26 टिप्पणियाँ

T-20/18 ऐसा लगता है इक आज़ार संभाले हुए हैं-बकुल देव

ऐसा लगता है इक आज़ार संभाले हुए हैं
ज़िन्दगी हम तुझे बेकार संभाले हुए हैं

टूट जाए न भरम अक्स के बनते बनते
वो सरे-आइना किरदार संभाले हुए हैं

गुम हुई जाती है तारीख़ अंधेरों में मगर
आप तहरीर चमकदार संभाले हुए हैं

हम से मीज़ान संभलती नहीं ज़ेह्नो-दिल की
लोग बाज़ार के बाज़ार संभाले हुए हैं

ज़ब्त आंखों, में हंसी होठों पे, माथे पे शिकन
देख क्या क्या तिरे बीमार संभाले हुए हैं

जंग पूरी हुई फ़ातिह भी सभी लौट गये
दिल के मैदां तो फ़क़त हार संभाले हुए हैं

मुत्मइन हो न मिरी चश्मे-तमन्ना, न झपक
वो नज़ारे अभी दो चार संभाले हुए हैं

सर ब जानूं जो नज़र आते हैं कुछ लोग यहाँ
हाक़िम-ए-शह्र की दस्तार संभाले हुए हैं

था तो मौक़ा ये क़फ़स तोड़ के उड़ जाने का
‘आप जंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’

बकुल देव 09672992110

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

26 comments on “T-20/18 ऐसा लगता है इक आज़ार संभाले हुए हैं-बकुल देव

  1. बकुल भाई। सबसे पहले तो आप का स्वागत। मैं पहली बार पढ़ रहा हूँ आपको और यक़ीन मानिए बहुत मुतास्सिर हुआ हूँ। क्या ही रवां दवाँ शेर हुए हैं। वाह वाह। टूट जाए न भरम… क्या मोमेंट कैप्चर किया है आपने वाह वाह वाह। हमसे मीज़ान.. यूं तो बरता हुआ ख़याल है पर आपकी नई अप्रोच नें शेर को नायाब कर दिया है। बहुत पसंद आया ये शेर भी। ग़ज़ल के दीगर अशआर भी बहुत पसंद आये। दाद क़ुबुलें।

  2. बकुल!! आपका नाम क्यो हर तरफ गूंज रहा है इसके तस्दीक आपकी कहन बारहा इस गज़ल मे कर रही है –बेहद खूबसूरत और असरदार शेर अपने कहे है !!!
    ऐसा लगता है इक आज़ार संभाले हुए हैं
    ज़िन्दगी हम तुझे बेकार संभाले हुए हैं
    आसानी से रवानी से गहरी बात जो तस्लीम होगी हर नशिस्त मे हर अदबी हल्के मे !!
    टूट जाए न भरम अक्स के बनते बनते
    वो सरे-आइना किरदार संभाले हुए हैं
    क्या बात है !! कितना सुन्दर शेर कहा है आप्ने ??!!! आइने से कश्मकश मे हारना ही है !!!
    गुम हुई जाती है तारीख़ अंधेरों में मगर
    आप तहरीर चमकदार संभाले हुए हैं
    ज़िन्दगी सिर्फ बयानबाजी मे जी रहे है लोग !!
    आखिर गज़ल का ताजमहल भी है मकबरा
    जो ज़िन्दगी ठीक उसको किसी ने जिया नहीं –बशीर !
    हम से मीज़ान संभलती नहीं ज़ेह्नो-दिल की
    लोग बाज़ार के बाज़ार संभाले हुए हैं
    इस ज़बान पर बलिहारी जाऊँ और अन्दाज़ पर भी !!
    ज़ब्त आंखों, में हंसी होठों पे, माथे पे शिकन
    देख क्या क्या तिरे बीमार संभाले हुए हैं
    अरे नही भई !! आप तो हर शेर के साथ दिलो जेहन पर तारी होटल जा रहे है बकुल देव जी कमाल का कहते हैं आप !!!
    जंग पूरी हुई फ़ातिह भी सभी लौट गये
    दिल के मैदां तो फ़क़त हार संभाले हुए हैं
    दिल के मैदाँ तो फकत हार सम्हाले हुये है –इस मिसरे ने ही दिल जीत लिया !!
    मुत्मइन हो न मिरी चश्मे-तमन्ना, न झपक
    वो नज़ारे अभी दो चार संभाले हुए हैं
    बार बार लगातार अच्छे शेर कहना !! क्या कमाल है भई –सीखे कहँ नवाब जू ऐसी बानी …. ??!!!
    सर ब जानूं जो नज़र आते हैं कुछ लोग यहाँ
    हाक़िम-ए-शह्र की दस्तार संभाले हुए हैं
    तस्लीम !!!
    था तो मौक़ा ये क़फ़स तोड़ के उड़ जाने का
    ‘आप जंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’
    अलग और शानदार गिरह !!!
    बकुल देव जी आपसे बहुत कुछ सीखने को मिला और मिलेगा !!! प्यास और शदीद कर दी है आपके गज़ल ने –बधाई –मयंक

  3. बकुल साहब, यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही ज़बरदस्त है मगर ये शेर किस खूबसूरत ज़ाविये से कहा गया है. ये ख़ानदाने-मुसहफ़ी के बहुत रौशन भविष्य की और संकेत कर रहा है. वाह वाह बने रहिये, सजे रहिये. आप निस्संदेह पूर्वजों के गौरव का कारण बनेंगे.

    टूट जाए न भरम अक्स के बनते बनते
    वो सरे-आइना किरदार संभाले हुए हैं

  4. बकुल,

    इतनी दाद के बाद कहने को कुछ नहीं रहा। कहिये और ख़ूब कहिये।

  5. Sahab…aisi mushqil zameen me aise aise sher nikaale hai aapne… Waah Waah waah…

    Gazal padh kar maza aa gaya…daad qubool farmayein … aur is sher ki goonj bahut der take rahegi :

    टूट जाए न भरम अक्स के बनते बनते
    वो सरे-आइना किरदार संभाले हुए हैं

  6. बकुल देव साहब मतले से ही रंग जमा दिया आपने! निहायत उम्दा ग़ज़ल हुई है. दाद और मुबारकबाद!

  7. बकुल देव SAHAB AAP KE KIS KIS SHER KO CODE KIYA JAAYE SABHI SHER QAABIL-E-DAAD HAIN, DAAD QABOOL FARMAAYE’N.

  8. देव साहब
    नमस्कार

    इस ग़ज़ल की तारीफ़ हमसे न हो पाएगी, कोई एक शेर हो तो दाद दूँ पूरी भरपूर मुरस्सा ग़ज़ल !!!

    ऐसा लगता है इक आज़ार संभाले हुए हैं
    ज़िन्दगी हम तुझे बेकार संभाले हुए हैं
    क्या मतला है हुज़ूर !!!

    टूट जाए न भरम अक्स के बनते बनते
    वो सरे-आइना किरदार संभाले हुए हैं
    क्या ही बढ़िया तस्वीर खेंची है !!!!

    गुम हुई जाती है तारीख़ अंधेरों में मगर
    आप तहरीर चमकदार संभाले हुए हैं
    चमकता हुआ शेर …. वल्लाह !

    हम से मीज़ान संभलती नहीं ज़ेह्नो-दिल की
    लोग बाज़ार के बाज़ार संभाले हुए हैं
    मज़बूरियाँ बखूबी बयाँ की साहब। ।!

    जंग पूरी हुई फ़ातिह भी सभी लौट गये
    दिल के मैदां तो फ़क़त हार संभाले हुए हैं
    हर जंग का सच यही है ….!

    मुत्मइन हो न मिरी चश्मे-तमन्ना, न झपक
    वो नज़ारे अभी दो चार संभाले हुए हैं
    दाद सरकार दाद !!!

    था तो मौक़ा ये क़फ़स तोड़ के उड़ जाने का
    ‘आप जंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’
    क्या गिरह है साहब।

  9. bhai poori ki poori ghazal achchi hai. dili daad qubool keejiye… bhai lafz par apki pahli dastak ne ummmeedon ka charagh raushan kar diya hai.mujhe yaqeen hai aap ise jalaaye rakhenge…

  10. बकुल देव जी
    ख़ूबसूरत शाहकार गज़ल के लिए हार्दिक बधाई.

    टूट जाए न भरम अक्स के बनते बनते
    वो सरे-आइना किरदार संभाले हुए हैं

    गुम हुई जाती है तारीख़ अंधेरों में मगर
    आप तहरीर चमकदार संभाले हुए हैं

    जंग पूरी हुई फ़ातिह भी सभी लौट गये
    दिल के मैदां तो फ़क़त हार संभाले हुए हैं

    सर ब जानूं जो नज़र आते हैं कुछ लोग यहाँ
    हाक़िम-ए-शह्र की दस्तार संभाले हुए हैं

    था तो मौक़ा ये क़फ़स तोड़ के उड़ जाने का
    ‘आप जंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’

    बहुत अच्छे लगे ये शे’र

  11. भरपूर ग़ज़ल के लिए दिल से दाद ब‍कुल देव साहब! किस शे’र का जि़क्र करें और किसे छोड़ें…. अस्‍ल बात ये कि हर शे’र बहुत अच्‍छा
    वाह…वाह…।

    ऐसा लगता है इक आज़ार संभाले हुए हैं
    ज़िन्दगी हम तुझे बेकार संभाले हुए हैं

    टूट जाए न भरम अक्स के बनते बनते
    वो सरे-आइना किरदार संभाले हुए हैं

    गुम हुई जाती है तारीख़ अंधेरों में मगर
    आप तहरीर चमकदार संभाले हुए हैं

    हम से मीज़ान संभलती नहीं ज़ेह्नो-दिल की
    लोग बाज़ार के बाज़ार संभाले हुए हैं

    ज़ब्त आंखों, में हंसी होठों पे, माथे पे शिकन
    देख क्या क्या तिरे बीमार संभाले हुए हैं

    जंग पूरी हुई फ़ातिह भी सभी लौट गये
    दिल के मैदां तो फ़क़त हार संभाले हुए हैं

    मुत्मइन हो न मिरी चश्मे-तमन्ना, न झपक
    वो नज़ारे अभी दो चार संभाले हुए हैं

    सर ब जानूं जो नज़र आते हैं कुछ लोग यहाँ
    हाक़िम-ए-शह्र की दस्तार संभाले हुए हैं

    था तो मौक़ा ये क़फ़स तोड़ के उड़ जाने का
    ‘आप जंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’

    सादर
    -नवनीत शर्मा

  12. Shandar ghazal hui hai bhai.. waaaah!!
    ye ash’aar to kamaal haiN..
    सर ब जानूं जो नज़र आते हैं कुछ लोग यहाँ
    हाक़िम-ए-शह्र की दस्तार संभाले हुए हैं

    था तो मौक़ा ये क़फ़स तोड़ के उड़ जाने का
    ‘आप जंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’

    Mubarakbaad!!!

  13. Bahut achhii gazal huii h bakuldeo sahab
    Gazal to umda hai hi aur tarah misre par girah bhi shaandaar hai
    dili daad

    Alok mishra

  14. Kya badhiya matla hai…girah bhi behad umda hai…murassa ghazal..wahh..daad qubule’n
    -kanha

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: