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सब के सब सिर्फ तेरी बात ही करना चाहें-स्वप्निल तिवारी

दिल, ज़बां, ज़हन मेरे आज संवरना चाहें
सब के सब सिर्फ तेरी बात ही करना चाहें

दाग़ हैं हम तेरे दामन के सो ज़िद्दी भी हैं
हम कोई रंग नहीं हैं के उतरना चाहें

आरज़ू है हमें सहरा की सो हैं भी सैराब
ख़ुश्क हो जाएँ हम इक पल में जो झरना चाहें

ये बदन है तेरा, ये आम सा रस्ता तो नहीं
इसके हर मोड़ पे हम सदियों ठहरना चाहें

ये सहर है तो भला चाहिए किसको ये के हम
शब की दीवार से सर फोड़ के मरना चाहें

जैसे सोये हुए पानी में उतरता है सांप
हम भी चुपचाप तेरे दिल में उतरना चाहें

आम से शख़्स के लगते हैं यूँ तो तेरे पाँव
सारे दरिया ही जिन्हें छू के गुज़रना चाहें

चाहते हैं के कभी ज़िक्र हमारा वो करें
हम भी बहते हुए पानी पे ठहरना चाहें

नाम आया है तिरा जब से गुनहगारो  में
सब गवह अपनी गवाही से मुकरना चाहें

वस्ल औ हिज्र के दरिया में वही उतरें जो
इस तरफ डूब के उस ओर उबरना चाहें
कोई आएगा नहीं टुकड़े हमारे चुनने
हम अपने जिस्म के अन्दर ही बिखरना चाहें
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6 comments on “सब के सब सिर्फ तेरी बात ही करना चाहें-स्वप्निल तिवारी

  1. चाहते हैं के कभी ज़िक्र हमारा वो करें
    हम भी बहते हुए पानी पे ठहरना चाहें

    नाम आया है तिरा जब से गुनहगारो में
    सब गवह अपनी गवाही से मुकरना चाहें
    आ. आतिश भाई सा. मज़ा आ गया ,लाज़वाब अशहार हुये हैं |ढेरों दाद कबूल फरमाएं |वा……..ह

  2. स्वप्निल ये शायद बानी मनचन्दा साहब की ज़मीन है ? अगर है तो इसके शुरू में नज़रे-बानी मनचन्दा लिखिये. अपने बड़ों की ज़मीन में क़दम रखने के ये आदाब हैं. बहुत ही अच्छी ग़ज़ल निकाली. बानी मनचन्दा साहब होते तो आपको गले लगा लेते बहुत साडी दुआएं देते

  3. दिल, ज़बां, ज़हन मेरे आज संवरना चाहें
    सब के सब सिर्फ तेरी बात ही करना चाहें
    उसकी बाते उसकी तमन्ना उसकी याद
    वक़्त कितना कीमती है इन दिनो (??!!)
    स्वप्निल सानी मिसरे पर क्या खूब गिरह लगी है !! वाह !!
    दाग़ हैं हम तेरे दामन के सो ज़िद्दी भी हैं
    हम कोई रंग नहीं हैं के उतरना चाहें
    ज़बी पे चांद की इक दाग़ भी ज़रूरी है
    मेरे बगैर तिरी दास्तां अधूरी है –मयंक
    सिम्बल एक है लेकिन आपके शेर के लहजे मे वो जान है कि क्या बात है वाह !!!
    ये बदन है तेरा, ये आम सा रस्ता तो नहीं
    इसके हर मोड़ पे हम सदियों ठहरना चाहें
    बहुत खूब बहुत खूब !!! इस शेर पर मुसल्ल्सल दाद !!! इसकी व्यख्या नही करनी !! इसका रस लेना है !!
    चाहते हैं के कभी ज़िक्र हमारा वो करें
    हम भी बहते हुए पानी पे ठहरना चाहें
    अस्म्भावना पर टिकी उमीद !!! खूब !!
    नाम आया है तिरा जब से गुनहगारो में
    सब गवह अपनी गवाही से मुकरना चाहें
    क्य कलर है शेर का वाह !!! बहुत खूब बहुत खूब !!!
    वस्ल औ हिज्र के दरिया में वही उतरें जो
    इस तरफ डूब के उस ओर उबरना चाहें
    फल्सफा ऊंचा है जैसे –इस फास्लो के दश्त मे रहबर वही बने // जिसकी निगाह देख अले सदियो के पार भी

    कोई आएगा नहीं टुकड़े हमारे चुनने
    हम अपने जिस्म के अन्दर ही बिखरना चाहें
    अलमीया है और क्या बात है क्या शिल्प है !!!!
    कमाल दर कमाल !! स्वप्निल हर गज़ल और हर शेर रोकता है आपका !! और अपने साथ बहा ले जाता है !! दिल जिगर और जेहन सभी को !! गज़ल पर मुबारकबाद !! –मयंक

  4. Kya kahne swapnil bhaiya
    Waaaahh waaah
    Ak aur khoobsoorarat tohfe k liye dhanyawad

    Is umda gazal k liye dili daad qubul kejiye
    Regards
    Alok

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