38 टिप्पणियाँ

T-20/3 फूल से ज़ख़्मों का अम्बार संभाले हुये हैं-आलोक मिश्रा

फूल से ज़ख़्मों का अम्बार संभाले हुये हैं
ग़म की पूँजी मिरे अशआर संभाले हुये हैं

हमसे पूछो न शबो-रोज़ का आलम सोचो
कैसे धड़कन की ये रफ़्तार संभाले हुये हैं

घर भी बाज़ार की मानिंद रखे हैं अपने
वो जो बाज़ार का मेयार संभाले हुये हैं

एक नोविल हैं कभी पढ़ तू हमें फ़ुर्सत में
तने-तन्हा कई क़िरदार संभाले हुये हैं

हम मुहब्बत के तले काँप रहे हैं ऐसे
जैसे दरकी हुई दीवार संभाले हुये हैं

ज़ख़्म लेकर ये सभी अपने मैं जाता भी कहाँ
यूँ भी इजलास गुनाहगार संभाले हुये हैं

आसमां छूने लगी है मिरी साँसों की सदा
“आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुये हैं”

मार देती मुझे कब की मिरे सीने की ख़लिश
ये तो गज़लें हैं जो हर वार संभाले हुये हैं

आलोक मिश्रा 09711744221 /09876789610

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38 comments on “T-20/3 फूल से ज़ख़्मों का अम्बार संभाले हुये हैं-आलोक मिश्रा

  1. एक नोविल हैं कभी पढ़ तू हमें फ़ुर्सत में
    तने-तन्हा कई क़िरदार संभाले हुये हैं…jawaaboob nahin is sher ka, bepanaah sher hai, bahot k

  2. आलोकजी,नई नस्‍ल से बड़ी उमीदें हैं। आपको पढ़कर लगता है कि ऐसा करना सही भी है। मुबारक हो ।

  3. हमसे पूछो न शबो-रोज़ का आलम सोचो
    कैसे धड़कन की ये रफ़्तार संभाले हुये हैं

    एक नोविल हैं कभी पढ़ तू हमें फ़ुर्सत में
    तने-तन्हा कई क़िरदार संभाले हुये हैं

    कमाल कमाल कमाल क्या ग़ज़ल कही है सुभान अल्लाह। हर शेर मुकम्मल और सधाहुआ है. ढेरों दाद कबूल करें

    नीरज

  4. behtareen ghazal…jis ke kai sher ..kai misre…behad pur asar haiN…wahh waahhh

  5. फूल से ज़ख़्मों का अम्बार संभाले हुये हैं
    ग़म की पूँजी मिरे अशआर संभाले हुये हैं
    ग़म की पूँजी मिरे अशआर संभाले हुये हैं… एक शायर का यही बयान हो सकता है !! खूब !! और इस पूंजी के लिये जो सिमिली दी है वो भी बेहतरीन है .. मतले पर वाह !!
    एक नोविल हैं कभी पढ़ तू हमें फ़ुर्सत में
    तने-तन्हा कई क़िरदार संभाले हुये हैं
    इस शेर पर तालियां क्योंकि इसमे नई खुश्बू है .. कबसे है एक हर्फ पर आंखे टिकी हुई // वो पध रहा हूँ जो नही लिख्खा किताब मे –शिकेब –लेकिन ज़िन्दगी की नावेल से तुलना जिसमे कई किरदार हैं – मुम्किन है ख्याल पहले कभी कहा गया हो लेकिन मैने नही पढा –वाह !!
    हम मुहब्बत के तले काँप रहे हैं ऐसे
    जैसे दरकी हुई दीवार संभाले हुये हैं
    मुहब्बत के सहीह अहसास की तस्वीर क्योंकि ये ही दुनिया की सबसे मजबूत और नाज़ुक शै –दोनो ही है –गुल से लिपटी हुई तितली को उडा कर देखो –आँधियो तुमने दरख़्तो को गिराया होगा –क़ैफ भोपाली का ये शेर मुहब्बत पर जितना सटीक है उतना ही आलोक आपका शेर भी है !!
    ज़ख़्म लेकर ये सभी अपने मैं जाता भी कहाँ
    यूँ भी इजलास गुनाहगार संभाले हुये हैं
    दौरे हाज़िर की तल्ख़ हकीकत .. तारीख पर तारीख मे उम्र गुज़र जाती है .. ये सबसे बडा गुनाह है आदालतों का –आलोक!!! मुझे निजी पाबन्दियों के चलते वक़्त नही मिला –इसलिये कमेण्ट मे विलम्ब हुआ ग़ज़ल पर फिर दाद !! –मयंक

  6. प्रिय मित्र,
    भगवान आपको बहुत लम्बी उम्र दे और इसी तरह हर ग़ज़ल बेहद उन्न्दा कहके संवरती रहे यही मेरी दुआ है ये दरिया जल्द ही सैलाब नज़र आये ।
    और मेरा सबसे दिल के करीब शेर….
    ” एक नोविल हैं कभी पढ़ तू हमें फ़ुर्सत में
    तने-तन्हा कई क़िरदार संभाले हुये हैं।”
    बहुत ख़ूब बहुत कुछ समेट कर रख दिया है तिनके मे…….

  7. बहुत ख़ूब आलोक भाई बहुत ख़ूब! दादा के कमेन्ट को मेरा भी कमेन्ट समझ लीजिये. यूँ ही उम्दा कहते रहिये.

  8. हम मुहब्बत के तले काँप रहे हैं ऐसे
    जैसे दरकी हुई दीवार संभाले हुये हैं

    ज़ख़्म लेकर ये सभी अपने मैं जाता भी कहाँ
    यूँ भी इजलास गुनाहगार संभाले हुये हैं
    आदरणीय आलोक साहब तमाम ग़ज़ल और हर शेर उम्दा हुआ है |ढेरों दाद कबूल फरमावें

  9. बकौ़ल दादा, ‘एक सैलाब है जो सफ़र पर रवाना हो चुका है।’ उस सैलाब को मैंने भी महसूस किया। क्‍या ही उम्‍दा ग़ज़ल हुई है आलोक भाई। हर शे’र उम्‍दा, हर बात बहुत अच्‍छी।

    ये तो कम्‍माल ही हो गया है :

    हम मुहब्बत के तले काँप रहे हैं ऐसे
    जैसे दरकी हुई दीवार संभाले हुये हैं

    ज़ख़्म लेकर ये सभी अपने मैं जाता भी कहाँ
    यूँ भी इजलास गुनाहगार संभाले हुये हैं

    आसमां छूने लगी है मिरी साँसों की सदा
    “आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुये हैं”

    मार देती मुझे कब की मिरे सीने की ख़लिश
    ये तो गज़लें हैं जो हर वार संभाले हुये हैं

    पता नहीं आप मुझसे छोटे हैं या बड़े लेकिन जो भी हैं, दिली दाद, खुश रहें, आबाद रहें।

  10. शानदार ग़ज़ल हुई है आलोक जी। दिली दाद कुबूल कीजिए

  11. jio meri jaan kya hi umda ghazal kahi hai.. waah waah… poori ki poori ghazal umda hai…

  12. आलोक भाई , कुछ फूल से ज़ख़्मों के अंबार में गम की पूंजी संभालता हुआ , दिन रात धड़कनो की रफ़्तार संभालता हुआ , बाज़ार के मेयार की बात करता हुआ ,किसी नाविल सा कई तन्हा तन्हा किरदार संभालता हुआ , मुहब्बत के तले काँपता हुआ ,दरकी हुई दीवार को सहारा देने वाला, ज़ख़्मों को खुद से अलग न करने वाला ,आंसमान तक साँसों की सदायें भेजने वाला, और ग़ज़लों को ढाल करने वाला ये दिलनशीं शायर किसे पसंद नहीं आएगा ?

    खैर आप मुबारकबाद संभालिए, बाकी बातें तो खैर होती रहेंगी 🙂

  13. हम मुहब्बत के तले काँप रहे हैं ऐसे
    जैसे दरकी हुई दीवार संभाले हुये हैं

    ज़ख़्म लेकर ये सभी अपने मैं जाता भी कहाँ
    यूँ भी इजलास गुनाहगार संभाले हुये हैं

    मार देती मुझे कब की मिरे सीने की ख़लिश
    ये तो गज़लें हैं जो हर वार संभाले हुये ह

    …Alok bhai kya badhiya ghazal hui hai…ye ash’aar behad pasand aaye…waahh…daad
    -kanha

  14. आलोक जी
    ये ग़ज़ल गुलदस्ते से कम नहीं हर शेर मुकम्मल

    एक नोविल हैं कभी पढ़ तू हमें फ़ुर्सत में
    तने-तन्हा कई क़िरदार संभाले हुये हैं
    वाह वाह !!!!!

    हम मुहब्बत के तले काँप रहे हैं ऐसे
    जैसे दरकी हुई दीवार संभाले हुये हैं
    शुभानअल्लाह !!!!

    मार देती मुझे कब की मिरे सीने की ख़लिश
    ये तो गज़लें हैं जो हर वार संभाले हुये हैं
    इस शेर पर दिली मुबारकबाद

  15. उम्दा कलाम ………..आलोक जी ….आपको सलाम

  16. YeiN to ghazleiN haiN jo har waar sambhale hue haiN…
    kya kehne Alok bhai.. Behad umda ghazal ke mubarkbaad!!

  17. aalok bahut bahut mubarakbaad dada ke alfaaz ko mera bhi kathan maane..khoob saari duaayen…

  18. जीते रहिये… दिन ब दिन निखरते जा रहे हैं. एक सैलाब है जो अपने सफ़र पर रवाना हो चुका है. ख़यालों का भरपूर अहाता करने वाले बहुत अच्छे शब्दों का चयन, हर तरह से नोक-पलक संवरी हुई ग़ज़ल, आपके बहुत उजले भविष्य की निशानदेही कर रही है. बहुत अच्छी ग़ज़ल वाह वाह

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