3 Comments

T-20/35 दीन को धर्म को मक्कार संभाले हुए हैं-डॉ मुहम्मद आज़म

दीन को धर्म को मक्कार संभाले हुए हैं
जो नहीं रोज़ा वो इफ़्तार संभाले हुए हैं

महफ़िले-शेर अदाकार संभाले संभाले हुए हैं
और हम शेर का मेयार संभाले हुए हैं

शेरगोई के सरोकार कहाँ जा पहुंचे
आप अब भी लबो-रुख़सार संभाले हुए हैं

अम्न के दरिया को मसमूम बनाने का फ़र्ज़
कुछ तो इस पार कुछ उस पार संभाले हुए हैं

हाय इंसाफ़ की देवी न कभी देख सकी
अद्ल मुजरिम के तरफ़दार संभाले हुए हैं

हाँ में हाँ सब की मिलाना था बहुत फ़ायदेमंद
फिर भी हम जुर्रते-इंकार संभाले हुए हैं

कुछ ख़बर ही नहीं दस्तार कहाँ जा टपकी
हाँ मगर क़ीमती पैज़ार संभाले हुए हैं

सोने-चांदी के क़लम दे के क़लमकारों को
उन के अफ़कार को ज़रदार संभाले हुए हैं

ताज़ादम रखते हुए ज़ख़्म, लहू से अपने
दिल में हम तुहफ़ा-ए-दिलदार संभाले हुए हैं

फिर कोई हम को पसंद आया नहीं तेरे बाद
आज भी नज़रों का मेयार संभाले हुए हैं

वो उठाये हुए इक हाथ में हैं परचमे-अम्न
और इक हाथ में तलवार संभाले हुए हैं

सरफिरे लिखने लगे खून से तफ़सीरे-जिहाद
दस्ते-मासूम भी हथियार संभाले हुए हैं

नामलेवा नहीं संसार में उनका ”आज़म”
जिनको लगता था वो संसार संभाले हुए हैं

मसमूम=ज़हरीला, पैज़ार=झूठा

डॉ मुहम्मद आज़म 09817531331

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

3 comments on “T-20/35 दीन को धर्म को मक्कार संभाले हुए हैं-डॉ मुहम्मद आज़म

  1. आज़म साहब !! मुँतज़िर मैं ही नही सभी थे इस गज़ल के !! उस्ताद की गज़ल – विचारक की गज़ल – सामाजिक सरोकार के प्रति बेहद संजीदा और गज़ल के एक निर्विवाद श्रेष्ठ अज़ीम शाइर की गज़ल है ये !!
    दीन को धर्म को मक्कार संभाले हुए हैं
    जो नहीं रोज़ा वो इफ़्तार संभाले हुए हैं
    सभी से गुज़ारिश है कि सानी मिसरे की गढन पर गौर करें !!! ऊला इसकी तश्रीह है !!! वाह वाह आज़म साहब वाह वाह !!! और हम सभी सहमत हैं कि ये अलमीया है दौरे हाज़िर का !!!!
    महफ़िले-शेर अदाकार संभाले संभाले हुए हैं
    और हम शेर का मेयार संभाले हुए हैं
    अश्जार की जडॉ की तरह — जड हमेशा गुम रही तारीफ फूलो की हुई है
    फूल कहते है हमारी जड बडी ही जड रही है
    यानी जिनके प्यार की बुनियाद पर मैखाना बनता है उनका साकी से कोई रब्त ही नही !!! साक़ी तो औरो पर मेहरबान है !!! लेकिन इसके पीछे समाज की अल्पज्ञता और उसका कमनज़र होना भी है !! मंच पर तो अभिनेता शाइर काबिज़ है और मेयार सम्हालने वाले सांकरी गलियों मे हैं !!!
    शेरगोई के सरोकार कहाँ जा पहुंचे
    आप अब भी लबो-रुख़सार संभाले हुए हैं
    इस तरही के आगाज़ पर ही तुफैल साहब ने कह दिया था –अब ग़ज़ल चाँद सितारो के परे जा पहुंची ….रिवायत से सरोकार अच्छा है –लेकिन रूढियों से चिपके रहना लबो रुख़सार तक महदूद रहना दकियानूसी ही है !! वाह आज़म साहब !!!
    अम्न के दरिया को मसमूम बनाने का फ़र्ज़
    कुछ तो इस पार कुछ उस पार संभाले हुए हैं
    बिल्कुल है –उधर हाफिज़, दाऊद, असगर मसूद वगैरह हैं तो इधर तोगडिया, साध्वी और मोदsss…… छोडो दीवार की इबारत को क्या बताना !!! शेर बहुत खूब है आज़म साहब
    हाय इंसाफ़ की देवी न कभी देख सकी
    अद्ल मुजरिम के तरफ़दार संभाले हुए हैं
    उसकी आँखो पे पट्टी है और हाथ मे तलवार –सच कहूँ मुझे इंसाफ की देवी से डर लगता है मालिक !!!!
    हाँ में हाँ सब की मिलाना था बहुत फ़ायदेमंद
    फिर भी हम जुर्रते-इंकार संभाले हुए हैं
    सुभाव की बात है –मेरी आवाज़ सुनी जाय सुनी ना जाये // मेरा लहजा कभी फरियाद नही हो सकता ( मरहूम वाली असी)
    कुछ ख़बर ही नहीं दस्तार कहाँ जा टपकी
    हाँ मगर क़ीमती पैज़ार संभाले हुए हैं
    सौदा बुरा नही है दस्तार के लिये कभी सर का सौदा भी करना पड सकता है –आज बेशतर ताजिर इसी ख्याल को पनाह दे रहे है और ईमान ज़मीर खूब बेच रहे है लोग अपने !!!!
    सोने-चांदी के क़लम दे के क़लमकारों को
    उन के अफ़कार को ज़रदार संभाले हुए हैं
    एक कडवी हक़ीकत !!! लेकिन हम सभी जानते है इसको !!!!!
    ताज़ादम रखते हुए ज़ख़्म, लहू से अपने
    दिल में हम तुहफ़ा-ए-दिलदार संभाले हुए हैं
    फिर कोई हम को पसंद आया नहीं तेरे बाद
    आज भी नज़रों का मेयार संभाले हुए हैं
    नज़रो का मेयार –ये जुमला कीमती है –बेनाइयो की भाँति शिल्प बहुत उत्कृष्ट है !!!!
    वो उठाये हुए इक हाथ में हैं परचमे-अम्न
    और इक हाथ में तलवार संभाले हुए हैं
    स्वयंभू इंसाफ के देवता की ये तस्वीर है –लेकिन आज़म साहब !! गौर कीजिये बडी बैलेंस्ड पर्स्नाल्टी लगती है –एक हाथ मे परचमे अम्न और दूसरे मे तलवार !! 50-50 !!!!
    सरफिरे लिखने लगे खून से तफ़सीरे-जिहाद
    दस्ते-मासूम भी हथियार संभाले हुए हैं
    अल जज़ीरा मे मिस्र, सीरिया, यमन , नाइजीरिया , ईराक और मिडिल ईस्ट के सभी मनाज़िर ऐसे ही दीख पड रहे हैं और मिडिल ईस्ट क्या हालात तो हर जगह के नाज़ुक हैं !!!
    नामलेवा नहीं संसार में उनका ”आज़म”
    जिनको लगता था वो संसार संभाले हुए हैं
    बिछती थीं जिसकी राह मे फूलो की चादरे
    अब उसकी ख़ाक घास के पैरों तले भी देख
    आलम मे जिसकी धूम थी उस शाहकार पे
    दीमक ने जो लिखे कभी वो तब्सिरे भी देख – शिकेब

    आज़म साहब !!! और कुछ नहीं कहूंगा !! सूरज को चराग़ दिखाना थेक नहीं –सादर मयंक

  2. अच्‍छी ग़ज़ल के लिए दाद स्‍वीकार करें डॉ. आज़म साहब।
    सादर
    नवनीत

  3. अच्छे अश’आर हुए हैं आज़म साहब। दाद कुबूल करें

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: