6 टिप्पणियाँ

सोचता हूँ जिसे.. वही हो क्या-सौरभ पाण्डेय

सोचता हूँ जिसे.. वही हो क्या
डायरी से निकल गई हो क्या

छू गयी तो लगा मैं साहिल हूँ
साथ बहने चली नदी हो क्या

लग रही है वसुंधरा सुन्दर
आज तुम भी उधर जगी हो क्या

हो गयी फिर.. हरी-भरी तुलसी
क्या कहूँ तुम मुझे मिली हो क्या

खुश मेरे साथ हो बहुत, लेकिन
खिलखिला कर कभी हँसी हो क्या

आँख नम क्यों, कहो.. कसम मेरी
तुम परेशान-सी अभी हो क्या

इस दफ़े वादियाँ उदास लगीं
कौन जाने उन्हें कमी हो क्या

तुम मई हो भरे दिसम्बर में
या, दिसम्बरपगी मई हो क्या

सौरभ पाण्डेय 09919889911

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6 comments on “सोचता हूँ जिसे.. वही हो क्या-सौरभ पाण्डेय

  1. हो गयी फिर.. हरी-भरी तुलसी
    क्या कहूँ तुम मुझे मिली हो क्या

    खुश मेरे साथ हो बहुत, लेकिन
    खिलखिला कर कभी हँसी हो क्या

    kya badhiya matla hai…puri ghazal behad khubsoorat hai Saurabh Ji..Tulsi wala she’r bahut pasand aaya..daad qubule’n
    -kanha

  2. सौरभ पाण्डेय साहब !! मैने आपके दोहे खूब पढे हैं और मै आपका मुरीद हूँ !! गज़ले आपकी कम पढी हैं –लेकिन जितनी भी पढी हैं सभी अश्वस्त करती हैं !! जैसे ये गज़ल !! मतला बेहद दिलकश है !! नया और बाँध लेने वाला !! तुलसी वाला शेर बहुत भाया !! इसी सिलसिले मे अर्ज़ करूँ कि अर्सा पहले मेरे मित्र कमल सिंग साहब ने एक गज़ल कही ठीक जिसके एक दो शेर —
    अकिंचन भैरवी सी पाक औ सादा लिबासों मे
    मेरे संग अंजुरी बाँधे शिवालों मे कही तुम हो
    शबे तारीक है लेकिन मुसल्सल बर्क चमके है
    कि जैसे राहबर बन इन उजालों मे कही तुम हो –कम्ल सिंह
    तुलसी का प्रयोग अभिनव है गज़ल के लिये और इस ग़ज़ल को पढ कर परम्परा की नई रहगुज़र और आलोकमय लघती है !! दिस्म्बर्पगी से प्रयोग का ज़ाविया भी ताबिन्दा रहा है !!! दीगर अश आर भी अच्छे लगे!! इस पोर्टल पर आपकी उपस्थिति सुखमय लगी –मयंक

    • भाई मयंक जी, आपकी हार्दिक विशालता के, और आपके गहन अध्ययन के, कि जिस आत्मीयता से आप टिप्पणियाँ देते हैं, के हम सदा से कायल रहे हैं. कि, आप साहित्यिक व्यवहार जानते हैं. आप साहित्य को साहित्य के तौर पर लेते हैं, किसी हेतु के तौर पर नहीं. आपका यह सच्चा मन बहुत कुछ सिखाता है हमें.. हम जैसों को.. !
      आपको मेरे यह प्रस्तुति स्वीकार्य है तो मैं आश्वस्त हूँ.
      सादर आभार

  3. आदरणीय तुफ़ैल साहब, मैं आपकी सदाशयता से आप्लावित हूँ.

  4. तुम मई हो भरे दिसम्बर में
    या, दिसम्बरपगी मई हो क्या
    आदरणीय सौरभ सा. बहुत ही उम्दा अशहार हुए हैं | वाह…ह क्या कहने दिसम्बर पगी मई ….एकदम ताज़ा |बधाई

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