14 टिप्पणियाँ

T-20/29 तुझ को तेरे ही ख़तावार सम्हाले हुये हैं-नवीन सी. चतुर्वेदी

तुझ को तेरे ही ख़तावार सम्हाले हुये हैं
दिल तेरी बज़्म को दिलदार सम्हाले हुये हैं

इश्क़ एक ऐसी अदालत है जिसे जनमों से
उस के अपने ही गुनहगार सम्हाले हुये हैं

जब भी गुलशन से गुजरता हूँ ख़याल आता है
बे-वफ़ाओं को वफ़ादार सम्हाले हुये हैं

तोड़ ही देती अदावत तो न जाने कब का
प्यार के तारों को फ़नकार सम्हाले हुये हैं

बीसियों लोग हैं घर-बार सम्हाले हुये और
बीसियों लोगों को घर-बार सम्हाले हुये हैं

नवीन सी. चतुर्वेदी 09967024593

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14 comments on “T-20/29 तुझ को तेरे ही ख़तावार सम्हाले हुये हैं-नवीन सी. चतुर्वेदी

  1. Bahut achhi ghazal hui hai Dada…sare she’r khoob hain..daad qubule’n..sadar
    -Kanha

  2. जब भी गुलशन से गुजरता हूँ ख़याल आता है
    बे-वफ़ाओं को वफ़ादार सम्हाले हुये हैं

    तोड़ ही देती अदावत तो न जाने कब का
    प्यार के तारों को फ़नकार सम्हाले हुये हैं
    आदरणीय नवीन भाईसाहब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है |दिलिदाद कबूल फरमावें |

  3. तुझ को तेरे ही ख़तावार सम्हाले हुये हैं
    दिल तेरी बज़्म को दिलदार सम्हाले हुये हैं
    नवीन !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!दिलदार उधर के ज़ाविये से खतावार हैं !! वगर्ना अपनी नज़र मे तो उस अकेदे के परस्तार है !! बहुत ही सुन्दर बहुत ही सुन्दर कहा है !!
    इश्क़ एक ऐसी अदालत है जिसे जनमों से
    उस के अपने ही गुनहगार सम्हाले हुये हैं
    ऐसा क्यों होता है !! मुहब्बत में !! फिर एक बेहतरीन शेर कहा है !!! मैं ही मुजरिम हूँ मैं ही मुंसिफ हूँ // कोई सूरत नही रिहाई की और ये कश्मकश कभी न खत्म होने वाली है वाह !!!
    जब भी गुलशन से गुजरता हूँ ख़याल आता है
    बे-वफ़ाओं को वफ़ादार सम्हाले हुये हैं
    वो ज़िन्दगी थी इसलिये हमने निभा दिया
    उस बेवफा का संग वफाओ के साथ साथ
    गुलशन मे फूल तितलियों को और कलियाँ भौंरो को सम्हाले रहती हैं!! क्या बात है क्या बात है गुरू !! छा गये !!! छा गये गुरू !!!
    तोड़ ही देती अदावत तो न जाने कब का
    प्यार के तारों को फ़नकार सम्हाले हुये हैं
    सनी मिसरे पर दाद दाद !! शेर भी बढिया कहा है !!
    नवीन मुझे तुम पर नाज़ है !! मयंक

  4. भाई साहब। इस ग़ज़ल के लिए भी बहुत सी दाद स्‍वीकार करें।
    सादर
    नवनीत

  5. ये ग़ज़ल भी अच्छी हुई है नवीन भाई। दाद कुबूल करें।

  6. जब भी गुलशन से गुजरता हूँ ख़याल आता है
    बे-वफ़ाओं को वफ़ादार सम्हाले हुये हैं
    KHOOB HAI JANAAB

  7. इश्क़ एक ऐसी अदालत है जिसे जनमों से
    उस के अपने ही गुनहगार सम्हाले हुये हैं.. bahut umda she’r hua hai navin ji… kya kahne..

  8. यह ग़ज़ल भी ख़ूब है नवीन भाई।

    तोड़ ही देती अदावत तो न जाने कब का
    प्यार के तारों को फ़नकार सम्हाले हुये हैं।

    बधाई

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