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T-20/17 इल्मो-हिकमत के हम अक़दार संभाले हुए हैं-‘शफ़ीक़’ रायपुरी

इल्मो-हिकमत के हम अक़दार संभाले हुए हैं
अज़मते-जुब्बा-ओ-दस्तार संभाले हुए हैं

अपने असलाफ़ के अतवार संभाले हुए हैं
हम चमकते हुए किरदार संभाले हुए हैं

ग़म का इक वार ही बस तुमसे संभाला न गया
दिल पे हम ऐसे कई वार संभाले हुए हैं

जीत की शक्ल नज़र आये तो कैसे आये
लोग दामन में कई हार संभाले हुए हैं

कोई सूरत भी निकलने की निकलती ही नहीं
हम तमन्नाओं के अम्बार संभाले हुए हैं

अपने असलाफ़ के किरदार को इस दौर में हम
ऐसा लगता है कि बेकार संभाले हुए हैं

ईद हो या कि वो क्रिसमस हो कि दीवाली हो
भाई-चारे को  ये त्यौहार संभाले हुए हैं

आप अपने क़दो-क़ामत को संभाले रखिये
हम ग़ज़लगोई का मेयार संभाले हुए हैं

हमसे संजीदा-मिज़ाजों का गुज़र नामुमकिन
मसख़रे शाहों का दरबार संभाले हुए हैं

आ गये हैं मिरे आगे मिरी लाठी बन कर
मेरे बच्चे अभी घर-बार संभाले हुए हैं

रात-दिन करती है नफ़रत के सरों को जो क़लम
हम वो अख़लाक़ की तलवार संभाले हुए हैं

हम पे अल्लाह ने तूफ़ानों को हल्का रक्खा
ऐसे हुदहुद तो कई बार संभाले हुए हैं

उस तरफ ही नहीं मेयारे-सुख़न के हामिल
हम भी दरियाओं के इस पार संभाले हुए हैं

कश्तिये-शेरो-सुख़न डूब नहीं सकती ” शफ़ीक़ ”
हम अदब की अभी पतवार संभाले हुए हैं

‘शफ़ीक़’ रायपुरी 09406078694

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20 comments on “T-20/17 इल्मो-हिकमत के हम अक़दार संभाले हुए हैं-‘शफ़ीक़’ रायपुरी

  1. इल्मो-हिकमत के हम अक़दार संभाले हुए हैं
    अज़मते-जुब्बा-ओ-दस्तार संभाले हुए हैं
    शफ़ीक़ साहब मेरा उर्दू ज्ञान इतना नही है कि हर शब्द का अर्थ मलूम हो लेकिन लुगत काम आती है ऐसे मे !! लेकिन आपकी ग़ज़ल पढ कर हमेशा आनन्द आ जाता है अल्फाज़ मे उतर कर और भी और शेर की तह मे उतर कर और भी –गज़ल दोबला पढ कर और भी !!! मतला शानदार है और जानदार भी !!
    अपने असलाफ़ के अतवार संभाले हुए हैं
    हम चमकते हुए किरदार संभाले हुए हैं
    फिर लुगत काम आई –लेकिन हुस्ने मतला पर भी अनन्द आ गया !!!
    ग़म का इक वार ही बस तुमसे संभाला न गया
    दिल पे हम ऐसे कई वार संभाले हुए हैं
    ज़ख्मो की तादाद न पूछो
    छोटा घर मेहमान बहुत है — मुझे ये शेर ज़फर कलीम साहब ने नागपुर मे सुनाया था !!
    जीत की शक्ल नज़र आये तो कैसे आये
    लोग दामन में कई हार संभाले हुए हैं
    अगर गिरह लगाने को सानी मिसरा दिया जाता तो लोग मुख्तलिफ ज़ाविये पर शेर कहते !! सुन्दर कहा है आपने हार !! शब्द को मोडा है और फन दीखता है !!!
    कोई सूरत भी निकलने की निकलती ही नहीं
    हम तमन्नाओं के अम्बार संभाले हुए हैं
    हाथ आया नही कुछ रात की दलदल के सिवा
    हाय किस मोड पे ख्वाबो के परस्तार गिरे !! –शिकेब
    इतनी राहे मुझे बुलाती हैं
    जुस्तजू राह भूल जाती है –मयंक
    तम्न्नाओ के अम्बार मे जीना मुश्किल है !!!
    अपने असलाफ़ के किरदार को इस दौर में हम
    ऐसा लगता है कि बेकार संभाले हुए हैं
    ये बात हुई !!! दुनिया भाड मे जाये हम अब सम्झौता नही करने वाले !! यही लहजा बाँकपन रखता है –इसी की अंतर्ध्वनि आपके शेर मे है !! वाह !!!
    ईद हो या कि वो क्रिसमस हो कि दीवाली हो
    भाई-चारे को ये त्यौहार संभाले हुए हैं
    शफीक़ साहब !! बात अच्छी है –लेकिन ये शेर साधारण है शिल्प के लिहाज से !!!
    आप अपने क़दो-क़ामत को संभाले रखिये
    हम ग़ज़लगोई का मेयार संभाले हुए हैं
    हाँ वाह !! हम न हिन्दू है न मुस्लिम हम तो शाइर है हमारा मजहब ही अलग है !! हम गज़लगोई का मेयार सम्हाले हुये है !!!
    हमसे संजीदा-मिज़ाजों का गुज़र नामुमकिन
    मसख़रे शाहों का दरबार संभाले हुए हैं
    मालिक !! बात आप की सोलह आने सहीह है – जिस तरीके के बयानात सिर्फ सुर्खियो मे बने रहने के लिये दिये जाते है और जिस तरीके से ज़िन्दगी की तल्ख हकीकत को सियासत दर्किनार रखती है उससे तो यही महसूस होता है !!
    आ गये हैं मिरे आगे मिरी लाठी बन कर
    मेरे बच्चे अभी घर-बार संभाले हुए हैं
    अच्छा लगा ये शेर पढकर !! आप किस्मत के धनी है –सभी ये बयान नहीं दे सकते !! आजकल बच्चे लाठी बन कर सर पर आजाते हैं !!
    रात-दिन करती है नफ़रत के सरों को जो क़लम
    हम वो अख़लाक़ की तलवार संभाले हुए हैं
    बहुत खूब बहुत खूब !!
    राह दुश्मन की तंग करने को
    बाँहे फैला के पेश आये हम !! –मयंक
    हम पे अल्लाह ने तूफ़ानों को हल्का रक्खा
    ऐसे हुदहुद तो कई बार संभाले हुए हैं
    दौरे हाज़िर का मंज़र लिया है !!
    उस तरफ ही नहीं मेयारे-सुख़न के हामिल
    हम भी दरियाओं के इस पार संभाले हुए हैं
    क्यो नही और उनसे ज़ियादा शिद्दत से और उनसे ज़ियादा सलीके से !!!
    कश्तिये-शेरो-सुख़न डूब नहीं सकती ” शफ़ीक़ “
    हम अदब की अभी पतवार संभाले हुए हैं
    ‘शफ़ीक़’ रायपुरी साहब आपको पधना मेरे लिये हमेशा एक सुखद अहसास रहा है और आप इस अदब की ज़ीनत भी है –मयंक

    • Mayank Awasthi sahab, AAP KE COMMENTS PADH KAR HAMESHA DIL KHUSH HO JATA HAI, HAR ZAAVIYE SE SHER KE HAR PAHLOO PAR IZHAAR-E-KHAYAAL KARNA YE AAP HI KA HISSA HAI AAP KE COMMENTS K AAGE LAFZ ”SHUKRIYA” BAHUT HI CHHOTA LAGTA HAI, PHIR BHI BAHUT BAHUT SHUKRIYA, NAWAAZISH, HAA’N EK BAAT AUR MEHFIL AB TAK SOONI SOONI LAG RAHI THI AB ”AAP AAYE BAHAAR AAYI” . ‘SARAAPA MAMNOON’ Shafique Raipuri

  2. कश्तिये-शेरो-सुख़न डूब नहीं सकती ” शफ़ीक़ “
    हम अदब की अभी पतवार संभाले हुए हैं

    वाह वाह आपने दुरुस्त फ़रमाया, ख़ाकसार की दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  3. कोई सूरत भी निकलने को निकलती ही नहीं
    हम तमन्नाओं के अम्बार संभाले हुए हैं

    अपने असलाफ़ के किरदार को इस दौर में हम
    ऐसा लगता है कि बेकार संभाले हुए हैं

    हम पे अल्लाह ने तूफ़ानों को हल्का रक्खा
    ऐसे हुदहुद तो कई बार संभाले हुए हैं

    Kya kaha jaaye is khoobsurat gazal ke baare mein …. Dili mubaraqbaad… Bahut bahut shukriya 🙂

  4. आहा…आहा।
    बहुत अच्‍छी ग़़ज़ल आदरणीय शफी़क़ रायपुरी साहब।
    बहुत उम्‍दा।
    दाद कबूल करें।
    सादर
    नवनीत

  5. शफीक़ साहब क्या अच्छी ग़ज़ल कही है. भरपूर दाद!

  6. ‘शफ़ीक़’ साहब
    नमस्कार

    ग़म का इक वार ही बस तुमसे संभाला न गया
    दिल पे हम ऐसे कई वार संभाले हुए हैं
    इस अदा पर कुर्बान …

    हमसे संजीदा-मिज़ाजों का गुज़र नामुमकिन
    मसख़रे शाहों का दरबार संभाले हुए हैं
    अच्छा है ….

    हम पे अल्लाह ने तूफ़ानों को हल्का रक्खा
    ऐसे हुदहुद तो कई बार संभाले हुए हैं
    समकालीन परिस्थितियों को दिल से जोड़ता हुआ अद्भुत शेर

  7. kya kahne mohtaram….is achchi ghazal ke liye dili daad qubool keejiye

  8. Janab Shafeeq sb bahot achchi ghazal kahi hai aapne… Waaah!!

  9. umda gazal huii hai Shafik rayypuri sahab
    dher saari daad

    regards
    Alok mishra

  10. Bahut achhi ghazal hai janab..sare ash’aar behad umdaa hain…bharpoor daad qubule’n..!
    -kanha

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