9 टिप्पणियाँ

T-20/12 गुलशनो-वादी-ओ-कुहसार संभाले हुए हैं-”शरीफ़” अंसारी

गुलशनो-वादी-ओ-कुहसार संभाले हुए हैं
तेरे कूचे के तलबगार संभाले हुए हैं

अपनी हर साँस की रफ़्तार संभाले हुए हैं
“आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं ”

हमसे दो-चार जुनूंकार संभाले हुए हैं
दिल के अंदर जो ग़मे-यार संभाले हुए हैं

कहीं मक़तल तो कहीं दार संभाले हुए हैं
सरफ़रोशी का जो मेयार संभाले हुए हैं

आज जो कुर्सीये-दरबार संभाले हुए हैं
कौन कहता है कि सरकार संभाले हुए हैं

राज़ कैसा सरे-बाज़ार संभाले हुए हैं
“आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं ”

ये हमारा ही जिगर है कि भरी महफ़िल में
चश्मे-साक़ी का हरिक वार संभाले हुए हैं

सर पे आँचल नहीं तमगे हैं हयादारी के
पाकबाज़ी का जो मेयार संभाले हुए हैं

शुक्र कर गर्दिशे-दौरां तिरा अहसानो-करम
हम से कुछ बेकसो-लाचार संभाले हुए हैं

जिनका कुछ नाम न दुनिया में निशानी है कहीं
वक़्त की मार वो बेकार संभाले हुए हैं

तेरी यादों का ये फ़ैज़ाने-करम है ऐ दोस्त
हम जो सांसों का इक-इक तार संभाले हुए हैं

उस तरफ उनपे जो गुज़रेगी वही जानेंगे
मेरे आंसू मुझे इस पार संभाले हुए हैं

शायरी का मिरी मेयार बस इतना है “शरीफ़”
मेरे अफ़कार को अशआर संभाले हुए हैं

”शरीफ़” अंसारी 09827965460

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9 comments on “T-20/12 गुलशनो-वादी-ओ-कुहसार संभाले हुए हैं-”शरीफ़” अंसारी

  1. गुलशनो-वादी-ओ-कुहसार संभाले हुए हैं
    तेरे कूचे के तलबगार संभाले हुए हैं
    सभी होठों पे ताले हैं सभी आँखो पे पहरा है
    यहाँ इंसाफ गूंगा है यहाँ सुल्तान बहरा है
    दिलो पे बर्फ की चादर को पिघला दे कोई सूरज
    यहाँ तो एक ही मौसम बडी मुद्दत से ठहरा है
    जिस कूचे की बात है वही की तस्वीर ऊपर भी बयाँ की गई है !!! गुलशनो-वादी-ओ-कुहसार को यकीनन उसके तलबगार सम्हाले हुये हैं !!!!
    अपनी हर साँस की रफ़्तार संभाले हुए हैं
    “आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं “
    इस मुशाइरे की ये सटीक और तार्किक गिरह है !!!
    हमसे दो-चार जुनूंकार संभाले हुए हैं
    दिल के अंदर जो ग़मे-यार संभाले हुए हैं
    दिल के अन्दर !!??! तस्लीम वगर्ना !! चेहरे पर तो गमे-यार कई लोग ओढे रहते हैं !!! हुस्ने मतला -2 बहुत खूब है !!!
    कहीं मक़तल तो कहीं दार संभाले हुए हैं
    सरफ़रोशी का जो मेयार संभाले हुए हैं
    बिल्कुल !!!! ज़िन्दगी को जो वकार दिया है वो मक्तल और दार कुबूल करने वालो ने ही दिया है !
    राज़ कैसा सरे-बाज़ार संभाले हुए हैं
    “आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं “
    शरीफ साहब !!! हर महदूद दायरे मे इस शेर के म आनी सम्झे जायेंगे लेकिन मुख्तलिफ होंगे !! अच्छी शीशागरी है इस शेर मे !!!
    ये हमारा ही जिगर है कि भरी महफ़िल में
    चश्मे-साक़ी का हरिक वार संभाले हुए हैं
    कब इल्तिफात हो साकी का और किस पर हो
    कि मुंतज़िर है सभी का गिलास महफिल मे
    हम एक ख्वाब हैं बेदार ए चश्मे साकी मे
    कोई न जान सका रू शनास महफिल मे
    सबपे साकी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नही !! इसलिये ज़िन्दगी की मय जिसके पास हो उसकी निगह का वार सम्हालने की कूवत ही ज़िन्दगी का सफर तय करने के कूवत है –खूब शेर कहा है !!!
    सर पे आँचल नहीं तमगे हैं हयादारी के
    पाकबाज़ी का जो मेयार संभाले हुए हैं
    हयादारी के तम्गे !!!! कहां से आप ये मोती चुनते हैं –कमाल ये है कि मुझे शबनम चुनने का हुनर नही आता –आप के हाथ मे आते ही ये गुहर कैसे बन जाती है ???!!!
    शुक्र कर गर्दिशे-दौरां तिरा अहसानो-करम
    हम से कुछ बेकसो-लाचार संभाले हुए हैं
    अश्जार की जडो को कौन देख पाया है आज तक !!! बहुत खूब कहा है बहुत खूब !!!
    जिनका कुछ नाम न दुनिया में निशानी है कहीं
    वक़्त की मार वो बेकार संभाले हुए हैं
    ये तमाम उम्र गुज़री बडे सख़्त इम्तिहाँ से
    न ठीक खुदकुशी की ताकत , न ही लड सके जहाँ से !!!!
    तेरी यादों का ये फ़ैज़ाने-करम है ऐ दोस्त
    हम जो सांसों का इक-इक तार संभाले हुए हैं
    हुसने मतला से सिरा मिलता है इस शेर का और खूबसूरत शेर है !!!
    उस तरफ उनपे जो गुज़रेगी वही जानेंगे
    मेरे आंसू मुझे इस पार संभाले हुए हैं
    बहुत खूब एक शेर शहपर रसूल का क्वोट कर दूँ — मुझे भी लम्हा ए हिजरत ने कर दिया तक़्सीम
    निगाह घर की तरफ है कदम सफर की तरफ –शहपर रसूल !!!
    शायरी का मिरी मेयार बस इतना है “शरीफ़”
    मेरे अफ़कार को अशआर संभाले हुए हैं
    और ये सच्चे शाइर की कुव्वते गोयाई है !! यही शैरे की सरहद भी है अगर शैर की शख्सीयत के मेयार की इंतेहा देखी जाय तो भी !!!
    ”शरीफ़” अंसारी साहब इस गज़ल पर कमेण्ट मे जो देरी हुई इसके लिये मुआफी का तलबगार हूँ – मैं निजी मसाइल मे काफी वक़्त उलझा रहा और अभी भी उनकी गिरिफ्त मे हूँ – इस गज़ल ने मुशाइरे को कामयाब कर दिया और एक लसानी अरूज़ भी इस तरही को दिया है !! बहुत बहुत बधाई—मयंक

  2. अंसारी साहब।
    नमस्‍कार।
    अच्‍छी ग़ज़ल हुई। शुक्रिया।
    नवनीत

  3. ख़ूब ग़ज़ल कही है अंसारी साहब! दाद हाज़िर है.

  4. उस तरफ उनपे जो गुज़रेगी वही जानेंगे
    मेरे आंसू मुझे इस पार संभाले हुए हैं WAAQAYI BEHTAREEN SHER SHAREEF SAHAB, MUBAARAKBAAD QABOOL KARE’N.

  5. उस तरफ उनपे जो गुज़रेगी वही जानेंगे
    मेरे आंसू मुझे इस पार संभाले हुए हैं

    शरीफ़ साहब इस शेर का क्या कहना वाह वाह…..दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  6. ”शरीफ़” साहब
    आदाब !

    कहीं मक़तल तो कहीं दार संभाले हुए हैं
    सरफ़रोशी का जो मेयार संभाले हुए हैं
    क्या खूब कहा …… !

  7. उस तरफ उनपे जो गुज़रेगी वही जानेंगे
    मेरे आंसू मुझे इस पार संभाले हुए हैं

    दिली दाद.

  8. Mere aansu mujhe is paar sambhale hue hain… kya hi accha sher hua hai… waah… daad qubulen

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