19 टिप्पणियाँ

T-20/8 घर की गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं-चंद्रभान भारद्वाज

घर की गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं
एक बिखरा हुआ परिवार संभाले हुए हैं

सुब्ह रोज़ी का न शामों को पता रोटी का
ऐसे हालात में घर-बार संभाले हुए हैं

फ़ैसला हो नहीं पायेगा हमारे हक़ में
कुर्सियाँ सारी गुनहगार संभाले हुए हैं

बोझ ज़ंजीर का पैरों पे सँभाला हमने
आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं

उसकी नीदों में कहीं विघ्न न आये कोई
हम बुरे वक़्त का हर वार संभाले हुए हैं

जो कभी जंग के मैदान में उतरे ही नहीं
आज बिन मूठ की तलवार संभाले हुए हैं

अब सज़ा से भी उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता है
जेल में रह के भी दरबार संभाले हुए हैं

जिसकी कथनी में असर है न असर करनी में
लोग उस नाम को बेकार संभाले हुए हैं

गाड़ियाँ उनकी चलाते तो हैं रोबोट यहाँ
वो रमोटों से ही रफ़्तार संभाले हुए हैं

उनको मैदान में आने की ज़रूरत ही नहीं
मोर्चा उनके तरफ़दार संभाले हुए हैं

उगते सूरज को छिपाया है जिन्होंने अबतक
ख़ुद उजालों का वो बाज़ार संभाले हुए हैं

ज़िन्दगी अपनी ‘भरद्वाज’ न सँभली हमसे
उसकी यादों के वरक़ यार संभाले हुए हैं

चंद्रभान भारद्वाज 09826025016

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19 comments on “T-20/8 घर की गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं-चंद्रभान भारद्वाज

  1. चंद्रभान साहब, बहुत ख़ूब

  2. चंद्रभान भारद्वाज साहब !! आपके सारे मनाजिर तस्लीम –सीधे सादे सटीक शेर कहे है आपने लेकिन बिन मूठ की तलवार किन बेबेसो को सम्हालनी पड रही है !! इस शेर ने कमाल कर दिया !! उगते सूरज को छिपाने वालो पर तंज़ और जेल मे रह कर दरबार सम्हालने वालो का ज़िक्र कर आपने हर नशिस्त मे तालिया बटोरने वाली गज़ल कह दी है !! ये ज़ुबान तुरत उतरती है दिलो जेहन मे और खल्कत को ऐसी ही गज़लो की दरकार भी रहती है – बधाई –मयंक

  3. चन्द्रभान साहब अच्छी ग़ज़ल है. कई शेर क़ाबिले-तारीफ़ हैं. दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  4. सुन्दर गज़ल के लिए बधाई चन्द्रभान भारद्वाज साहब!

  5. बोझ ज़ंजीर का पैरों पे सँभाला हमने
    आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं

    UMDA GIRAH

  6. आदरणीय चंद्रभान भारद्वाज साहब। अच्‍छी ग़ज़ल के लिए शुक्रिया।

  7. kya kahne bhardwaaj sahab…achchi ghazal kahi.

  8. भारद्वाज जी
    नमस्कार

    जिसकी कथनी में असर है न असर करनी में
    लोग उस नाम को बेकार संभाले हुए हैं
    और
    अब सज़ा से भी उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता है
    जेल में रह के भी दरबार संभाले हुए हैं

    किसी विद्रूपता को अदबी लहजे में किस खूबसूरती से कहा जा सकता है , उसकी बानगी ये शेर है !

  9. चंद्रभान साहब भाषा, कहन, शिल्प और भाव के स्तर पर यह एक कामयाब और शानदार हिन्दी ग़ज़ल है। दिली दाद कुबूल कीजिए

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