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T-20/23 तेरी बुनियाद का किरदार संभाले हुए हैं-माहिर शैदाई

तेरी बुनियाद का किरदार संभाले हुए हैं
छूले अफ़लाक हम आसार संभाले हुए हैं

हौसले ऐसे सरे-दार संभाले हुए हैं
जैसे फंदा नहीं हम हार संभाले हुए हैं

मेरी ख़ामोश तबीयत की मुहाफ़िज़ आँखें
इन दिनों ज़िम्मा-ए-गुफ़तार संभाले हुए हैं

मुनहसर झूठ पे उम्मीदे-शिफा है अब तो
बस दिलासे दिले-बीमार संभाले हुए हैं

जो भी सच्चाई से दो चार हुई हैं आँखें
बेयक़ीनी के वो आसार संभाले हुए हैं

लोग पत्थर लिये हाथों मैं शिकस्ता घर के
यादगारे-दरो-दीवार संभाले हुए हैं

कैसे इस ज़ोमे-समाअत का तसलसुल टूटे
‘आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’

संगबाराना मसाइल में घिरे हैं माहिर
फिर भी आइना-ए-किरदार संभाले हुए हैं

माहिर शैदाई                          09352344949

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7 comments on “T-20/23 तेरी बुनियाद का किरदार संभाले हुए हैं-माहिर शैदाई

  1. बहुत आनंद आया ग़ज़ल पढ़ कर।
    जनाब माहिर साहब ! धन्‍यवाद।
    दाद हाजि़र है जनाब।
    नवनीत

  2. माहिर साहब !! मेरे जैसे जिनका उर्दू का शब्द ज्ञान सीमित है ऐसी गज़लो को किसी ज़रेये से सम्झने के बाद उर्दू सीखने के लिये कोशिश करते हैं !!
    तेरी बुनियाद का किरदार संभाले हुए हैं
    छूले अफ़लाक हम आसार संभाले हुए हैं
    अश्जार की जडो का बयान उस शाख के लिये जो बुलन्दी पर है और कुहसार की तह का बयान है !!! ज़ोरदार तलियाँ आप्के शेर पर !!
    हौसले ऐसे सरे-दार संभाले हुए हैं
    जैसे फंदा नहीं हम हार संभाले हुए हैं
    छा गये आप इस शेर को कह कर !!! दिल जीत लिया इस शेर ने !!
    मेरी ख़ामोश तबीयत की मुहाफ़िज़ आँखें
    इन दिनों ज़िम्मा-ए-गुफ़तार संभाले हुए हैं
    बेहद खूबसूरत शिल्प है शेर का !! मेरी ख़ामोश तबीयत की मुहाफ़िज़ आँखें…क्य बात है !!!
    मुनहसर झूठ पे उम्मीदे-शिफा है अब तो
    बस दिलासे दिले-बीमार संभाले हुए हैं
    अंजाम से तो सब वाकिफ है इसलिये तसल्ली के लिये दिलासे !! क्या बात है !!!
    लोग पत्थर लिये हाथों मैं शिकस्ता घर के
    यादगारे-दरो-दीवार संभाले हुए हैं
    ज़िन्दगी की यही सूरत है आज कश्मीर मे तो कल हर जगह हो सक्ती है !!
    कैसे इस ज़ोमे-समाअत का तसलसुल टूटे
    ‘आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’
    इस झंकार के मर्कज़ से बाहर आ कर अपने शोर से जुदा हो कर ही सुना ज सकता है !!!
    संगबाराना मसाइल में घिरे हैं माहिर
    फिर भी आइना-ए-किरदार संभाले हुए हैं
    बहुत खूब !!!
    माहिर शैदाई साहब !!! यथा नाम तथा गुन –बहुत उच्च कोटि की ग़ज़ल आप्ने कही !! आपके बयान और लहजे के हम गुलाम हुये आज अभी इसी वक्त से—मयंक

  3. भाई माहिर साहब, बड़ा करम की आपने लफ्ज़ की महफ़िल को ज़ीनत बख़्शी. करम के लिए शुक्रिया/ आप एक रिवायत के अमीं हैं. “जो बुज़ुर्गों से मिला यार संभाले हुए हैं”

  4. माहिर,
    क्‍या अच्‍छे अशआर हुए हैं-
    मेरी ख़ामोश तबीयत की मुहाफ़िज़ आँखें
    इन दिनों ज़िम्मा-ए-गुफ़तार संभाले हुए हैं

    लोग पत्थर लिये हाथों में शिकस्ता घर के
    यादगारे-दरो-दीवार संभाले हुए हैं
    ख़ूब। बहुत ख़ूब।

  5. mahir sahab khoob majhi hui ghazal kahi aapne… मेरी ख़ामोश तबीयत की मुहाफ़िज़ आँखें
    इन दिनों ज़िम्मा-ए-गुफ़तार संभाले हुए हैं.. ye she’r to bahut pasand aaya.. daad qubulen

  6. Mahir sahab bahut achhii gazal huii hai
    tarhi misre par girah bhi khoob hai

    dher sari daad

  7. माहिर साहब
    नमस्कार

    मेरी ख़ामोश तबीयत की मुहाफ़िज़ आँखें
    इन दिनों ज़िम्मा-ए-गुफ़तार संभाले हुए हैं
    बेहतरीन शेर

    जो भी सच्चाई से दो चार हुई हैं आँखें
    बेयक़ीनी के वो आसार संभाले हुए हैं
    सच्चाई और बेयक़ीनी क्या बढ़िया तज़ाद है

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