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T-20/25 इस गिरानी में भी किरदार संभाले हुए हैं-फ़ज़ले-अब्बास ‘सैफ़ी’

इस गिरानी में भी किरदार संभाले हुए हैं
जिनमें है ज़र्फ़ वो दस्तार संभाले हुए हैं

हम ज़माने के सब आज़ार संभाले हुए हैं
अपने दामन में फ़क़त ख़ार संभाले हुए हैं

लब पे कहने को वो इंकार संभाले हुए हैं
अपनी आँखों में मगर प्यार संभाले हुए हैं

हौसला, सब्र, यक़ीं और दयानतदारी
मुझको ये दोस्त मिरे चार संभाले हुए हैं

प्यार के बोल भी बोलूं तो मैं किससे बोलूं
सब यहाँ हाथ में तलवार संभाले हुए हैं

किसलिए ख़ौफ़ज़दा रहते हो गुलचीं से गुलों
मोर्चा बाग़ में जब ख़ार संभाले हुए हैं

शहर ये कौन सा है बहती है उल्टी गंगा
चारागर को यहाँ बीमार संभाले हुए हैं

जिनको मालूम नहीं है कि तिजारत क्या है
हाँ वही लोग तो बाज़ार संभाले हुए हैं

डल गयी चाँद के पैरों में भी ज़ंजीर मगर
‘आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’

रास आती नहीं आसानियां हमको ‘सैफ़ी’
काम दुश्वार से दुश्वार संभाले हुए हैं

फ़ज़ले-अब्बास ‘सैफ़ी’ 09826134249

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22 comments on “T-20/25 इस गिरानी में भी किरदार संभाले हुए हैं-फ़ज़ले-अब्बास ‘सैफ़ी’

  1. शहर ये कौन सा है बहती है उल्टी गंगा
    चारागर को यहाँ बीमार संभाले हुए हैं

    waah..Bahut badhiya ghazal hui hai ..daad
    -kanha

  2. पूरी ग़ज़ल उस्तादना तेवर लिए हुए है। कमाल के शेर कहे गए हैं. इस मुकम्मल ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद

  3. सैफी साहब।

    नमस्‍कार।
    बहुत उम्‍दा ग़ज़ल के लिए बधाई।
    शुक्रिया।
    नवनीत

  4. इस गिरानी में भी किरदार संभाले हुए हैं
    जिनमें है ज़र्फ़ वो दस्तार संभाले हुए हैं
    मुश्किल काम अंजाम दे रहे है आप !! हवाये और रक़ाबत दस्तार के दुश्मन हैं और दौरे हाज़िर की हवाये तुन्द हैं और हरीफाना कश्मकश ज़माने से क्या खुद से भी रहती है इसलिये ऐसे कठिन वक़्त मे दस्तार सम्हालना कठिन काम है –मतले पर दाद !!!
    हम ज़माने के सब आज़ार संभाले हुए हैं
    अपने दामन में फ़क़त ख़ार संभाले हुए हैं
    गुलो को तो गुलचीं मक़्तल मे ले गया –हमारे हिस्से मे फ़क़त ख़ार ही आते हैं –लेकिन बेशतर लोग इन्हे गवारा नही करते –ख़ार सम्हालना बडी बात है !!
    लब पे कहने को वो इंकार संभाले हुए हैं
    अपनी आँखों में मगर प्यार संभाले हुए हैं
    तनासुब वो रखता है किरदार मे
    रज़ा भी झलकती है इंकार मे –मुहब्बत का पुराना रंग दिलकश है !!!!
    हौसला, सब्र, यक़ीं और दयानतदारी
    मुझको ये दोस्त मिरे चार संभाले हुए हैं
    खूबसूरत शेर कहा है !! सानी मिसरा गिरह के लिये दिया जाय तो 4 दोस्त लोग अलग अलग तरीके से बयाँ करेंगे आप के दोस्त दौरे हाज़िर मे किसी की शख़सीयत मे कमयाब हैं !! बहर्क़ैफ ये अनासिर हस्ती की ज़ीनत होते हैं !!!
    प्यार के बोल भी बोलूं तो मैं किससे बोलूं
    सब यहाँ हाथ में तलवार संभाले हुए हैं
    वो दिन हवा हुये कि पसीना गुलाब था !!! अब कोई ज़ुबान मुहब्बत की तमीर नही करती !!! ज़ुबान मे भी लोग तीर तलवार और छुरी रखते हैं !! सहीह कहा है आपने !!!
    किसलिए ख़ौफ़ज़दा रहते हो गुलचीं से गुलों
    मोर्चा बाग़ में जब ख़ार संभाले हुए हैं
    खार ज़रूरी हैं गुलो की हिफाज़त के लिये !! गो कि इनको पसन्द नही किया जाता !!! अभी कभी प्रतिक्रियात्मक व्यतित्व समाज को दिशा भी दे जाते हैं !!!
    शहर ये कौन सा है बहती है उल्टी गंगा
    चारागर को यहाँ बीमार संभाले हुए हैं
    क्यों नही !!! रहबरों को भटके हुये मुसाफिर दिशाबोध दे रहे हैं आजकल –कलियुग है !!
    जिनको मालूम नहीं है कि तिजारत क्या है
    हाँ वही लोग तो बाज़ार संभाले हुए हैं
    तिजारत के भी आदाब होते हैं लेकिन वक़्त जैसा आपने कहा ऊपर के शेर मे कि उल्टे गंगा बहने का है इसलिये कोई त आज़्ज़ुब नही कि टोपी पैरों मे और जूती सर पर पहनी जाने लगे !!! !
    डल गयी चाँद के पैरों में भी ज़ंजीर मगर
    ‘आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’
    अच्छी गिरह है !!!
    रास आती नहीं आसानियां हमको ‘सैफ़ी’
    काम दुश्वार से दुश्वार संभाले हुए हैं
    खुदी को कर बुलन्द इतना … अना का मेयार तो दुश्वारियाँ ही हैं !! वगर्ना न राम बनवास जाते और न हुसैन कर्बला जाते !!!
    फ़ज़ले-अब्बास ‘सैफ़ी’ साहब !! बहुत खूब शेर अपने कहे है हमेशा की तरह !! मुबारकबाद कुबूल कीजिये –मयंक

  5. SAIFY SAHAB ACHCHHI GHAZAL KE LIYE MUBAARAKBAAD QABOOL KARE’N.

  6. शहर ये कौन सा है बहती है उल्टी गंगा
    चारागर को यहाँ बीमार संभाले हुए हैं
    भाई क्या ही अच्छा मुहावरा ‘ बहती गंगा ‘ नज़्म किया है. ख़ास लखनऊ के रिवायती उस्तादों का सा लहजा..वाह वाह, दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  7. badhiya ghazal saifi sahab… girah par bataure khaas daad

  8. सैफी साहब
    नमस्कार

    अच्छी ग़ज़ल और गिरह पर खास दाद

  9. चारागर को यहाँ बीमार संभाले हुए हैं

    Saifi ji ,aise kitne hi bade misron se saji huii hai ye gazal
    kya kahne …waaah waah

    dher sari Daad

  10. दिल की बात कागज लिख ऐसे ,दिल खोल कर दिखा दिया सब को,वाह क्या बात हैं

  11. Reblogged this on oshriradhekrishnabole and commented:
    हकीकत जैसे कागज पर उत्तर आई, दिल की मोहब्बत आखों में फिसल आई,,

  12. सैफी जी, बहुत ही उम्दा गजल और हर शे’र कमाल का हुआ मुझे लगता है कि मैं पहली बार एक गजल में तिन मतले पढ़ रहा हूँ

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