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T-20/27 यादगारे-गुलो-गुलज़ार संभाले हुए हैं-अभय कुमार “अभय”

यादगारे-गुलो-गुलज़ार संभाले हुए हैं
ज़र्द पत्तों का इक अम्बार संभाले हुए हैं

नूर ही नूर था हर सम्त कहीं कुछ नहीं था
अंधी आँखों में वो दीदार संभाले हुए हैं

ज़रपरस्तों को ही दाना भी कहा जाता है
हमसे दीवाने तो किरदार संभाले हुए हैं

जितनी गुज़री है तिरे ग़म में वो अच्छी गुज़री
अब तो हर सांस को नाचार संभाले हुए हैं

ज़ख़्म-दर-ज़ख़्म है दिल पहलू-ब-पहलू लेकिन
नावके-नाज़ का हर वार संभाले हुए हैं

बोझ लगता था जिन्हें साया-ए-दीवार कभी
आज गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

तेरी महफ़िल का अजब रंग अजब रूप हुआ
जब से कुछ हाशिया-बरदार संभाले हुए हैं

बेचते फूल हैं काँटों के इवज़ हम ऐ ‘अभय’
गुलशने-ज़ीस्त का व्योपार संभाले हुए हैं

अभय कुमार “अभय”                            08171611298

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7 comments on “T-20/27 यादगारे-गुलो-गुलज़ार संभाले हुए हैं-अभय कुमार “अभय”

  1. मतले से मक्ते का निहायत खुशगवार सफर है आपकी ग़ज़ल। एक एक शेर बहुत कारीगरी से तलाशे गए हैं तभी हीरे की तरह जगमग जगमग कर रहे हैं। बहुत ही उम्दा ग़ज़ल कही है आपने…ढेरों दाद

  2. यादगारे-गुलो-गुलज़ार संभाले हुए हैं
    ज़र्द पत्तों का इक अम्बार संभाले हुए हैं
    मतला क्या खूब है क्या सिमिली है सानी मिसरे मे !1 वाह अभय साहब !!!
    नूर ही नूर था हर सम्त कहीं कुछ नहीं था
    अंधी आँखों में वो दीदार संभाले हुए हैं
    वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ
    रहता है अपने नूर मे सूरज छुपा हुआ –शिकेब !!
    सूरज पे तूने आँख तरेरी थी याद कर
    बीनाइयों पे फिर जो असर रोशनी का था –मयंक
    अभय साहब नूर ही नूर पर दो मंज़र याद आये –लेकिन एथेंस के सत्यार्थी ने और हजतर मूसा ने भी नूर ही नूर का दीदार किया था !!! बहुत सुन्दर और बैल्कुल नया शेर आपने कहा है !!!

    ज़रपरस्तों को ही दाना भी कहा जाता है
    हमसे दीवाने तो किरदार संभाले हुए हैं
    बाज़ार है !! दानाई खरीदी जा सकती है –लेकिन इस ख्याल पर ( किरदार सम्हाले हुये हैं ) तरही के तमाम अश अर मे ये सबसे अच्छा शेर है !!!
    जितनी गुज़री है तिरे ग़म में वो अच्छी गुज़री
    अब तो हर सांस को नाचार संभाले हुए हैं
    साँस सीने मे रेगमाल हुई !! नजीब रामिश साहब के शेर का मिसरा है !!! जाता ही नही साँस का आज़ार क्या करूँ ??!!! आपके शेर पर दाद !!!
    ज़ख़्म-दर-ज़ख़्म है दिल पहलू-ब-पहलू लेकिन
    नावके-नाज़ का हर वार संभाले हुए हैं
    खूब !!!
    बोझ लगता था जिन्हें साया-ए-दीवार कभी
    आज गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं
    गहरी बात !! गहरी बात और ज़िन्दगी ये तल्ख मंज़र दिखा ही देती है जब उसके साथ गैर्ज़रूरी ज़द्दोज़हद की जाती है !!
    तेरी महफ़िल का अजब रंग अजब रूप हुआ
    जब से कुछ हाशिया-बरदार संभाले हुए हैं
    ये काफिया नही इस्तेमाल हुआ इस तरही मे और शेर भी बहुत उम्दा कहा है !!
    बेचते फूल हैं काँटों के इवज़ हम ऐ ‘अभय’
    गुलशने-ज़ीस्त का व्योपार संभाले हुए हैं
    वह वाह !! क्या बात है !! अभय कुमार “अभय” साहब मेरठ आने का मन हो रहा है हसरते दीदार शदीद हो रही है !!! –मयंक

  3. बहुत अच्‍छी ग़ज़ल।
    सादर
    नवनीत

  4. खूबसूरत अश’आर हुए हैं अभय साहब। दिली दाद कुबूल करें।

  5. नूर ही नूर था हर सम्त कहीं कुछ नहीं था
    अंधी आँखों में वो दीदार संभाले हुए हैं

    WAAH KYA KAHNE JANAAB

    UN KA JALWA, UNKA JALWA THA BHALA KYA DEKHTE
    JAB NAZAR UT’THHI TO YE DEKHA K BEENAAYI GAYI

  6. भाई पूरी ग़ज़ल उस्तादाना, बला के शेर निकाले हैं. यही उस्तादों का शेवा है. यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही ज़बरदस्त है मगर ये शेर ख़ास तौर से पसंद आये. वाह वाह, दाद क़ुबूल फ़रमाइये

    यादगारे-गुलो-गुलज़ार संभाले हुए हैं
    ज़र्द पत्तों का इक अम्बार संभाले हुए हैं

    नूर ही नूर था हर सम्त कहीं कुछ नहीं था
    अंधी आँखों में वो दीदार संभाले हुए हैं

    ज़ख़्म-दर-ज़ख़्म है दिल पहलू-ब-पहलू लेकिन
    नावके-नाज़ का हर वार संभाले हुए हैं

    बोझ लगता था जिन्हें साया-ए-दीवार कभी
    आज गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

    तेरी महफ़िल का अजब रंग अजब रूप हुआ
    जब से कुछ हाशिया-बरदार संभाले हुए हैं

    बेचते फूल हैं काँटों के इवज़ हम ऐ ‘अभय’
    गुलशने-ज़ीस्त का व्योपार संभाले हुए हैं

  7. acchi ghazal hui hai abhay ji.. matla bataure khaas pasand aaya…daad qubulen

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