16 टिप्पणियाँ

T-20/4 हम कि उर्दू का जो अख़बार संभाले हुए हैं-आलोक कुमार श्रीवास्तव ‘शाज़’ जहानी

हम कि उर्दू का जो अख़बार संभाले हुए हैं
एक गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

आप पायल से रहें दूर तो बेहतर होगा
”आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

उनको शाबाश है जो आज की दुनिया में भी
अपना अख़्लाक़ और किरदार संभाले हुए हैं

मीरो-ग़ालिब की ज़बाँ ! अब भी हैं बहुतेरे जो
अपने कांधों पे तेरा बार संभाले हुए हैं

अपनी कोशिश में रहो, और अक़ीदा ये रखो
मेरे मौला मेरी पतवार संभाले हुए हैं

ए ख़ुदावंद, करम यूँ ही बनाये रखना
हम अभी तक तो ये दस्तार संभाले हुए हैं

अब तो बाक़ी न रही राख में चिंगारी भी
आप वो ख़त मिरे बेकार संभाले हुए हैं

जिसका गुल आपने ज़ुल्फ़ों में सजाया था कभी
अब भी उस शाख़ के हम ख़ार संभाले हुए हैं

चल गयी गर तो बचेगा न तुम्हारा लश्कर
हम अभी अपनी ये तलवार संभाले हुए हैं

ख़ुदग़रज़ होना तो सीढ़ी है कमयाबी की
शाज़ ! क्यों आप ये ईसार संभाले हुए हैं

आलोक कुमार श्रीवास्तव ‘शाज़’ जहानी मोबाइल 9350027775

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16 comments on “T-20/4 हम कि उर्दू का जो अख़बार संभाले हुए हैं-आलोक कुमार श्रीवास्तव ‘शाज़’ जहानी

  1. ‘शाज़’ जहानी साहब,

    अब तो बाक़ी न रही राख में चिंगारी भी
    आप वो ख़त मिरे बेकार संभाले हुए हैं
    ऐसा शै’र हो तो और क्‍या चाहिये। वाह वाह

  2. मीरो-ग़ालिब की ज़बाँ ! अब भी हैं बहुतेरे जो
    अपने कांधों पे तेरा बार संभाले हुए हैं

    अपनी कोशिश में रहो, और अक़ीदा ये रखो
    मेरे मौला मेरी पतवार संभाले हुए हैं

    लाजवाब ग़ज़ल। हर शेर पुख्ता और असरदार। रिवायत के साथ साथ नयी जमीन तलाशते अशआर, ग़ज़ल को नयी ऊचाइयों पर पहुंचा रहे हैं। ढेरों दाद

  3. ‘शाज़’ जहानी साहब !1 जिस आसानी से आपने गहरी बाते कही है उसका जवाब नही !!! रिवायत साथ चलते है आपकी ज़ुबान के !!!-उर्दू के अखबार की गिरती हुई दीवार से सम्बद्धता मतले मे खूब रहे और खूब कही !!! बेशतर शेर कांफिडेण्ट मश्वरे और दीदावरी के अन्दाज़ मे कहे गये है और खूब सजे है इस ज़मीन पर !!! मीरो गालिब की विरासत सम्हालना – शाखे मुहब्बत के खार सम्भालना – लश्कर को चुनौती सभी कुछ गहरे खयालात बेहद सहल और असरदार तरीके से आपने उतारे है अशार मे – गज़ल पर भरपूर दाद !!! –मयंक

  4. अब तो बाक़ी न रही राख में चिंगारी भी
    आप वो ख़त मिरे बेकार संभाले हुए हैं
    kya kahne shaz zehani sahab
    puri gazal hi khoobsoorat hai

    dili daadkubul keejiye

  5. अच्छी ग़ज़ल मगर इस शेर पर ख़ास तौर से दाद क़ुबूल फ़रमाइये

    अब तो बाक़ी न रही राख में चिंगारी भी
    आप वो ख़त मिरे बेकार संभाले हुए हैं

  6. हम कि उर्दू का जो अख़बार संभाले हुए हैं
    एक गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

    HAQEEQAT PAR MABNI MATLA , KHOOB, DHERO’N DAAD

  7. हम कि उर्दू का जो अख़बार संभाले हुए हैं
    एक गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

    उनको शाबाश है जो आज की दुनिया में भी
    अपना अख़्लाक़ और किरदार संभाले हुए हैं

    मीरो-ग़ालिब की ज़बाँ ! अब भी हैं बहुतेरे जो
    अपने कांधों पे तेरा बार संभाले हुए हैं

    अपनी कोशिश में रहो, और अक़ीदा ये रखो
    मेरे मौला मेरी पतवार संभाले हुए हैं

    ए ख़ुदावंद, करम यूँ ही बनाये रखना
    हम अभी तक तो ये दस्तार संभाले हुए हैं

    अब तो बाक़ी न रही राख में चिंगारी भी
    आप वो ख़त मिरे बेकार संभाले हुए हैं

    जिसका गुल आपने ज़ुल्फ़ों में सजाया था कभी
    अब भी उस शाख़ के हम ख़ार संभाले हुए हैं
    आदरणीय शाज़ साहब अशहार चुनने लगा तो पूरी ग़ज़ल ही हाथ आ गई ,किसे छोडूं सब बेशकीमती नगीने पिरोये हैं आपने |मज़ा आ गया बरसों बाद इतनी शानदार ग़ज़ल पढ़ी है |ढेरों दाद कबूल फरमावें |सादर

  8. बहुत खूब आलोक साहब, अच्छी ग़ज़ल हुई है दाद कुबूल कीजिए

  9. आलोक जी
    ग़ज़ल क्या है एक तेवर है साहब …… जो मतले से होता हुआ मक्ते तक उतरा है…. !!!

    इस शेर पर खास दाद

    अब तो बाक़ी न रही राख में चिंगारी भी
    आप वो ख़त मिरे बेकार संभाले हुए हैं

  10. हम कि उर्दू का जो अख़बार संभाले हुए हैं
    एक गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

    आप पायल से रहें दूर तो बेहतर होगा
    ”आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

    अब तो बाक़ी न रही राख में चिंगारी भी
    आप वो ख़त मिरे बेकार संभाले हुए हैं

    जिसका गुल आपने ज़ुल्फ़ों में सजाया था कभी
    अब भी उस शाख़ के हम ख़ार संभाले हुए हैं

    मतले से मक्ते तक का सफर बहुत खुशगवार है , इतनी तरह के मंज़र सामने आये हैं कि मज़ा आ गया। मेरी दिली दाद कबूल करें

  11. Reblogged this on oshriradhekrishnabole and commented:
    शब्दो को पीरोना और सजाना और बातो ही बातो जहाॅ की खबर ,,,अच्छी हैं

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