22 टिप्पणियाँ

T-20/26 लब जो ख़ामोशी के आसार सम्भाले हुए हैं-नवनीत शर्मा-दूसरी ग़ज़ल

लब जो ख़ामोशी के आसार सम्भाले हुए हैं
ऐसा लगता है कि यलग़ार संभाले हुए हैं

तुम चलो फूलों पे, फूलों पे चलो तुम, अपना
रास्ता ख़ूब है पुरख़ार, संभाले हुए हैं

शाख़ पर उनको हरा पत्ता बुरा लगता है
ज़र्द पत्‍तों का जो अंबार संभाले हुए हैं

ज़िन्दगी जेल सही फिर भी है रंगीन बहुत
इसको ख़ूब इसके गिरफ़्तार संभाले हुए हैं

दिल में अब कोई नहीं कोई नहीं है फिर भी
हम अभी तक दरो-दीवार संभाले हुए हैं

वो भी यकलख़्त उठे; ऐसे कि फिर आ न सके
जो समझते थे कि संसार संभाले हुए हैं

रख हवा और उड़ानें, ये फ़लक भी रख ले
हम अना नाम की इक ग़ार संभाले हुए हैं

दिल की वादी में अभी याद का बुत ज़िंदा है
हम उसे बन के परस्तार संभाले हुए हैं।

है अगर कोई नहीं इनका तो बोलो साहब
किसकी मिटटी को ये अश्जार संभाले हुए हैं

साज़ सन्नाटा भला क्‍यों न सुनाये जब आप
जो नहीं बजता वही तार संभाले हुए हैं

रोज़ कुछ खाब मना लेते हैं दिल को ऐसे
ऐसे बीमार को बीमार संभाले हुए हैं

कितना लावा है यहाँ ज़ब्त की झीलें हैं कई
कितना कुछ याद के कुह्सार संभाले हुए हैं

आज हम अपने गले मिल के जो रोये तो लगा
हम भी इक शख्‍़स-ए-ख़तावार संभाले हुए हैं

जो नहीं दिखता मुझे गिरने नहीं देता मगर
किसकी बाहें मुझे उस पार संभाले हुए हैं

मुद्दतें हो गईं जब ज़ंग से हारा लोहा
“आप ज़ंजीर की झनकार संभाले हुए हैं”

बर्फ़ से ठिठुरे हुए चेहरों पे चमका सूरज
धूप को, अच्‍छा है हक़दार संभाले हुए हैं

आइना देख के लगता है ये ‘नवनीत’ हमें
जैसे हम शीशे का इक जार संभाले हुए हैं।

नवनीत शर्मा 9418040160

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22 comments on “T-20/26 लब जो ख़ामोशी के आसार सम्भाले हुए हैं-नवनीत शर्मा-दूसरी ग़ज़ल

  1. 2 ghazale’n aur ek se badh kar ek…kya kehne bhaiya…maza aa gya..bahut bahut umdaa ghazal..daaad qubule’n..sadar
    -Kanha

  2. तुम चलो फूलों पे, फूलों पे चलो तुम, अपना
    रास्ता ख़ूब है पुरख़ार, संभाले हुए हैं

    शाख़ पर उनको हरा पत्ता बुरा लगता है
    ज़र्द पत्‍तों का जो अंबार संभाले हुए हैं
    आदरणीय नवीन भाईसाहब ,मतला-ता-मक्ता मुक़म्मल ग़ज़ल हुई है |तमाम काफ़ियों पर रदीफ़ ख़ूब खिला है |दूसरी ग़ज़ल और उसमें भी सभी इतने काफ़िये ,शेरियत के साथ ,कमाल कर दिया आपने .|दिल से दाद कबूल फरमाएं |

  3. नवनीत भाई दूसरी ग़ज़ल और बेहतर हुई है. इस ज़मीन में रम के शेर कहे हैं आपने. इसीलिए अश’आर में रवानी ख़ूब है. मुबारकबाद और भरपूर दाद.

  4. लब जो ख़ामोशी के आसार सम्भाले हुए हैं
    ऐसा लगता है कि यलग़ार संभाले हुए हैं
    चार सू जो खामुशी का साज़ है
    वो कयामत की कोई आवाज़ है –मयंक

    तुम चलो फूलों पे, फूलों पे चलो तुम, अपना
    रास्ता ख़ूब है पुरख़ार, संभाले हुए हैं
    अपनी अपनी किस्मत और अपना अपना इंतख़ाब !! तुम चलो फूलो पे हम पना पुरख़ार रास्ता सम्हाले हुये है !! वाह !! खूब !!
    शाख़ पर उनको हरा पत्ता बुरा लगता है
    ज़र्द पत्तों का जो अंबार संभाले हुए हैं
    वो कोई और नही चन्द खुश्क पत्ते थे
    शजर से टूट के जो शाख़े गुल पे रोये थे !! कासमी !!
    ज़िन्दगी जेल सही फिर भी है रंगीन बहुत
    इसको ख़ूब इसके गिरफ़्तार संभाले हुए हैं
    बहुत सुन्दर वाह वाह !!! क्या खूब शेर कहा है !! बहुत सुन्दर रब्त है दोनो मिसरों मे !!!
    दिल में अब कोई नहीं कोई नहीं है फिर भी
    हम अभी तक दरो-दीवार संभाले हुए हैं
    इंतज़ार !! ?? कौन आया है यहाँ कोई न आया होगा // मेरा दरवाज़ा हवाओ ने हिलाया होगा !!
    वो भी यकलख़्त उठे; ऐसे कि फिर आ न सके
    जो समझते थे कि संसार संभाले हुए हैं
    उड जायेंगे ये होश किसी रोज़ आखिरश // रह जायेगी धरी के धरी आबो ताब सब !!!
    रख हवा और उड़ानें, ये फ़लक भी रख ले
    हम अना नाम की इक ग़ार संभाले हुए हैं
    सुन्दर कहा है !!!
    दिल की वादी में अभी याद का बुत ज़िंदा है
    हम उसे बन के परस्तार संभाले हुए हैं।
    खूब !दिल की वादी मे तिरी याद का बुत ज़िन्दा है !!
    साज़ सन्नाटा भला क्योंद न सुनाये जब आप
    जो नहीं बजता वही तार संभाले हुए हैं
    खामुशी ज़िन्दा शय भी होती है !!!
    रोज़ कुछ खाब मना लेते हैं दिल को ऐसे
    ऐसे बीमार को बीमार संभाले हुए हैं
    सानी लाजवाब है !! इस पर गिरह लगाने का मन तो है लेकिन मेरी कूवत नही ं
    कितना लावा है यहाँ ज़ब्त की झीलें हैं कई
    कितना कुछ याद के कुह्सार संभाले हुए हैं
    बहुत सुन्दर उत्तराखण्ड का कैनवास लिया है !!! अपनी ज़मीन के मनाज़िर अहसास मे है तो इज़हार मे भी आयेंगे ही !!
    आज हम अपने गले मिल के जो रोये तो लगा
    हम भी इक शख़्ेस-ए-ख़तावार संभाले हुए हैं
    यकलख़्त आ के आज वो मुझसे लिपट गया
    जो फासला दिलो मे था अश्को मे ज़म हुआ !!
    जो नहीं दिखता मुझे गिरने नहीं देता मगर
    किसकी बाहें मुझे उस पार संभाले हुए हैं
    वो अपना यकीन है जो कि मुबहम है लेकिन आपको गिरने नही देता !!!
    मुद्दतें हो गईं जब ज़ंग से हारा लोहा
    “आप ज़ंजीर की झनकार संभाले हुए हैं”
    नई गिरह है ऊला का शिल्प तो बहुत नया है !!!
    बर्फ़ से ठिठुरे हुए चेहरों पे चमका सूरज
    धूप को, अच्छा है हक़दार संभाले हुए हैं
    येस !! बर्फ पिघलना ज़रूरी है और वो भी सूरज के आगाज़ से !! हम भी मुंतज़िर है इस लम्हे के मुद्दतो से !!
    आइना देख के लगता है ये ‘नवनीत’ हमें
    जैसे हम शीशे का इक जार संभाले हुए हैं।
    ये भी नया शेर है खुश्बू भी है इसमे और रहस्य भी !!!
    नवनीत भाई !! एक मैच मे आपने ये दूसरा शतक लगाया है !!! बधाई !! –मयंक

    • आदरणीय मयंक भाई साहब।
      प्रणाम।

      -आप जिस संवेदना और गहराई के साथ टिप्‍पणी लिखते हैं, उससे शायर का मनोबल वैसे ही बढ़ जाता है। कई बार सोचता हूं कितना अध्‍ययन है आपका… कितना कुछ आप लगातार संभाले हुए हैं….. गद्य से लेकर ग़ज़ल तक आप का शब्‍द चयन मुझे ताकत देता है।
      -मुझे अख़बार के काम से फुरसत बहुत कम मिल पाती है। यहां से जितना बचता हूं घर में खर्च हो जाता हूं..वहां से जितना बचूं दफ्तर में सर्फ होता हूं। मैं कल्‍पना करता हूं कि आप जितने अहम और जिम्‍मेदार पद पर हैं, वहां भी आपके अंदर का हस्‍सास और उर्वर शायर अपने लिए वक्‍़त कैसे निकालता होगा।

      आपको सलाम ही कह सकता हूं… एक बाअदब फौजी की भूमिका में आकर।

      सादर
      नवनीत

  5. क्या झक्कास ग़ज़ल हुई है। एक एक शे’र कयामत। वाह, वाह, वाह। दिली दाद हाज़िर है।

  6. MATLA TA MAQTA DOOSRI GHAZAL BHI BEHTAREEN MUBAARAK BAAD , नवनीत शर्मा SAHAB

  7. सिर्फ एक जुमला ” spotless gazal ” वाह वाह

  8. navneet bhai is baar aapne kamaal kiya hai… dono ghazalen bahut khub hui hain..beshtar ashaar umda hue hain…dher saari daad.. bahut bahut mubarak

  9. नवनीत जी
    नमस्कार

    इस कठिन जमीन पर दो दो गज़लें कहना वाकई हिम्मत की बात है
    अच्छी ग़ज़ल और आपकी हिम्मत को दाद !!!!

    ज़िन्दगी जेल सही फिर भी है रंगीन बहुत
    इसको ख़ूब इसके गिरफ़्तार संभाले हुए हैं
    वाह वाह !!!

    वो भी यकलख़्त उठे; ऐसे कि फिर आ न सके
    जो समझते थे कि संसार संभाले हुए हैं
    यक्लख्त… क्या निभाया है साहब !

    साज़ सन्नाटा भला क्‍यों न सुनाये जब आप
    जो नहीं बजता वही तार संभाले हुए हैं
    इस शेर ने दिमाग के तार हिला दिए

    कितना लावा है यहाँ ज़ब्त की झीलें हैं कई
    कितना कुछ याद के कुह्सार संभाले हुए हैं
    उम्दा है उम्दा !!!

    आज हम अपने गले मिल के जो रोये तो लगा
    हम भी इक शख्‍़स-ए-ख़तावार संभाले हुए हैं
    जीत लिया मैदान प्यारे !

  10. दिल में अब कोई नहीं कोई नहीं है फिर भी
    हम अभी तक दरो-दीवार संभाले हुए हैं
    खूबसूरत ग़ज़ल

  11. Kya kahne Navneet bhaiya
    waahh waahh
    is zamiin me do do gazal
    aur doosari gazal ne to sama…n hi bandh diya

    sabhi ash-aar bahut khoob hain

    dili daad qubul keejiye

    regards
    alok mishra

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