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T-20/28 राग दीपक हो के मल्हार संभाले हुए हैं-असरार उल हक़ “असरार”

राग दीपक हो के मल्हार संभाले हुए हैं
साज़े-जां तेरा हरिक तार संभाले हुए हैं

तेरा ग़म तेरे तलबगार संभाले हुए हैं
यानी हर लज़्ज़ते-आज़ार संभाले हुए हैं

लाख बोसीदा-ओ-फ़र्सूदा हो पिंदारे-ख़ुदी
अपने सर अपनी ये दस्तार संभाले हुए हैं

देखना ये है भरेगा कि रहेगा ख़ाली
हम भी इक ज़र्फे-क़दहख़ार संभाले हुए हैं

एक मुद्दत से हैं बीनाइयाँ ज़ख़्मी लेकिन
ख़ाब तेरे तिरे बेदार संभाले हुए हैं

तेरे होठों पे जो भूले से कभी बिखरी थी
हम वही ख़ुश्बू-ए-इक़रार संभाले हुए हैं

तुम से कह पायें किसी तौर कुछ अपने दिल की
कबसे ये हसरते-गुफ़्तार संभाले हुए हैं

कजअदाई का चलन हो कि तिरा शौक़े-सितम
तुझसे जितने हैं सरोकार संभाले हुए हैं

दिल का गाहक न मिला है न मिलेगा मालूम
हम तो बस तुहमते-बाज़ार संभाले हुए हैं

जिनको मालूम है क्या शय है ग़ज़ल की तहज़ीब
वो अभी शेर का मेयार संभाले हुए हैं

कुछ ख़ुदाई की खबर है न ख़ुदा का अहसास
लोग तस्बीह या ज़ुन्नार संभाले हुए हैं

ग़र्क़ हो जाता अंधेरों में कभी का “असरार”
कुछ उजालों के तरफ़दार संभाले हुए हैं

असरार उल हक़ “असरार”                                              09410274896

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8 comments on “T-20/28 राग दीपक हो के मल्हार संभाले हुए हैं-असरार उल हक़ “असरार”

  1. Asraar sahab kya hi umda gazal huii hai
    matla to behad hi khoobsoorat hai
    waahh waahh

    dher sari daad
    regards

  2. राग दीपक हो के मल्हार संभाले हुए हैं
    साज़े-जां तेरा हरिक तार संभाले हुए हैं

    तेरा ग़म तेरे तलबगार संभाले हुए हैं
    यानी हर लज़्ज़ते-आज़ार संभाले हुए हैं

    एक मुद्दत से हैं बीनाइयाँ ज़ख़्मी लेकिन
    ख़ाब तेरे तिरे बेदार संभाले हुए हैं

    ऐसे बेमिसाल शेरों की तारीफ़ के लिए लफ्ज़ बने ही नहीं इन्हें सिर्फ महसूस कर के ही दिली दाद दी जा सकती है। लाजवाब ग़ज़ल। बेहद उम्दा

  3. राग दीपक हो के मल्हार संभाले हुए हैं
    साज़े-जां तेरा हरिक तार संभाले हुए हैं
    बिल्कुल नया बयान नया नदाज़ और बेहद कारगर और मुख्तलिफ मतला !! क्या गढन है इस शेर की !! दाद !!!
    तेरा ग़म तेरे तलबगार संभाले हुए हैं
    यानी हर लज़्ज़ते-आज़ार संभाले हुए हैं
    लज़्ज़ते-आज़ार ??!! इसी एक मोती से क्या ज़ीनत बख़्श दी आपने शेर को !! वाह !!
    लाख बोसीदा-ओ-फ़र्सूदा हो पिंदारे-ख़ुदी
    अपने सर अपनी ये दस्तार संभाले हुए हैं
    यहाँ यकीनन खुदा बन्दे से पूछेगा कि बता तेरी रज़ा क्या है !!!!
    देखना ये है भरेगा कि रहेगा ख़ाली
    हम भी इक ज़र्फे-क़दहख़ार संभाले हुए हैं
    भरेगा !!! शर्त लगा लीजिये !!
    एक मुद्दत से हैं बीनाइयाँ ज़ख़्मी लेकिन
    ख़ाब तेरे तिरे बेदार संभाले हुए हैं
    मुझे सम्झ नही आता मै इस शेर की कैसे तारीफ करूँ –अल्फाज़ महदूद है मेरे पास और अहसास को इस शेर ने लबाबलब भर दिया है –कुछ ताजमहल होते है !!साने मे तसाद है और ज़ख़्मी बीनाइयाँ लफ्ज़ बोल रहे है!!!
    तेरे होठों पे जो भूले से कभी बिखरी थी
    हम वही ख़ुश्बू-ए-इक़रार संभाले हुए हैं
    अब भूले से बिखरी ने क्या वुस अत दे दी ख्याल को !!! शीशागरी को सलाम !!!
    तुम से कह पायें किसी तौर कुछ अपने दिल की
    कबसे ये हसरते-गुफ़्तार संभाले हुए हैं
    हाथ आयें तो उन्हें हाथ लगाये न बने !!! बहुत खूब !!
    कजअदाई का चलन हो कि तिरा शौक़े-सितम
    तुझसे जितने हैं सरोकार संभाले हुए हैं
    कज़ अदाई और शौके सितम यही सरोकार हैं – अल्फाज़ जहाँ खामोश है बहाँ से बयान सुनना कितना दिलक्श होता है !! शेर का पसमंज़र बहुत खूब है !!
    दिल का गाहक न मिला है न मिलेगा मालूम
    हम तो बस तुहमते-बाज़ार संभाले हुए हैं
    इक आग का दरिया है और डूब के जाना है !!
    जिनको मालूम है क्या शय है ग़ज़ल की तहज़ीब
    वो अभी शेर का मेयार संभाले हुए हैं
    परचम आप जैसो के हाथ मे ही है मुहत्तरम !!!
    कुछ ख़ुदाई की खबर है न ख़ुदा का अहसास
    लोग तस्बीह या ज़ुन्नार संभाले हुए हैं
    कई सिर है टोपी के मुँह मे अभी
    कई गर्दनें दामे जुन्नार मे
    यहाँ इक चमन था जो गुम हो गया
    इन्हे ज़र्द पत्तो के अम्बार मे
    ग़र्क़ हो जाता अंधेरों में कभी का “असरार”
    कुछ उजालों के तरफ़दार संभाले हुए हैं
    बहुत सुन्दर और तख़्ल्लुस का बेहतरीन इस्तेमाल !!!
    असरार उल हक़ “असरार” साहब !! ग़ज़ल मुद्दतो आबाद रहेगी !!! –मयंक

  4. वाह उस्‍ताद।
    इससे अधिक कहने में नहीं आ रहा है कुछ।
    सादर
    नवनीत

  5. हर शे’र शानदार है असरार साहब। किसकी तारीफ़ करूँ और किसको छोड़ूँ। दिली दाद कुबूल कीजिए

  6. GHAZAL KE TAMAAM ASH’AAR MATLA TA MAQTA KHOOB HAI’N ASRAAR SAAHAB,
    AAP KI GHAZAL KE IS SHER SE AAP KI KHIDMAT ME’N ” DAAD ” PESH KAR RAHA HOO’N, QABOOL FARMAAYE’N.

    जिनको मालूम है क्या शय है ग़ज़ल की तहज़ीब
    वो अभी शेर का मेयार संभाले हुए हैं
    ”MUBAARAKBAAD”

  7. असरार भाई साबित कर दिया कि उस्ताद उस्ताद ही होते हैं. किस किस शेर की तारीफ़ करूँ ? मतला ता मक़्ता हर शेर क़यामत. ज़बान ऐसी कि अहले-लखनऊ रश्क करें. अज़ीज़ो सीखिये कि ज़बान क्या होती है और उसको कैसे बरता जाता है. वाह वाह

    दिल का गाहक न मिला है न मिलेगा मालूम
    हम तो बस तुहमते-बाज़ार संभाले हुए हैं

  8. acchi ghazal hui hai asrar sahab.. matle par bataure khaas daad qubulen

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