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T-20/2 हम वफ़ा-पेशा हैं किरदार संभाले हुए हैं-मोनी गोपाल ‘तपिश’

हम वफ़ा-पेशा हैं किरदार संभाले हुए हैं दौरे-हाज़िर में भी दस्तार सम्हाले हुए हैं इश्क़ में लगते हैं कुछ लोग उड़ानें भरने है सलीक़ा जिन्हें रफ़्तार सम्हाले हुए हैं तोड़ भी दीजिये जज़्बात का रिश्ता दिल से अब ये इक बोझ है बेकार सम्हाले हुए हैं चंद लम्हों की ख़ुशी रंजो-अलम क्या क्या कुछ तेरी ख़ातिर तिरे बीमार सम्हाले हुए हैं कौन सजदे में रहे कौन इबादत समझे आज किसको है ये दरकार सम्हाले हुए हैं नाख़ुदा उनका ख़ुदा हो भी तो आख़िर कैसे ख़ुद ही कश्ती की जो पतवार सम्हाले हुए हैं वार छुप कर करें वो ये भी कोई बात हुई खुल के आ जाएँ जो तलवार सम्हाले हुए हैं तुमने तो छेड़ दिया इल्मो-अदब का मौज़ू हम से पूछो तो हैं लाचार सम्हाले हुए हैं इतना बनिये न ‘तपिश’ कारगहे-हस्ती में आप जैसे कोई दरबार सम्हाले हुए हैं मोनी गोपाल ‘तपिश’ 07503070900

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19 comments on “T-20/2 हम वफ़ा-पेशा हैं किरदार संभाले हुए हैं-मोनी गोपाल ‘तपिश’

  1. हम वफ़ा-पेशा हैं किरदार संभाले हुए हैं
    दौरे-हाज़िर में भी दस्तार सम्हाले हुए हैं
    wah, kya bepanaah matla hai, jawaab nahin
    इश्क़ में लगते हैं कुछ लोग उड़ानें भरने है
    सलीक़ा जिन्हें रफ़्तार सम्हाले हुए हैं, bahot khoob
    तोड़ भी दीजिये जज़्बात का रिश्ता दिल से
    अब ये इक बोझ है बेकार सम्हाले हुए हैं….bahot hi haseen sher hai
    चंद लम्हों की ख़ुशी रंजो-अलम क्या क्या कुछ
    तेरी ख़ातिर तिरे बीमार सम्हाले हुए हैं …..kya kehne, bahot
    ख़ुदा उनका ख़ुदा हो भी तो आख़िर कैसे
    ख़ुद ही कश्ती की जो पतवार सम्हाले हुए हैं…bahot baland sher hai, daad haazir hai, qubool farmaaen

  2. ताबिश साहब, वाह वाह दाद देने को मजबूर करते वाले अश’आर हैं।क़ुबूल फ़रमाइये

  3. umda ghazal par dheroN mubaarakbaad..Tapish sahib

  4. Kya hi achhii gazal huii hai Moni Gopal Tapish Sahab
    mushayre ka shandaar aagaaz
    tamaam gazal hi khoobsoorat hai

    dili daad qubul karen

    regards
    Alok mishra

  5. तोड़ भी दीजिये जज़्बात का रिश्ता दिल से
    अब ये इक बोझ है बेकार सम्हाले हुए हैं

    खूबसरत गज़ल के लिए दाद क़ुबूल करें

  6. उम्दा ग़ज़ल हुई है जनाब! दाद हाज़िर है!

  7. हम वफ़ा-पेशा हैं किरदार संभाले हुए हैं
    दौरे-हाज़िर में भी दस्तार सम्हाले हुए ह

    मोनी गोपाल ‘तपिश’” SAHAB DAURE-HAAZIR ME’N DASTAAR SANBHALE RAKHNA WAQAYI KAMAAL KI BAAT HAI, M U B A A R A K B A A D

  8. आदरणीय तपिश साहब ,तमाम अशहार लासानी हुये हैं |खासकर ये शेर …..वा…..ह
    इश्क़ में लगते हैं कुछ लोग उड़ानें भरने
    है सलीक़ा जिन्हें रफ़्तार सम्हाले हुए हैं

    और
    वार छुप कर करें वो ये भी कोई बात हुई
    खुल के आ जाएँ जो तलवार सम्हाले हुए हैं
    बधाई
    सादर

  9. दिल तक उतरने वाली ग़ज़ल के लिए बहुत धन्‍यवाद तपिश साहब का। वाह.. वाह..। दिली दाद स्‍वीकार करें।
    सादर
    नवनीत शर्मा

  10. अच्छी ग़ज़ल हुई है गोपाल साहब, दाद कुबूल कीजिए

  11. हम वफ़ा-पेशा हैं किरदार संभाले हुए हैं
    दौरे-हाज़िर में भी दस्तार सम्हाले हुए हैं

    तोड़ भी दीजिये जज़्बात का रिश्ता दिल से
    अब ये इक बोझ है बेकार सम्हाले हुए हैं

    नाख़ुदा उनका ख़ुदा हो भी तो आख़िर कैसे
    ख़ुद ही कश्ती की जो पतवार सम्हाले हुए हैं

    Shandaar aagaaz hua hai is Mushaire ka… Tapish sahab… Behad khoobsurat gazal hui hai… Bahut bahut Mubaraqbaad 🙂

  12. naam bhi kahin tabish type hua hai mera naam moni gopal ‘tapish’ hai

  13. ghazal pasand aai main aap sabhi ka bahut shkrguzar hoon type mein kuch ghaltiyan ho gai hain jaise chand lamhe ,alam

  14. ताबिश साहब, किसी भी दरख़्त पे आम तौर पर पहला फल वाजिबी ही आता है मगर आपकी ग़ज़ल ने इस बात को ग़लत साबित कर दिया. बहुत कसी हुई,चुस्त ग़ज़ल. वाह वाह दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  15. ये एक शेर ही नहीं पूरी की पूरी ग़ज़ल बेहतरीन अशआर से सजी हुई है , जिनकी जितनी तारीफ़ की जाय काम है। आप बेहतरीन लिखते हैं मेरी दाद कबूल करें। उम्मीद करता हूँ लफ्ज़ पर आपको और भी पढ़ने का मौका मिलेगा। दुआओं के साथ

    नीरज

  16. इश्क़ में लगते हैं कुछ लोग उड़ानें भरने
    है सलीक़ा जिन्हें रफ़्तार सम्हाले हुए हैं

    क्या बात है भाई। …….. वाह।

  17. तपिश साहब
    इस शानदार आगाज़ के लिए बधाई !!!!!
    पूरी की पूरी ग़ज़ल बेहतरीन है मगर ये शेर ख़ास पसंद आये

    इश्क़ में लगते हैं कुछ लोग उड़ानें भरने
    है सलीक़ा जिन्हें रफ़्तार सम्हाले हुए हैं

    और

    तोड़ भी दीजिये जज़्बात का रिश्ता दिल से
    अब ये इक बोझ है बेकार सम्हाले हुए हैं

    वाह वाह

  18. तरह की शाख पे पहला फूल आया …बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई है तपिश जी….सारे अश’आर बहुत उम्दा हैं….तहे-दिल से दाद क़ुबूल फरमायें
    -कान्हा

  19. “इस ज़मीन पर आजमाइश करने पर हैसलाशिकनी का अहसास होना कोई ताज़्ज़ुब के बात नही –लेकिन अगर मुशाइरे की पहली ही ग़ज़ल इतने दिलकश और बेहतरीन अशार से सजी हुई हो तो किसी का भी अहसासे कमतरी से भर जाना स्वाभाविक ही होगा” –इस बयान से सहमत होना आवश्यक नही लेकिन मेरे तईं ये सच है !!!
    हम वफ़ा-पेशा हैं किरदार संभाले हुए हैं
    दौरे-हाज़िर में भी दस्तार सम्हाले हुए हैं
    मतला खूब कहा है आसानी से कहा है गहराई से कहा है और ऐसा लगता है कि सहरा से क़ैफ सहराई ने कहा है !!! तपिश जी !!!तालियाँ और दाद !!!
    इश्क़ में लगते हैं कुछ लोग उड़ानें भरने
    है सलीक़ा जिन्हें रफ़्तार सम्हाले हुए हैं
    इश्क मे सलीकेमन्द रफ्तार सम्हाल सकते है !! और दीवानो के बारे मे क्या ख्याल है ??!!!!
    तोड़ भी दीजिये जज़्बात का रिश्ता दिल से
    अब ये इक बोझ है बेकार सम्हाले हुए हैं
    मश्वरा अच्छा है लेकिन इस पर अमल मुश्किल है –निशान्देही के लिये एक शेर –
    यादे –उल्फत है अभी आपकी आँखों मे “मयंक”
    आप ज़ंजीर की झंकार सम्हाले हुये हैं

    चाँद लम्हों की ख़ुशी रंजो-आलम क्या क्या कुछ
    तेरी ख़ातिर तिरे बीमार सम्हाले हुए हैं
    कहने की ज़रूरत नही इस इज़हार के लिये –इस रवानी के लिये –इस पुख़्तगी के लिये –ज़ुबन की महारत बहुत ज़रूरी है –हाथ कंगन को आरसी क्या !! क्या खूब शेर कहा है !!!!
    नाख़ुदा उनका ख़ुदा हो भी तो आख़िर कैसे
    ख़ुद ही कश्ती की जो पतवार सम्हाले हुए हैं
    हाँ –खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले
    खुदा बन्दे से खुद पूछ्हे बता तेरी रज़ा क्या है !!!!
    वार छुप कर करें वो ये भी कोई बात हुई
    खुल के आ जाएँ जो तलवार सम्हाले हुए हैं
    इस दौर मे छुप कर वार करना हुनर मे शुमार किया जाता है !! बहर्कैफ ये जो ललकार इस शेर मे है वो रहे सदाक्त के मुसाफिर की है मोमिन की है –वाह !!!
    तुमने तो छेड़ दिया इल्मो-अदब का मौज़ू
    हम से पूछो तो हैं लाचार सम्हाले हुए हैं
    ख्याल का मर्कज़ मुझे खुला नही !!!!
    इतना बनिये न ‘तपिश’ कारगहे-हस्ती में
    आप जैसे कोई दरबार सम्हाले हुए हैं
    बहुत खूब बहुत खूब !! क्या कहने !!! सानी को क्या निभाया है !!
    अब मेरी दुआ यहीं है कि इस मुशाइरे का यही मेयार बना रहे क्योंकि आगाज़ बेहद शानदार हुआ है !! मोनी गोपाल तपिश जी !! इस गज़ल ने अंतस की गहराइयों को अन्दोलित किया है !! मुबारक !! –मयंक

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