकार संभाले हुए हैं
    4था कालम सबसे मजबूत है आजकल और ये सच है !!!
    क्यों न हों शहर के बाजार उदासी में ग़र्क़
    लोग अब घर से ही बाज़ार संभाले हुए हैं
    MWAY -flipcart – और नजाने क्या क्या !!!
    अब परखना है जिन्हें देखें बस उनका सेलफ़ोन
    मेमोरी कार्ड सब असरार संभाले हुए हैं
    ताके निसियाँ पे जमी गर्द है सदियों की मगर
    लोग किस शौक से लम्हो की सनद रखते है !!!!
    नैट के दौरे-तरक़्क़ी का तमाशा देखो
    घर के अफ़राद को अग़ियार संभाले हुए हैं
    पहुंच तो जते ही है अगियार इस हवाले से घर तक अब दरवाज़ घर के अन्दर तक आ गया है !!
    आज ”आज़म” हैं यहां जितने भी सोशल साइट्स
    उन पे किरदार को बदकार संभाले हुए हैं
    Virtual world hai !!!
    डॉ मुहम्मद “आज़म” साहब !! रोशनी लकेरो मे कैद नही हो सक्ती और आपने रिवायत की हदें तोडी नही है वरन गज़ल के सरमाये मे इज़ाफा किया है आप्जैसे लोग जब श्रूआत करेंगे तो नई पीढी के हैसला अफज़ई भे होगी और गज़ल को बहुत दूर दूर तक पहचान और स्वेक्रति भी मिलेगी !! ज़फर इकबाल –शिकेब –बानी और जान एलिया सभी ने ऐसा ही किया था अपने अपने समय पर और सभी इस फलक के ताबिन्दा सितारे है !! शुक्रिया और बधाई !!—मयंक

  4. क्यों न हों शहर के बाजार उदासी में ग़र्क़
    लोग अब घर से ही बाज़ार संभाले हुए हैं

    आज़म साहब आज के बदलते दौर की बहुत दिलचस्प तस्वीर बयां की है आपने ग़ज़ल के हर शेर में वाह वाह वाह। मेरी ढेरों दाद कबूल करें
    नीरज

  5. आज़म साहब फिक्र की ताज़गी के हवाले से आपकी दोनों ग़ज़लें ख़ूब हैं. दाद क़ुबूल हो.

  6. वाह…यह भी उम्‍दा।
    नवनीत

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