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T-20/5 आप बस जुब्बा-ओ-दस्तार संभाले हुए हैं-नूरुद्दीन नूर

आप बस जुब्बा-ओ-दस्तार संभाले हुए हैं
हम तो गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

घर ग्रहस्ती भी संभाले नहीं सम्भली जिन से
अब वही देश की सरकार संभाले हुए हैं

अब तक़ाज़े हैं जुदा और मसाइल हैं अलग
”आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

पारसाओं ने तो थक-हार के मुँह फेर लिया
क़ौम की पगड़ी गुनहगार संभाले हुए हैं

गालिबन ज़िल्ले-इलाही की ज़रुरत न रही
नवरतन इन दिनों दरबार संभाले हुए हैं

फ़ाख़्ता चोंच में लेती नहीं ज़ैतून की शाख़
हामी-ए-अम्न जो हथियार संभाले हुए हैं

हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता और हम
‘नूर’ ऐसे में भी किरदार संभाले हुए हैं

नूरुद्दीन नूर 09663435838

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10 comments on “T-20/5 आप बस जुब्बा-ओ-दस्तार संभाले हुए हैं-नूरुद्दीन नूर

  1. wah wah wah, mukammal ghazal hai, kya kehne, ek ek sher qaabile sad tehseen hai, murassa ghazal ke liye mubarakbaad pesh hai

  2. नूर साहब

    अच्छी ग़ज़ल, और ‘घर ग्रहस्ती’ को किस ख़ूबसूरती से बरता है आपने!वाह वाह।

  3. khoob ghazal huyi hai…waahhh

  4. नूरुद्दीन नूर साहब !! बहुत खूब !!! मतला खूब है किसी को रऊनत स्म्हालने से फुर्सत नही तो किसी को अस्तित्व का संकट है वाह !! – मोदी ममता – अम्मा –बहनजी – राहुल सभी को लपेट लिया है घर ग्रहस्ती वाले शेर मे !!!! तरही मिसरा भी एक जुदा अन्दाज़ मे निभाया है और खूब शेर कहा है !!! कौम के पगडी गुनहगार सम्हाले हुये है –राजनीति मिडिल ईस्ट और वर्तमान पर गहरा तंज़ है –
    नवरतन दरबार सम्हाले हुये है और — फ़ाख़्ता चोंच में लेती नहीं ज़ैतून की शाख़
    हामी-ए-अम्न जो हथियार संभाले हुए हैं
    बिल्कुल नया ख्याल है !!!! और ऐसे तारीक महौल मे किरदार सम्हालना वाकई कलेजे का काम है –हर शेर आपने काबिले दाद कहा है वाह वाह !!! –मयंक

  5. नूर साहब अच्छी ग़ज़ल कही. दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  6. अब तक़ाज़े हैं जुदा और मसाइल हैं अलग
    ”आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

    KHOOB GIRAH LAGI HAI MOHTARAM, MUBAARAKBAAD QABOOL KARE’N.

  7. गालिबन ज़िल्ले-इलाही की ज़रुरत न रही
    नवरतन इन दिनों दरबार संभाले हुए हैं
    आदरणीय नूर साहब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है | दिलिदाद कबूल फरमावें |

  8. नूर साहब।
    आदाब। ग़ज़ल अच्‍छी रही। यह शे’र साथ ले जा रहा हूं :
    हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता और हम
    ‘नूर’ ऐसे में भी किरदार संभाले हुए हैं

  9. नूर साहब
    आदाब

    गालिबन ज़िल्ले-इलाही की ज़रुरत न रही
    नवरतन इन दिनों दरबार संभाले हुए हैं
    और
    घर ग्रहस्ती भी संभाले नहीं सम्भली जिन से
    अब वही देश की सरकार संभाले हुए हैं
    ये तंज़ किस पर है….. कई नाम जेह्न में बेसाख़्ता कौंध गए हैं !!!!!!
    अच्छी ग़ज़ल पर दिली दाद !!!!

  10. बहुत खूब नूर साहब। अच्छे अश’आर हुए हैं, दाद कुबूल कीजिए

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