10 टिप्पणियाँ

T20/9 वार पर वार है, हर वार संभाले हुए हैं-शमीम अब्बास

वार पर वार है, हर वार संभाले हुए हैं
मोर्चा सरफिरे दो चार संभाले हुए हैं

आख़िर इक हम ही रहे कूचा-ए- जानां का नसीब
और जितने भी थे घरबार संभाले हुए हैं

मोतरिफ़ ही नहीं, तब अज्र की उम्मीद ही क्या
ज़िन्दगी हम तुझे बेकार संभाले हुए हैं

तन्हा बस की नहीं तेरे तेरी दुनिया या रब
हैं कई और मददगार, संभाले हुए हैं

-शमीम अब्बास                                       09029492884

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10 comments on “T20/9 वार पर वार है, हर वार संभाले हुए हैं-शमीम अब्बास

  1. शमीम भाई,
    दाद और सौ सौ दाद।आप को पढ़ना, सुनना हमेशा अच्‍छा लगा है और ऐसा ही इस बार भी हुआ है। और हां मैं उमीद करता हूं कि आपका और भी तरही कलाम पढ़ने को मिलता रहेगा।

  2. -शमीम अब्बास साहब !!! आदाब !!
    वक्त सारी ज़िन्दगी मे दो ही गुजरे हैं कठिन –इक तेरे आने के पहले इक तेरे जाने के बाद !!! शदीद प्यास ऐसा लगा कि 4 शेरो से नही बुझेगी –लेकिन होठो पर आने से कतरे दरिया मे तब्दील हो गये !!! सिरफिरो को जो वकार और इस लफ्ज़ को जो वुसाअत मतले ने दी है वो कमाल है !!! – कैस की रूह का इज़हार और दीदार दूसरे शेर मे हुआ है और अलमीया ज़िन्दगी का तेसरे शेर मे तमाम कर्ब के साथ उमड पडा है लेकिन –अंतिम शेर मे आपने जिसे सम्बोधित किया है उसे इस शिद्दत से तो अल्लामा इकबाल भी नही ललकार सके थे !!! कमाल है कमाल है कमाल है –वाह ___ मयंक

  3. आख़िर इक हम ही रहे कूचा-ए- जानां का नसीब
    और जितने भी थे घरबार संभाले हुए हैं

    Dada gazal to chhoti hai par kamaal ki hai aur ye sher to jaanlewa hai
    waahhh waahh waahh

    aapko yaha dekh kar bahut khushi ho rahi hai dada

    with best reagrds
    Alok mishra

  4. शमीम साहब बहुत छोटी ग़ज़ल गोया फ़ितना ही है. हर शेर भरपूर. दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  5. आख़िर इक हम ही रहे कूचा-ए- जानां का नसीब
    और जितने भी थे घरबार संभाले हुए ह
    waahhh ..kya behatreen she’r hai ..ahaa
    -kanha

  6. आख़िर इक हम ही रहे कूचा-ए- जानां का नसीब
    और जितने भी थे घरबार संभाले हुए हैं

    वाह वाह . क्या कहने!

  7. dada.. khoob she’r hue hain..
    आख़िर इक हम ही रहे कूचा-ए- जानां का नसीब
    और जितने भी थे घरबार संभाले हुए हैं
    aur is she’r ke kahne hi kya… kamaal ka sher hua hai… daad qubul karen..

  8. शमीम अब्बास साहब आपकी आमद से लफ्ज़ की महफ़िल और रौशन हुई है. मुहब्बत बरसाते रहें,

  9. मोतरिफ़ ही नहीं, तब अज्र की उम्मीद ही क्या
    ज़िन्दगी हम तुझे बेकार संभाले हुए हैं
    umda sher

  10. आख़िर इक हम ही रहे कूचा-ए- जानां का नसीब
    और जितने भी थे घरबार संभाले हुए हैं…waah waah kya hi achcha sher hua mubarakbaad ..shameem sahab lafz me aapki dastak par dil baagh-baagh ho utha ..khushaamdeed….

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