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T-20/34 अपनी तहज़ीब लगातार संभाले हुऐ हैं-साजिद प्रेमी

अपनी तहज़ीब लगातार संभाले हुऐ हैं
इस विरासत को कलाकार संभाले हुऐ हैं

जिन के हाथों मैं कभी फूल हुआ करते थे
अब वो तिरशूल वो तलवार संभाले हुऐ हैं

फ़िक्र इतनी है भली सोच के इंसान मिलें
क्या करें देश को बीमार संभाले हुऐ हैं

आज उस्ताद बने फिरते हैं कुछ लोग यहाँ
आप अपना ही जो परचार संभाले हुऐ हैं

विष दिमाग़ों मैं भरा है तो विषैले हैं वो
और कुछ होंठों पे उदगार संभाले हुऐ हैं

है निराकार के आदेश का पालन यह भी
शीश पर अपने जो संसार संभाले हुऐ हैं

मैं यही सोच के पढ़ता हूँ ग़ज़ल महफ़िल मैं
नापने मिसरों को परकार संभाले हुऐ हैं

साजिद प्रेमी

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5 comments on “T-20/34 अपनी तहज़ीब लगातार संभाले हुऐ हैं-साजिद प्रेमी

  1. साजिद प्रेमी—आपकी गज़ल बहुत अपील कर गई !! इसकी भाषा रोचक और नई और इसके विचार स्वीकार्य और शिरोधार्य है !!! इस भाषा के विकास और सपाट्बयानी मे छिपी तहदारी का काइल हुआ हूँ !!
    अपनी तहज़ीब लगातार संभाले हुऐ हैं
    इस विरासत को कलाकार संभाले हुऐ हैं
    साहित्य संगीत कला विहीन: साक्षात पशु पुछ्छ विशाण हीन: –इन्हे कारणो से तो दुनिया आबाद है काव्य्शास्त्र विनोदेन कालो गच्छ्ति धीमताम !!!! मतला नया और उजला और तस्लीम !!!
    जिन के हाथों मैं कभी फूल हुआ करते थे
    अब वो तिरशूल वो तलवार संभाले हुऐ हैं
    बेशक !!!
    फ़िक्र इतनी है भली सोच के इंसान मिलें
    क्या करें देश को बीमार संभाले हुऐ हैं
    ऐ दोस्त सियासत मे भलाई न मिलेगी
    कीचड को मथोगे तो मलाई न मिलेगी !!!
    कही हम मे ही कुछ कम है जो देश को बीमार सम्हाले हुये हैं !!! र
    आज उस्ताद बने फिरते हैं कुछ लोग यहाँ
    आप अपना ही जो परचार संभाले हुऐ हैं
    तिजारत है भई !!! विज्ञापन का युग है 15 पैसे का ब्रोमिक एसिड ड्रिक के नाम पर 10 रू मे बिकता है !!
    है निराकार के आदेश का पालन यह भी
    शीश पर अपने जो संसार संभाले हुऐ हैं
    सब कुछ उसी की मर्जी से है !!!
    मैं यही सोच के पढ़ता हूँ ग़ज़ल महफ़िल मैं
    नापने मिसरों को परकार संभाले हुऐ हैं
    कफियो के इस्तेमाल के साहस पर दाद !! ये काफिये और किसी ने नही इस्तेमाल किये !! नावेल्ती है इस गज़ल मे !! –साजिद भई बधाई !!-मयंक

  2. बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है। दाद कबूल करें।

  3. कुछ शे’र दाद के अधिकारी हैं लेकिन प्रचार का परचार हो जाना मेरे जैसे विद्यार्थी के लिए सवाल है।
    सादर
    नवनीत

  4. बात करते है तहजीब की मगर
    खाया जिस थाली में उसी में छेद चार संभाले हुए है।

  5. ले कर ए थे तीर और तलवार वो हमलावर कभी
    आज बम और रॉकेट वो गद्दार संभाले हुए है।

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