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वार…कह दूँ कि क्‍या नफ़ासत है -नवनीत शर्मा

वार…कह दूँ कि क्‍या नफ़ासत है
साहबो ! अब यही सियासत है

मैं नहीं मानता मिरा कहना
किसकी मुझपर अभी हुकूमत है

मानता हूं वो धज नहीं लेकिन
मुझमें अब तक तेरी रियासत है

ढूंढ़ता हूं उदासियों में किसे
किसकी अब तक मुझे ज़रूरत है

चांद निकला नकाब ओढ़े हुए
क्‍या अंधेरों के घर में दावत है

बेहिसी दिल में आके बैठ गई
एक आंसू भी अब तो नेमत है

अब गले लग के अपने पूछूंगा
ये जुनूं है कि फिर इबादत है

शे’र कहने चले मियां ‘नवनीत’
शे’र कहना मगर अज़ीयत है

-नवनीत शर्मा

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6 comments on “वार…कह दूँ कि क्‍या नफ़ासत है -नवनीत शर्मा

  1. बेहिसी दिल में आके बैठ गई
    एक आंसू भी अब तो नेमत है

    अब गले लग के अपने पूछूंगा
    ये जुनूं है कि फिर इबादत है
    आ. नवनीत भाईसाहब मक्ता ता मतला दिल को बाँध लेने वाली ग़ज़ल हुई है ,ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  2. मैं नहीं मानता मिरा कहना
    किसकी मुझपर अभी हुकूमत है

    ढूंढ़ता हूं उदासियों में किसे
    किसकी अब तक मुझे ज़रूरत है

    Ahaa..kya she’r hain bhaiya.wahh..umdaa ghazal ke liye daad
    sadar
    -Kanha

  3. poori ghazal umda hai navneet bhai.. daad qubulen….

  4. वार…कह दूँ कि क्‍या नफ़ासत है
    साहबो ! अब यही सियासत है

    मैं नहीं मानता मिरा कहना

    किसकी मुझपर अभी हुकूमत है
    चांद निकला नकाब ओढ़े हुए
    क्‍या अंधेरों के घर में दावत है
    उम्दा ग़ज़ल …. दाद क़ुबूल करें नवनीत जी

  5. मैं नहीं मानता मिरा कहना
    किसकी मुझपर अभी हुकूमत है
    चांद निकला नकाब ओढ़े हुए
    क्या अंधेरों के घर में दावत है
    बेहिसी दिल में आके बैठ गई
    एक आंसू भी अब तो नेमत है
    अब गले लग के अपने पूछूंगा
    ये जुनूं है कि फिर इबादत है
    -नवनीत भाई !!! इन अश आर पर खास दाद !! मैं नहीं मानता मिरा कहना…… ज़ुबान का शेर कहा है और हर लहजे से अच्छा शेर है !!! चांद निकला नकाब ओढ़े हुए… ये भी मंज़र से पसमंज़र तक लम्बी दूरी तय कर गया शेर है !!! बेहिसी दिल में आके बैठ गई////एक आंसू भी अब तो नेमत है !!! वाह क्या बात है !!!
    अब गले लग के अपने पूछूंगा !!! एक शेर ज़हीर कश्मीरी का !!
    अपने गले मे अपनी ही बाँहों को डालिये
    जीने का अब तो एक यही ढंग रह गया
    ग़ज़ल के लिये मुबारकबाद !!! –मयंक

  6. Ak aansuu bhi ab to nemat hai
    Kya kahne Navneet sahab
    Puri gazal hi khuubsoorat h
    Daad kubul keejiye

    Regards
    Alok

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