12 टिप्पणियाँ

T-20/19 लड़खड़ाते हुए मयख़ार संभाले हुए हैं-अब्दुस्सलाम ‘कौसर’

लड़खड़ाते हुए मयख़ार संभाले हुए हैं
मैकदे को यही दो-चार संभाले हुए हैं

लाख होटों पे वो इंकार संभाले हुए हैं
दिल के अंदर तो मगर प्यार संभाले हुए हैं

शहर में पूछ-परख कुछ भी नहीं है फिर भी
शेख़ जी जुब्बा-ओ-दस्तार संभाले हुए हैं

सारे अपने तो गिराने में लगे हैं लेकिन
फिर भी हम रिश्तों की दीवार संभाले हुए हैं

अपने तेवर पे ज़रा आप भी क़ाबू रखिये
हमभी तो लहजा-ओ-गुफ़्तार संभाले हुए हैं

चल के दो-चार क़दम गिर गया होता कब का
चारागर को अभी बीमार संभाले हुए हैं

वाइज़ो ! सोते रहो, क़ौम को बर्बादी से
मेरे जैसे कई बेदार संभाले हुए हैं

जिनके चेहरे पे है ख़ुशहाली का ग़ाज़ा वो भी
दर्दो-ग़म के दरो-दीवार संभाले हुए हैं

उनको ज़ुल्फ़ों के गिरफ़्तार से मतलब ही नहीं
वो अभी गेसुए-ख़मदार संभाले हुए हैं

आज भी इनसे मुहब्बत की चमक आती है
हम जो ख़त आपके दो-चार संभाले हुए हैं

कुछ तो राहत मिले तस्कीन की सूरत निकले
कब से हम दर्द के अम्बार संभाले हुए हैं

कारवां उर्दू का लुट ही नहीं सकता कि उसे
मोतबर क़ाफ़िलासालार संभाले हुए हैं

दरहक़ीक़त हैं यही अम्न के दुश्मन ‘कौसर’
अपने हाथों में जो तलवार संभाले हुए हैं

अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ 09300212960

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12 comments on “T-20/19 लड़खड़ाते हुए मयख़ार संभाले हुए हैं-अब्दुस्सलाम ‘कौसर’

  1. तुफैल साहब की सफाई और कौसऱ जी के जवाब से महक और चमक का मामला दिलचस्प हो चला है। दर-असल तुफैल साहब को सफाई देने की जरूरत नहीं थी।कौसर जी ने जो गजल भेजी है, उसकी स्कैण्ड कापी छाप देते तो सारा मसअला ही रवत्म हो जाता। मुझ नाचीज की राय में शेरो-शायरी के मामले को लेकर ज्यादा बहस अच्छी नहीं होती। शुजा साहब का एक शेर याद आ रहा हैः–

    कौन आपकी बातों में आएगा शुजा साहब
    अशआर से क्या दुनिया बदलेगी अमां छोड़ो

    आचार्य अनिमेषानन्द अवधूत
    प्राचार्य
    आनन्द मार्ग पाॅलिटैक्निक,मालूर
    बैंगलोर

  2. लड़खड़ाते हुए मयख़ार संभाले हुए हैं
    मैकदे को यही दो-चार संभाले हुए हैं
    ये दुनिया अपने दीवानो के चलते अभी आबाद है !! जो दो चार्ज ही हैं वर्ना रौनके हस्ती के आस्रे और सहारे मिट रहे है !! खूब !!
    लाख होटों पे वो इंकार संभाले हुए हैं
    दिल के अंदर तो मगर प्यार संभाले हुए हैं
    मुहब्बत का ये रब्ग सबसे पुरना और सब्से दिलकश है !!
    शहर में पूछ-परख कुछ भी नहीं है फिर भी
    शेख़ जी जुब्बा-ओ-दस्तार संभाले हुए हैं
    गिनो जा कर कही तुम और अपनी नेकियाँ वाइज़
    तुम्हारा हम गुनहगारो से क्या याराना बनता है 00कतील शिफाई !!
    सारे अपने तो गिराने में लगे हैं लेकिन
    फिर भी हम रिश्तों की दीवार संभाले हुए हैं
    बहुत खूब !! सच है !!
    अपने तेवर पे ज़रा आप भी क़ाबू रखिये
    हमभी तो लहजा-ओ-गुफ़्तार संभाले हुए हैं
    ” वर्ना” लफ़्ज़ शेर मे पोशीदा है !! जो खूब नुमाया हुआ है !! शेर है तो मश्वरे की शक्ल मे लेकिन –जो नही कहा वो पढा जा सकता है –शीशगरी खूब है !!!
    चल के दो-चार क़दम गिर गया होता कब का
    चारागर को अभी बीमार संभाले हुए हैं
    ये सच है कि –जिनसे दुनिया संवारने की उमीद है वो खुद खल्कत के कान्धो पर चल रहे है !!!
    जिनके चेहरे पे है ख़ुशहाली का ग़ाज़ा वो भी
    दर्दो-ग़म के दरो-दीवार संभाले हुए हैं
    तमाम जिस्म ही घायल था घाव ऐसा था
    कोई न जान सका सका रख रखाव ऐसा था –मुहतरम जनाब क्रष्न बिहारी नूर-साहब !!
    उनको ज़ुल्फ़ों के गिरफ़्तार से मतलब ही नहीं
    वो अभी गेसुए-ख़मदार संभाले हुए हैं
    अदा है !! जिस पर कुर्बान होना जाइज़ है !!
    आज भी इनसे मुहब्बत की चमक आती है
    हम जो ख़त आपके दो-चार संभाले हुए हैं
    अब तलक तेरे खतो से तिरी खुश्बू न गई !! और तेरे खत आज मै गंगा मे बहा आया हूँ //आग बहते हुये पानी मे लगा आया हूँ !! गो कि खतो का ज़माना गय लेकिन आज भी इस लफज़ की खुश्बू से इंकार नही !!
    कुछ तो राहत मिले तस्कीन की सूरत निकले
    कब से हम दर्द के अम्बार संभाले हुए हैं
    कारवां उर्दू का लुट ही नहीं सकता कि उसे
    मोतबर क़ाफ़िलासालार संभाले हुए हैं
    ज़िन्दाबाद !!!
    दरहक़ीक़त हैं यही अम्न के दुश्मन ‘कौसर’
    अपने हाथों में जो तलवार संभाले हुए हैं
    सच है !! तल्ख है मगर सच है !!
    अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ साहब बधाई !! –मयंक

  3. यूँ तो ग़ज़ल ही अच्छी है मगर ये शेर..क्या ख़ास रिवायती मीठे लहजे का शेर कहा

    उनको ज़ुल्फ़ों के गिरफ़्तार से मतलब ही नहीं
    वो अभी गेसुए-ख़मदार संभाले हुए हैं

    • Janab TUFAIL CHATURVEDI sahib
      “MAHAK” aur “CHAMAK” par AAP ki safa-ee ghalat hai Ghuzarish hai ki APP apna e- mail ghaur se dekhe’n. Hath se nahee’n computer se print kawakar mei’n saaf taur par likha hai……..
      Aaj bhi unse mahobbat ki mahak aati hai
      Hum jo khhat aap ke do char sambhale hue hai”n

      Jaise ke BANGLORE ke acharya animesha nand avadhoot jee ne “printer devil” likha hai ye mamla sarasar proof mistake ka hi hai . Avdhoot jee ke sath – sath mai’n Shafeeque Raipuri aur Sana Ahmad ka shukr guzar hoo’n ki unke remark ke aa-e-ne mai’n pathak CHAMAK ki jagah MAHAK hi padhe’nge .
      Is liye AAP chup-chap ise proof mistake man kar CHAMAK ko MAHAK kar deeji –ye.
      Aur ye bhi ki pahle misre mei’n “in” ke bajaye “un” bhi kar dena zaroori hai.
      Ek baat zaroor kahoo’nga ki CHAMAK aur MAHAK ki vajah se mujhe be-had takleef hui hai khas kar ek qadam badhkar AAP ka “GUNAH BAR GURDANE – SENDER NOT TYPIST” kahne se mood off ho gaya…………
      KHHAYALE KHHATIRE AHBAB CHAHIYE HAR DAM
      “ANEES THES NA LAG JAYE AABGEENO’N KO

      ABDUS – SALAM “KOUSAR”
      STATION PARA, WARD NO. 09
      RAJNANDGAON (C.G.)
      PIN- 491441

  4. आज भी इनसे मुहब्बत की चमक आती है
    हम जो ख़त आपके दो-चार संभाले हुए हैं
    Kausar sahab…. bahut hi shaandar ghazal kahi hai mubarakbaad

  5. Attention plz…..
    Janab Abdul Salam Kausar ki ghazal padhne m aayi. Chhattisgarh ke jaane maane shayaron mein unka shumaar hota h. Unki ghazal ka har sher apne aap mein perfect hai. Khas kar ye sher-
    Apne tewar pe zara aap bhi kaabu rakhye.
    Hum bhi to lahz-o-guftaar sambhale hue h.
    Magar Kausar sahab ka ye sher galat mehsoos ho raha h-
    Aaj bhi in se mohobbat ki chamak
    Aati hai.
    Hym jo khat aap ke do char
    Sambhale hai.
    Samajhne waali baat ye hai ki mohobbat ki chamak nahi hoti hai mehak hoti h. Chamak ka talluk dekhne se hai jab ki mehek ehsaas ka naam hai. Isliye mohobbat ki mehek hona chahiye. Ho sakta h ki proof mistake mai aisa hua hoga. Kyu ki itni behtareen ghazal kehne waala shayar itni badi ghalati nahi kar sakta. Mohobbat ke vishay main Gulzar sahab ka mashoor geet hai….
    Sirf ehsaas hai ye rooh se mehsoos karo

  6. उम्‍दा ग़ज़ल के लिए दाद हाजिर है जनाब कौसर साहब।
    सादर
    नवनीत शर्मा

  7. “mohabbat ki chamak” is incorrect. I have been reading KOUSAR since last 25 years & I am sure he cannot write it. This seems to be a printers’ devil. In stead of “mohabbat ki chamak”, it should be “MOHABBAT KI MAHAK.” Urdu gazal is a very, very delicate subject. I hope LAFZ will understand it’s delicacy & correct it’s typing mistake.

    Acharya Animeshananda Avadhuta(Bangalore)

  8. KOUSAR SAHAB MATLA TA MAQTA UMDA GHAZAL HUYI HAI, MUBAARAK BAAD QABOOL KARE’N.

    आज भी इनसे मुहब्बत की चमक आती है
    हम जो ख़त आपके दो-चार संभाले हुए हैं

    MUHTARAM!
    AAP NE IS SHER KA PAHLA MISRA TO MUJHE YU’N SUNAAYA THA ” AAJ BHI UN SE MUHABBAT KI MAHAK AATI HAI ”

  9. Mohtaram Achchi ghazal hui hai.. चारागर को अभी बीमार संभाले हुए हैं…. waaah!!

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