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T-20/21 पिछली तारीख़ का अख़बार सम्हाले हुये हैं-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

पिछली तारीख़ का अख़बार सम्हाले हुये हैं
उनकी तस्वीर को बेकार सम्हाले हुये हैं

यार इस उम्र में घुँघरू की सदायें चुनते
‘आप ज़ंजीर की झंकार सम्हाले हुये हैं’

हम से ही लड़ता-झगड़ता है ये बूढा सा मकां
हम ही गिरती हुई दीवार सम्हाले हुये हैं

यार अब तक न मिला छोर हमें दुनिया का
रोज़े-अव्वल ही से रफ़्तार सम्हाले हुये हैं

जिनके पैरों से निकाले थे कभी ख़ार बहुत
हैं मुख़ालिफ़ वही, तलवार सम्हाले हुए हैं

लोग पल भर में ही उकता गये जिससे ‘कान्हा’
हम ही बरसों से वो किरदार सम्हाले हुए हैं

प्रखर मालवीय ‘कान्हा’ 08057575552

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25 comments on “T-20/21 पिछली तारीख़ का अख़बार सम्हाले हुये हैं-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

  1. त्वमहियाचे दर्शनदानं हे मधुसूदन शांत…….
    एहि ! मुरारे कुञ्ज बिहारे . एहि प्रनतजन बंधो …!
    हे माधव ! मधुमथन वरेंड्यं केशव करुणा सिन्धो ….।
    सादर कान्हा भाई के लिए

    ये श्रीमद् भागवत से उद्धृत है

    आपकी पंक्तियाँ इनके समीप तक पहुच गई हैं ।।।

    बधाई

  2. हम से ही लड़ता-झगड़ता है ये बूढा सा मकां
    हम ही गिरती हुई दीवार सम्हाले हुये हैं

    यार अब तक न मिला छोर मुझे दुनिया का
    रोज़े-अव्वल ही से रफ़्तार सम्हाले हुये हैं
    कान्हाजी ,उम्दा ग़ज़ल हुई है |ढेरों दाद कबूल फरमावें |

  3. बहुत ही प्रखर ग़ज़ल पढने को मिली. हर शेर सैकड़ों दाद का हक़दार है….

  4. कान्हा अच्छी ग़ज़ल कही है आपने. मतला तो बहुत अच्छा हुआ है. शाबास!!

  5. कान्हा !! यार !! आपका मेयार बुलन्दी पर है !! मै अर्से से आपकी ग़ज़ल पढना चाहता था –लेकिन कम्बख़्त ज़िन्दगी फुर्सत ही नही देती –ख़ैर आज वक़्त ने मुझे मुहलत देदी !!!
    पिछली तारीख़ का अख़बार सम्हाले हुये हैं
    उनकी तस्वीर को बेकार सम्हाले हुये हैं
    वाह वाह !! बहुत खूब !! रहने दो छोडो भी जाने दो यार हम न करेंगे प्यार …..
    यार इस उम्र में घुँघरू की सदायें चुनते
    ‘आप ज़ंजीर की झंकार सम्हाले हुये हैं’
    हम तो पचास पार कर गये –लेकिन शेर काबिले गौर है –मन तो करता है –इस ज़ंजीर को छोड कर घुंघरू के सदाये सुनते –लेकिन दर लगता है कोई देख न ले !! मन मे ही मुजरा करवा लेते है जिसे चाअह्ते है उससे मन तो पना ही है न !!! –हा हा !! शेर पर दाद !! बहुत उम्दा गिरह लगाई है भई !!!
    हम से ही लड़ता-झगड़ता है ये बूढा सा मकां
    हम ही गिरती हुई दीवार सम्हाले हुये हैं
    इस घर का नसीब है –जो ऐसा शेर कहने वाला उसका नूरे नज़र है !!
    यार अब तक न मिला छोर मुझे दुनिया का
    रोज़े-अव्वल ही से रफ़्तार सम्हाले हुये हैं
    महताब भटकता है खलाओ मे इस तरह
    जैसे कि आसमाँ का किनारा ज़रूर है –मयंक
    आपके शेर पर दाद !!
    जिनके पैरों से निकाले थे कभी ख़ार बहुत
    हैं मुख़ालिफ़ वही, तलवार सम्हाले हुए हैं
    देखो ज़िन्दगी कैसे कैसे मंज़र दिखाती है—बहर्क़िअफ आप शाइर है –अपना पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुंचे !!!
    लोग पल भर में ही उकता गये जिससे ‘कान्हा’
    हम ही बरसों से वो किरदार सम्हाले हुए हैं
    बहुत खूब !!! जीते रहिये आबाद रहिये आप पर हमें नाज़ है और रहेगा !! –मयंक

    • Apka sneh bahut housla deta hai bhaiya..apka har comment nayi urja pradan karta hai…jitne sneh se aap har she’r ki vivechna karte hain dil khush ho jata hai padh ke.bahut kuchh seekhne ko milta hai hamesha aapse.aashirvaad banaye rakhhe’n..sadar
      -Kanha

  6. पिछली तारीख़ का अख़बार सम्हाले हुये हैं
    उनकी तस्वीर को बेकार सम्हाले हुये हैं

    यार इस उम्र में घुँघरू की सदायें चुनते…जियो मेरी जान

    नई पीढ़ी की ऐबदारी की ग़ज़ल, माशूक़ की तस्वीर पुराना अखबार हो गयी ? ख़ुदा-मालूम ये कम्बख़्त नस्ल क्या गुल खिलायेगी ? स्वप्निल तो बदमाश है ही ये उससे भी सवा हाथ आगे निकले. स्वप्निल इसके कान उमेठिये और इन दो शेरों पर गले लगाइये. ये दो शेर बहुत उजले भविष्य को राह दे रहे हैं.

    हम से ही लड़ता-झगड़ता है ये बूढा सा मकां
    हम ही गिरती हुई दीवार सम्हाले हुये हैं

    यार अब तक न मिला छोर मुझे दुनिया का
    रोज़े-अव्वल ही से रफ़्तार सम्हाले हुये हैं

  7. कान्हा
    यार क्या लिखा है…।
    पार्टी देने का मन कर रहा है !
    यक़ीनन

    पिछली तारीख़ का अख़बार सम्हाले हुये हैं
    उनकी तस्वीर को बेकार सम्हाले हुये हैं
    शेर हो गया …।

    हम से ही लड़ता-झगड़ता है ये बूढा सा मकां
    हम ही गिरती हुई दीवार सम्हाले हुये हैं
    बहुत बढ़िया इमेज खींची है

    यार अब तक न मिला छोर मुझे दुनिया का
    रोज़े-अव्वल ही से रफ़्तार सम्हाले हुये हैं
    वल्लाह जान ले ली आपने !

    लोग पल भर में ही उकता गये जिससे ‘कान्हा’
    हम ही बरसों से वो किरदार सम्हाले हुए हैं
    शानदार !!

    • ye to apka sneh hai bhaiya…apko ghazal pasand aayi bahut achha laga…apki in words me’n tareef kisi party se kam hai kya? khair main party ke liye mana nhi’n kar rha…. chhote bhai ka to haq banta hai party lene ka 🙂 hahaha
      bahut shukriya..sadar
      -kanha

  8. हम से ही लड़ता-झगड़ता है ये बूढा सा मकां
    हम ही गिरती हुई दीवार सम्हाले हुये हैं
    खूबसूरत अशआरों के साथ लिखी अच्छी ग़ज़ल

  9. Kya kahne prakhar
    Badhiya gazal huii hai
    Tarhi misre par girah bhi khoob h

    Dheron duaayen

    Alok

  10. प्रखर मालवीय ‘कान्हा’ JI KYA KAHNE UMDA GHAZAL KAHI HAI AAP NE, KHAAS KAR YE SHER
    हम से ही लड़ता-झगड़ता है ये बूढा सा मकां
    हम ही गिरती हुई दीवार सम्हाले हुये हैं WAAH, MUBAARAKBAAD QABOOL KARE’N.

  11. हम से ही लड़ता-झगड़ता है ये बूढा सा मकां
    हम ही गिरती हुई दीवार सम्हाले हुये हैं

    Kanha bahut khoobsurat sher kaha hai bhai… Waah Waah Waah…

    Tamaam gazal bahut pasand aayi 🙂

  12. प्रिय कान्‍हा,
    किस शे’र की तारीफ़ न की जाए ?
    वाह… वाह…वाह..
    पूरी ग़ज़ल बहुत अच्‍छी लेकिन यह शे’र लूट कर ले गया मुझे।
    शुक्रिया।
    नवनीत

    • हम से ही लड़ता-झगड़ता है ये बूढा सा मकां
      हम ही गिरती हुई दीवार सम्हाले हुये हैं
      प्रिय कान्‍हा,
      किस शे’र की तारीफ़ न की जाए ?
      वाह… वाह…वाह..
      पूरी ग़ज़ल बहुत अच्‍छी लेकिन यह शे’र लूट कर ले गया मुझे।
      शुक्रिया।
      नवनीत

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