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T-21/24 एक हम जो रसनो-दार संभाले हुए हैं-इनआम ‘शरर’

एक हम जो रसनो-दार संभाले हुए हैं
वरना कुछ लोग तो दस्तार संभाले हुए हैं

ऐसे लोगों से भी है राब्ता मेरा कि जिन्हें
फ़िक्र सर की नहीं दस्तार संभाले हुए हैं

इस कशाकश में या हम या वो ख़ुदा जानता है
किस तरह अपना ये किरदार संभाले हुए हैं

अब तो करना ही है बस तर्क तअल्लुक़ उससे
क्यूं यह गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

आज भी ख़ौफ़ है शबख़ून का सो हम भी मियाँ
शहर के कूचा-ओ-बाज़ार संभाले हुए हैं

ज़ुल्म तो उस ने किये लोगों पे लेकिन हम भी
वारदातों के सब अख़बार संभाले हुए हैं

और तो किस को है फ़ुरसत जो अयादत को आए
आज कल हादसे घर-बार संभाले हुए हैं

इसलिए चेहरे पे है नूर हमारे साहब
दिल मैं नफ़रत नहीं हम प्यार संभाले हुए हैं

क़ाबिले-दाद है यह सार-संभाल अपनी ‘शरर’
राख के ढेर में अंगार संभाले हुए हैं

इनआम ‘शरर’ 09887695429

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9 comments on “T-21/24 एक हम जो रसनो-दार संभाले हुए हैं-इनआम ‘शरर’

  1. पूरी ग़ज़ल उस्तादना तेवर लिए हुए है। कमाल के शेर कहे गए हैं. इस मुकम्मल ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद

  2. क़ाबिले-दाद है यह सार-संभाल अपनी ‘शरर’
    राख के ढेर में अंगार संभाले हुए हैं

    वाह…वाह ..साहब।
    शरर साहब दिल से दाद हाजि़र है।
    शुक्रिया
    नवनीत

  3. एक हम जो रसनो-दार संभाले हुए हैं
    वरना कुछ लोग तो दस्तार संभाले हुए हैं
    अपना अपना किरदार है !! जब रोम जल रहा था तो नीरो बांसुरी बजा रहा था !! लुई 14 की पत्नी ने कहा था कि लोगों के पास रोते नही तो डबलरोटी क्यो नही खाते !! लिहाजा जिनको शहादत देनी है जीवन मूल्यों के लिये वो तो दारो रसन के लिये वगर्ना अहले सियासत सिर्फ अप्नी पनी दस्तार सम्हाले हुये है और दौरे हाज़िर के तमाम मनाज़िर निशान्देही कर रहे हैं इस शेर की !!!!
    ऐसे लोगों से भी है राब्ता मेरा कि जिन्हें
    फ़िक्र सर की नहीं दस्तार संभाले हुए हैं
    बेलियाकत है जो , तलवार सम्हाले हुये है
    फिर भी हम सर नही दस्तार सम्हाले हुये है –मयंक
    इस कशाकश में या हम या वो ख़ुदा जानता है
    किस तरह अपना ये किरदार संभाले हुए हैं
    मेरा ख्याल है कि ऊपर के दोनो शेरो की इको इस शेर को खुद ही बेहतर परिभाषित कर रही है !!!
    अब तो करना ही है बस तर्क तअल्लुक़ उससे
    क्यूं यह गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं
    व्यावहारिकता यही है !! वगर्ना एक शेर — क्या बात है कि तर्क ए तअल्लुक के बाद भी
    मुड मुड के देहते हैं अभी नामाबर को हम –पहले प्रासंगिक था !!
    आज भी ख़ौफ़ है शबख़ून का सो हम भी मियाँ
    शहर के कूचा-ओ-बाज़ार संभाले हुए हैं
    ये राह लूट न ले अजनबी सम्झ के कही
    दुआ सलाम का रिश्ता बहुत ज़रूरी है –अख़्तर नज़्मी
    ज़ुल्म तो उस ने किये लोगों पे लेकिन हम भी
    वारदातों के सब अख़बार संभाले हुए हैं
    ताकि सनद रहे और इंसाफ के दिन काम आये !!!
    और तो किस को है फ़ुरसत जो अयादत को आए
    आज कल हादसे घर-बार संभाले हुए हैं
    मुम्किन है किसी रोज़ अयादत के बहाने
    बीमार से मिलने कोए बीमार भी आये – पर्वाज़ी साहब का शेर है लेकिन ये फैटेसी है और जो आपने कहा वो सच है !!!
    इसलिए चेहरे पे है नूर हमारे साहब
    दिल मैं नफ़रत नहीं हम प्यार संभाले हुए हैं
    मुश्किल और नज़ुक शै को आप सम्हाले हुये हैं
    क़ाबिले-दाद है यह सार-संभाल अपनी ‘शरर’
    राख के ढेर में अंगार संभाले हुए हैं
    मैं हाथ मे अंगार लिये सोच रहा था
    कोई मुझे अंगारोन की तासीर बताये –दुष्यंत कुमार
    अंगारो से रब्त कलेजे का काम है !!!
    इनआम ‘शरर’ साहब !!! गज़ल के लिये बधाई –मयंक

  4. शरर साहब अच्छी चमक है तख़ल्लुस में भी, ग़ज़ल में भी. दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  5. इनआम साहब,
    क्‍या ख़ूब ग़ज़ल कही है। तख़ल्‍लुस से काम लेना एक कमाल है। वाह साहब वाह।

  6. शरर साहब
    नमस्कार

    अच्छी ग़ज़ल और इन दो अशआर पर खास दाद

    इसलिए चेहरे पे है नूर हमारे साहब
    दिल मैं नफ़रत नहीं हम प्यार संभाले हुए हैं

    क़ाबिले-दाद है यह सार-संभाल अपनी ‘शरर’
    राख के ढेर में अंगार संभाले हुए हैं
    उम्दा

  7. इन आम जी, आप की पूरी गजल ने मुझ को बहुत लुत्फ अन्दोज किया , ये चंद अश’आर लाजवाब हुए अब तो करना ही है बस तर्क तअल्लुक़ उससे
    क्यूं यह गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं
    इस कशाकश में या हम या वो ख़ुदा जानता है
    किस तरह अपना ये किरदार संभाले हुए हैं – इस गजल के लिए बधाई हो

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