18 टिप्पणियाँ

T-20/11 सख़्त मुश्किल में भी किरदार सम्भाले हुए हैं-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’

सख़्त मुश्किल में भी किरदार सम्भाले हुए हैं
तेरी हस्ती को गुनहगार सम्भाले हुए हैं

मिट गयी होती कभी की ये रियासत फ़न की
वो तो हम हैं कि जो दरबार सम्भाले हुए हैं

एक इक करके निकलती गयी हाथों से ज़मीं
मुहतरम लफ़्ज़े-ज़मींदार संभाले हुए हैं

उन फ़क़ीरों को ख़ुदा कर दे तू सजदा जायज़
दौरे-हाज़िर में जो परिवार संभाले हुए हैं

चाँद, पैवंद,फ़लक, शाल,सितारे, जुगनू
ये ज़बां भी मिरे अशआर संभाले हुए हैं

आपके बाद किसी को भी न देखा हमने
आँखें दीदार का मेयार संभाले हुए हैं

फ़र्ज़ दुनिया का हो घर-बार का या हो दिल का
अपने कांधों पे लगातार संभाले हुए हैं

क़त्ल का काम भी आसान हुआ जाता है
किस सलीक़े से वो तलवार संभाले हुए हैं

ये जो दुनिया है वजूद इसका कहाँ बच पाता
दर हक़ीक़त इसे फ़नकार संभाले हुए हैं

आसमां ओढ़ना धरती को बिछौना करके
हम मुहब्बत तिरी दस्तार संभाले हुए हैं

इक सदी बीत गयी टूटे हुए ज़ंजीरें
“आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’ 09818354784

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18 comments on “T-20/11 सख़्त मुश्किल में भी किरदार सम्भाले हुए हैं-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’

  1. सख़्त मुश्किल में भी किरदार सम्भाले हुए हैं
    तेरी हस्ती को गुनहगार सम्भाले हुए हैं
    “गुनहगार” !! लफ्ज़ सोचने पर मजबूर कर देता है और इसी मे मतले की ताकत छिपी हुई है !!! इस लफ्ज़ मे दलील भी है और तंज़ भी !! खूब कहा इरशाद भाई !! वाह !!!
    मिट गयी होती कभी की ये रियासत फ़न की
    वो तो हम हैं कि जो दरबार सम्भाले हुए हैं
    सीधी सादी बात—लेकिन इस शाइर की नज़र को क्या कहे दिल से तिरी निगाह जिगर मे उतर गई //दोनो को इक अदा मे रज़ामन्द कर गई !!!
    एक इक करके निकलती गयी हाथों से ज़मीं
    मुहतरम लफ़्ज़े-ज़मींदार संभाले हुए हैं
    मैं इस शेर के तफ्सील मे उतरूंगा तो “मुहतरम” लफ्ज़ के वो माअने खुलेगे जो मुतरमो को पसन्द नही आयेंगे लेकिन शेर मुझे बहुत पसन्द आया !!!
    उन फ़क़ीरों को ख़ुदा कर दे तू सजदा जायज़
    दौरे-हाज़िर में जो परिवार संभाले हुए हैं
    अस्ल वैराग्य क्या होता है इसके तफ़्तीश शेर बखूबी कर रहा है !!! ज़िन्दगी के दवाब मे ही सही –लेकिन दाम हर मौज मे है हल्का ए सदकामे नहंग // देखे क्या गुज़रे है कतरे पे गुहर होने तक !!! कितना मुश्किल है ज़िन्दगी का सफर !!!???
    चाँद, पैवंद,फ़लक, शाल,सितारे, जुगनू
    ये ज़बां भी मिरे अशआर संभाले हुए हैं
    बेशक आपके शेर काइनात समोये हुये है खुद मे !!!
    आपके बाद किसी को भी न देखा हमने
    आँखें दीदार का मेयार संभाले हुए हैं
    इस शेर को मैं इस मुशायरे का सबसे कीमती शेर कहूंगा –कम स कम जितना अभी तक पढा है उस तेक्स्ट के तई ये सच है !!! कोई मिसाल नही इसकी खूबसूरती की –इरशाद भई –आप सिकन्दर हैं !!!
    क़त्ल का काम भी आसान हुआ जाता है
    किस सलीक़े से वो तलवार संभाले हुए हैं
    और तलवार लफ्ज़ो की की हो सकती है दिये गये भरोसे की हो सकती है दोस्ती की हो सकती है कैसी भी हो सक्ती है !! बस जिस सलीके से लोग इस तलवार का इस्तेमाल करते है उसकी बात है –शेर पर दाद !!
    आसमां ओढ़ना धरती को बिछौना करके
    हम मुहब्बत तिरी दस्तार संभाले हुए हैं
    इस शेर का भी सानी मिसरा खुद मे मुकम्मल है और बहुत सुन्दर है !!!
    इक सदी बीत गयी टूटे हुए ज़ंजीरें
    “आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”
    गिरह अच्छी है और वफापरस्तो के लिये सच्ची है –इरशाद भाई !!! बहुत खूब बहुत खूब !!! –मयंक

  2. Dada kya hi achhii gazal huii hai
    hamesha ki hi tarah ak aur khoobsoorat tohfa diya aapne

    tamaam gazal hi nihayat khoobsoorat hai

    dili daad qubule keejiye

    regards
    Alok

  3. शे’र इरशाद के मैयार संभाले हुए हैं….
    इरशाद भाई। आपकी शायरी के बारे में क्‍या कहा जाए। हमेशा की तरह यह ग़ज़ल भी बहुत खूबसूरत।
    सादर
    नवनीत

  4. आपके बाद किसी को भी न देखा हमने
    आँखें दीदार का मेयार संभाले हुए हैं

    आसमां ओढ़ना धरती को बिछौना करके
    हम मुहब्बत तिरी दस्तार संभाले हुए हैं

    पूरी ग़ज़ल बहुत उम्दा मगर ये दो शेर बल के हुए हैं. दीदार का मेयार…वाह वाह… इरशाद ..ज़िंदाबाद

  5. मिट गयी होती कभी की ये रियासत फ़न की
    वो तो हम हैं कि जो दरबार सम्भाले हुए हैं
    sachha she’r hai dada…

    चाँद, पैवंद,फ़लक, शाल,सितारे, जुगनू
    ये ज़बां भी मिरे अशआर संभाले हुए हैं

    आपके बाद किसी को भी न देखा हमने
    आँखें दीदार का मेयार संभाले हुए हैं

    ahaa..kya she’r hai

    फ़र्ज़ दुनिया का हो घर-बार का या हो दिल का
    अपने कांधों पे लगातार संभाले हुए हैं

    क़त्ल का काम भी आसान हुआ जाता है
    किस सलीक़े से वो तलवार संभाले हुए ह

    .behad umdaa ghazal hai dada..girah bhi khoob lagai hai..waahh..sadar

    -Kanha

  6. इरशाद भाई
    बहुत ही उम्दा ग़ज़ल … हमेशा की तरह
    सारे शेर बेहतरीन मगर इस शेर के सामने बंदगी करने का जी हो रहा है

    चाँद, पैवंद,फ़लक, शाल,सितारे, जुगनू
    ये ज़बां भी मिरे अशआर संभाले हुए हैं
    और

    आसमां ओढ़ना धरती को बिछौना करके
    हम मुहब्बत तिरी दस्तार संभाले हुए हैं
    वाह वाह

  7. इरशाद खान सिकन्दर साहब

    बेहद खूबसूरत अश’आर से सजी इस बेहद उम्दा ग़ज़ल के लिए दाद कबूल करें

    आपके बाद किसी को भी न देखा हमने
    आँखें दीदार का मेयार संभाले हुए हैं

    यह शे’र तो …… वाह वाह ……वाह ……वाह.

  8. इरशाद भाई आपके लहजे की तस्दीक करती हुई ग़ज़ल है. आप शायरी में दुर्लभ मौलिकता हासिल कर चुके हैं. दिली दाद.

  9. इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’ sahab umda ghazal par mubaarakbaad qabool kare’n.

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