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T-20/30 रम्ज़ की राह की रफ़्तार सम्हाले हुये हैं-नवीन सी. चतुर्वेदी-दूसरी ग़ज़ल

रम्ज़ की राह की रफ़्तार सम्हाले हुये हैं
वाक़ई आप तो बाज़ार सम्हाले हुये हैं

हम से उठता ही नहीं बोझ पराये ग़म का
हम तो बस अपने ही विस्तार सम्हाले हुये हैं

एक दिन ख़ुद को सजाना है तेरे ज़ख़्मों से
इसलिये सारे अलंकार सम्हाले हुये हैं

आह, अरमान, तलाश और तसल्ली का भरम
अपना सन्सार यही चार सम्हाले हुये हैं

वो सुधर जायें तो शुरूआत सुधरने की हो
अरबों-खरबों को जो दो-चार सम्हाले हुये हैं

नवीन सी. चतुर्वेदी 09967024593

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13 comments on “T-20/30 रम्ज़ की राह की रफ़्तार सम्हाले हुये हैं-नवीन सी. चतुर्वेदी-दूसरी ग़ज़ल

  1. Navin Bhai
    i always feel something new to read you…. this time its happening again….

    एक दिन ख़ुद को सजाना है तेरे ज़ख़्मों से
    इसलिये सारे अलंकार सम्हाले हुये हैं
    अलंकार ….. what a excellent use of this word ! naman

    आह, अरमान, तलाश और तसल्ली का भरम
    अपना सन्सार यही चार सम्हाले हुये हैं
    waah …. plenty lovable !!1

  2. एक दिन ख़ुद को सजाना है तेरे ज़ख़्मों से
    इसलिये सारे अलंकार सम्हाले हुये हैं
    kya kahne Dada …..khoobsoorat sher
    is zamiin me do do gazal waahh waah

    dher saari daad

    regards

  3. रम्ज़ की राह की रफ़्तार सम्हाले हुये हैं
    वाक़ई आप तो बाज़ार सम्हाले हुये हैं

    एक दिन ख़ुद को सजाना है तेरे ज़ख़्मों से
    इसलिये सारे अलंकार सम्हाले हुये हैं

    भाई नवीन की नवीन काफियों से सजी ये ग़ज़ल बहुत नवीनता लिए हुए है – ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद

  4. यह कमाल आप ही के बस में है मयड़्क भैया। हर ग़ज़ल को न सिर्फ़ पढना बल्कि उस की तफ़्तीश भी करना; बयान की हिडिन प्रोपर्टीस को इवेल्युएट करना – यह आप ही कर सकते हैं। नमन

  5. यह कमाल आप ही के बस में ह

  6. आदरणीय द्विज जी, स्वप्निल, धरम प्रा जी, शफ़ीक भाई बहुत-बहुत शुक्रिया।

  7. नवीन भाई आपने बिलकुल नए काफिये बाँध कर इस सख्त ज़मीन के इम्कानात दर्शाए हैं. मुबारकबाद और दाद!

  8. नवीन दूसरा शतक मुबरक हो इस मैच का –लेकिन इसके स्ट्रोक बिल्कुल नये और बहुत खूब्सूरत है !! तुमने इस बार बिल्कुल सीधे बल्ले से स्ट्रेट ड्राइव मारे है और सभी बार गेन्द बाउन्द्री के बहर गई है !!!
    रम्ज़ की राह की रफ़्तार सम्हाले हुये हैं
    वाक़ई आप तो बाज़ार सम्हाले हुये हैं
    मैने बगदाद की सूरत पे उसे दाद न दी // मेरी ज़ुर्रत पे है नाराज़ खलीफा मुझसे !! लेकिन वो तो रम्ज़ की राह की रफ्तर भी सम्हाले है और कोई ताज़्ज़ुब नही कि आगे बाज़ार भी वही सम्हाले !! कैसे पढ लेते हो बहते पानी की तहरीरे !!! ?? बहुत खूब शेर कहा है !!!
    हम से उठता ही नहीं बोझ पराये ग़म का
    हम तो बस अपने ही विस्तार सम्हाले हुये हैं
    ये सच है और जो सारे जहाँ का दर्द अपने जिगर मे होने के दावेदार है –या तो फैंतेसी मे जीते है या झूठे है !!! विस्तार शब्द के इस्तेमाल पर ढेर सारी दाद !!
    एक दिन ख़ुद को सजाना है तेरे ज़ख़्मों से
    इसलिये सारे अलंकार सम्हाले हुये हैं
    बहुत सुन्दर बहुत सुन्दर !! क्या बात है क्या बात है !!!
    आह, अरमान, तलाश और तसल्ली का भरम
    अपना सन्सार यही चार सम्हाले हुये हैं
    चार पर एक शेर और आया है इसी तरही मे !! सैफी साहब का तब बयान मे यही कहा थ मैने कि चार की निशान्देही मुख़्तलिफ होगी !!!
    वो सुधर जायें तो शुरूआत सुधरने की हो
    अरबों-खरबों को जो दो-चार सम्हाले हुये हैं
    बहुत खूब बहुत खूब !! काफियों ने इस गज़ल को खूबसूरत भी कर दिया और सबसे अलग भी !!! –मयंक

  9. आदरणीय भाई साहब। दाद कुबूल कीजिए।
    सादर
    नवनीत

  10. क्या ही खूबसूरत अश’आर हुए हैं नवीन भाई। दाद कुबूल कीजिए

  11. एक दिन ख़ुद को सजाना है तेरे ज़ख़्मों से
    इसलिये सारे अलंकार सम्हाले हुये हैं WAAH KYA KAHNE JANAAB, KHOOB,

  12. ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई। अलंकार वाला शे’र सोने पे सुहागा।

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