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T-20/33 हौसला बरसरे-पैकार संभाले हुए हैं-पवन कुमार

हौसला बरसरे-पैकार संभाले हुए हैं
ज़ख़्म हम खा के भी तलवार संभाले हुए हैं

हो गया कब का जहाँगीर फ़ना दुनिया से
“आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

जाने किस वक़्त ये गिर जाए मकाँ मिट्टी का
हम फ़क़त जिस्म की दीवार संभाले हुए हैं

जैसे हम दिखते हैं वैसे नहीं हरगिज़ यारो
बस किसी ज़िद में ये किरदार संभाले हुए हैं

एक इक बूँद को मुद्दत से तरसती है ज़मीं
कैसे बादल हैं जो बौछार संभाले हुए हैं

ख़ुश्क लम्हात ने सरसब्ज़ किया है जिनको
हम उन्हीं यादों का अम्बार संभाले हुए हैं

आ गया जिस्म में ख़म झुक गयी गरदन मेरी
उस पे ख़ुशफ़हमी कि दस्तार संभाले हुए हैं

मैं मुसाफ़िर हूँ सफ़र है मिरा साये साये
धूप के वार को अश्जार संभाले हुए हैं

घटते बढ़ते हैं यहाँ भाव हमारे दम से
हम ही क्या रौनक़े-बाज़ार संभाले हुए हैं

पवन कुमार 09412290079

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20 comments on “T-20/33 हौसला बरसरे-पैकार संभाले हुए हैं-पवन कुमार

  1. kya hi jabardast ghazal kahi hai bhaiya

    जाने किस वक़्त ये गिर जाए मकाँ मिट्टी का
    हम फ़क़त जिस्म की दीवार संभाले हुए हैं
    Ahaa ..lajawab she’r

    जैसे हम दिखते हैं वैसे नहीं हरगिज़ यारो
    बस किसी ज़िद में ये किरदार संभाले हुए हैं
    behad umdaa..

    मैं मुसाफ़िर हूँ सफ़र है मिरा साये साये
    धूप के वार को अश्जार संभाले हुए हैं

    waah waah..kya kehne

    घटते बढ़ते हैं यहाँ भाव हमारे दम से
    हम ही क्या रौनक़े-बाज़ार संभाले हुए हैं
    sachha she’r..ahhaa

    dher sari daad..sadar
    -kanha

  2. wah wah wah janaab, bahot khoob, kya baat hai, bilkul munfarid andaaz ke ashaar nikale hain aap ne, achhi ghazal ke liye bharpoor daad qubool farmaaen

  3. Pawan sahab
    Matla ta maqta Khoobsoorat ghazal ke liye se dili daad qubool farmayen. Bejod girah. Eitihasik sandarbh ke sath daure hazir ki akkassee khoob hai. Kirdar,ashzar qafiyon vale sher behad pasand aaye

  4. जाने किस वक़्त ये गिर जाए मकाँ मिट्टी का
    हम फ़क़त जिस्म की दीवार संभाले हुए हैं

    जैसे हम दिखते हैं वैसे नहीं हरगिज़ यारो
    बस किसी ज़िद में ये किरदार संभाले हुए हैं

    एक इक बूँद को मुद्दत से तरसती है ज़मीं
    कैसे बादल हैं जो बौछार संभाले हुए हैं
    आदरणीय पवन साहब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है |ढेरों दाद कबूल फरमावें |

  5. हौसला बरसरे-पैकार संभाले हुए हैं
    ज़ख़्म हम खा के भी तलवार संभाले हुए हैं
    है तमन्ना यही कि बरसरे पैकार रहें
    तुम मुकाबिल रहो हम आइना बरदार रहें –वज़ीर आगा
    पवन साहब !! बहुत अच्छा ट्विस्ट है शेर मे !!! submission नही है ललकार है !! इसलिये मुझे ये नय उभरता हुआ लहजा बहुत भाया !!!
    हो गया कब का जहाँगीर फ़ना दुनिया से
    “आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”
    अदल के लिये अब ज़ंजेर हिलाने वालो के सर कलम ही हो जाते है !! अब जहाँ गीर कहाँ कि कि कोई भी ज़ंजीर हिला दे और इंसाफ मिल जाये !! कहाँ इतिहास से आप ने ये खूबसूरत कहानी उठा ली पवन साहब !!! नई गिरह और बहुत सुन्दर !!!
    जाने किस वक़्त ये गिर जाए मकाँ मिट्टी का
    हम फ़क़त जिस्म की दीवार संभाले हुए हैं
    ये उन आँखों का सहरा कह रहा है
    कोई दरिया भी नीचे बह रहा है
    बदन को साँस की कीमत चुका कर
    किराये दार घर मे रह रहा है –मयंक
    दोनो मिसरो का रब्त बहुत उम्दा है और शेर भी !!!
    जैसे हम दिखते हैं वैसे नहीं हरगिज़ यारो
    बस किसी ज़िद में ये किरदार संभाले हुए हैं
    क्या बात !!! अपनी वास्तविकता पर आ जाये तो सभी के तई सच वहीं है जो आपने इसके ऊपर के शेर मे बयाँ किया है मिट्टी का ही तो जिस्म है –लेकिन उसके नूर से इसमे हरकत है और हम कोई न कोई किरदार ढो रहे है –वाह !!!
    एक इक बूँद को मुद्दत से तरसती है ज़मीं
    कैसे बादल हैं जो बौछार संभाले हुए हैं
    अबके सावन मे शरारत ये मेरे सात हुई
    मेर घर छोड के कुल शहर मे बरसात हुई !!! –नीरज
    ख़ुश्क लम्हात ने सरसब्ज़ किया है जिनको
    हम उन्हीं यादों का अम्बार संभाले हुए हैं
    किसी का खून किसी की प्यास बुझाता है –कुहसार के अश्को से आबशारो की रवानी है और इसके दरिया बनए के बाद समन्दर आबद होते है !! इसलिये खुश्क लम्हो ने जिन्हे सरसब्ज़ किया है -ये मिसरा बहुत खूब है !!!
    आ गया जिस्म में ख़म झुक गयी गरदन मेरी
    उस पे ख़ुशफ़हमी कि दस्तार संभाले हुए हैं
    वैसे ज़रूरी है इतने शहादत दस्तार के लिये !! जो कि खुशफहमी ही है –एक तेज़ झोंका इसे उछाल सकता है !!
    मैं मुसाफ़िर हूँ सफ़र है मिरा साये साये
    धूप के वार को अश्जार संभाले हुए हैं
    शिल्प बहुत भाया –शिल्हूट्स शेदस की पेंटिंग सा लग रहा है शेर !!! मंज़र दिलकश है !!!
    घटते बढ़ते हैं यहाँ भाव हमारे दम से
    हम ही क्या रौनक़े-बाज़ार संभाले हुए हैं
    ख़ल्कत को ये कहने का हक है लेकिन उसे इस बात अप्र यकीन नही !!! किसे वज़ीर किसे प्यादा बना दे हमारा ही दम है !!!
    पवन साहब बहुत खूब !! बहुत खूब हर शेर काबिले दाद कहा है आपने !!!! –मयंक

    • ये उन आँखों का सहरा कह रहा है
      कोई दरिया भी नीचे बह रहा है
      बदन को साँस की कीमत चुका कर
      किराये दार घर मे रह रहा है…..
      it was a spot where I stucked and still stucked when I was reading your detailed comment on my Ghazal.
      Regards for your kind words.
      Thanks….. Thanks and once again thanks !

  6. बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है पवन जी। गिरह बहुत उम्दा है। जहांगीर के उपस्थिति नें शेर को अलग सा रंग दे दिया है। बस किसी ज़िद में… ये शेर और मैं मुसाफ़िर हूँ.. भी बेहद पसंद आये। दाद क़ुबुलें।

  7. आ गया जिस्म में ख़म झुक गयी गरदन मेरी
    उस पे ख़ुशफ़हमी कि दस्तार संभाले हुए हैं
    लाजवाब भाई वाह। बहुत कमाल ग़ज़ल हुई है। दाद कबूल करें

  8. आ गया जिस्म में ख़म झुक गयी गरदन मेरी
    उस पे ख़ुशफ़हमी कि दस्तार संभाले हुए हैं…..क्या कहने पवन साहब!पूरी ग़ज़ल मंझी हुई और रवां-दवां है. ढेरों दाद.

  9. आ. पवन साहब।
    नमस्‍कार।

    क्‍या ही अच्‍छी ग़ज़ल हुई । सारे अश्‍आर बहुत अच्‍छे हैं, दिल से निकले हुए लेकिन ये पांच शे’र तो जैसे रूह तक उतर गए, वहीं बस गए :

    जाने किस वक़्त ये गिर जाए मकाँ मिट्टी का
    हम फ़क़त जिस्म की दीवार संभाले हुए हैं

    जैसे हम दिखते हैं वैसे नहीं हरगिज़ यारो
    बस किसी ज़िद में ये किरदार संभाले हुए हैं

    एक इक बूँद को मुद्दत से तरसती है ज़मीं
    कैसे बादल हैं जो बौछार संभाले हुए हैं

    ख़ुश्क लम्हात ने सरसब्ज़ किया है जिनको
    हम उन्हीं यादों का अम्बार संभाले हुए हैं

    आ गया जिस्म में ख़म झुक गयी गरदन मेरी
    उस पे ख़ुशफ़हमी कि दस्तार संभाले हुए हैं

    एक से बढ़ कर एक……….। क्‍या भाव, क्‍या कहन …आहा…।
    आपको पुन: नमस्‍कार।

  10. bahut khoob ,bas kisi zid mei’n ye kirdaar sambhale hue hai’n wah

  11. अच्छे अश’आर हुए हैं पवन साहब। दाद कुबूल करें।

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