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एक ग़ज़ल:- दामे-गर्दिश में उलझा हुआ हूं-‘खुरशीद’ खैराड़ी

दामे-गर्दिश में उलझा हुआ हूं
एक बेबस परिंदा हुआ हूं

ज़िन्दगी दश्त है ख्वाहिशों का
मैं मुसाफ़िर भटकता हुआ हूं

नींद आँखों से ओझल हुई है
एक मुद्दत से जागा हुआ हूं

सुब्ह से शाम तक दौड़ना बस
ऐसा लगता है पहिया हुआ हूं

बोझ सिर पर जहाँ भर का लेकर
पीठ पर ख़ुद की रक्खा हुआ हूं

शोर कितना मचाता था पहले
आज सिस्टम का पुरज़ा हुआ हूं

छूट कर दस्ते-उम्मीद से फिर
टूटकर ज़र्रा ज़र्रा हुआ हूं

सबको पहचानता हूं अज़ीज़ो
ख़ुद से ही नाशनासा हुआ हूं

आँधियों से उलझना भला क्या
शाख से अपनी टूटा हुआ हूं

कौन आयेगा मुझको मनाने
आजकल ख़ुद से रूठा हुआ हूं

यूं तो ‘खुरशीद’ हूं दर हक़ीक़त
तीरगी में तमाशा हुआ हूं

‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर 09413408422

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3 comments on “एक ग़ज़ल:- दामे-गर्दिश में उलझा हुआ हूं-‘खुरशीद’ खैराड़ी

  1. Khursheed sahab acchi ghazal hui hai daad qubul kareN

  2. Khurshid sahab bahot achhii gazal huii hai
    Dili daad kubul keejiye

    REgards
    Alok

  3. दामे-गर्दिश में उलझा हुआ हूं
    एक बेबस परिंदा हुआ हूं
    छूट कर दस्ते-उम्मीद से फिर
    टूटकर ज़र्रा ज़र्रा हुआ हूं
    सबको पहचानता हूं अज़ीज़ो
    ख़ुद से ही नाशनासा हुआ हूं
    आँधियों से उलझना भला क्या
    शाख से अपनी टूटा हुआ हूं
    हमेशा की तरह उम्दा बयान !! इन शेरो पर खास दाद !! –मयंक

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