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रात कल आई मिरे पास, जताया मुझसे-रश्मि शर्मा ‘सबा’

रात कल आई मिरे पास, जताया मुझसे
सुन ! मुकम्मल है तिरे हिज्र का क़िस्सा मुझसे

उसको महसूस कभी होती कमी मेरी भी
मांगता वो भी कभी कोई तो लम्हा मुझसे

तय हुआ जाता है इक सर्द से रिश्ते का सफ़र
लिपटा ही रह्ता है भीगा हुआ कोहरा मुझसे

घर के किरदार ज़माने को नज़र आने लगे
जाने कब हट गया दरवाज़े का पर्दा मुझसे

तर्क हो कर भी तअल्लुक़ से ये उम्मीद रही
रब्त रखता न मगर रब्त जताता मुझसे

अब ज़माने से मुझे उसकी ख़बर मिलती है
वो जो करता था हर एक बात का चर्चा मुझसे

शहर से दूर निकल आयी थी जिसकी ख़ातिर
आज इस दश्त में वो ख़्वाब भी खोया मुझसे

तुमने हर सम्त सजा रक्खी है नक़ली दुनिया
और ये दुनिया नहीं होगी गवारा मुझसे

जबसे मौजों को बना रक्खा है हमराह ‘सबा’
तबसे नाराज़ सा लगता है जज़ीरा मुझसे

रश्मि शर्मा ‘सबा’ 09425776305

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5 comments on “रात कल आई मिरे पास, जताया मुझसे-रश्मि शर्मा ‘सबा’

  1. Bahut hi umdaa ghazal hai Rashmi ji…bahut bahut badhai aur daad..sadar
    -kanha

  2. रात कल आई मिरे पास, जताया मुझसे
    सुन ! मुकम्मल है तिरे हिज्र का क़िस्सा मुझसे
    बडे पाबन्द और वफादार अल्फाज़ हैं –शब , हिज्र , सहरा और तिश्नगी !! रात और हिज्र ने एक अच्छा मंज़र और एक अच्छा शेर फिर दिया !!!
    उसको महसूस कभी होती कमी मेरी भी
    मांगता वो भी कभी कोई तो लम्हा मुझसे
    यह रंग परवीन की शाइरी मे भी खूब मिलता है !!!
    तय हुआ जाता है इक सर्द से रिश्ते का सफ़र
    लिपटा ही रह्ता है भीगा हुआ कोहरा मुझसे
    पिक्चर पोर्ट्रेट है !! रिश्ते मे जज़्बात की ऊष्मा नही है –इसलिये सफर भीगा –भीगा है !! वाह !!
    घर के किरदार ज़माने को नज़र आने लगे
    जाने कब हट गया दरवाज़े का पर्दा मुझसे
    खूब !! दाद !! इस शेर पर !! जबान और लहजा रिश्तो को बेपर्दा कर देते हैं !!!
    तर्क हो कर भी तअल्लुक़ से ये उम्मीद रही
    रब्त रखता न मगर रब्त जताता मुझसे
    तर्क ए तअल्लुक बाद भी नामाबर का इंतज़ार !! रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिये किसी का मुंतज़िर होना !!! ये मुहब्बत का एक रंग है जो उसके मूल रंग से ज़ियादा गहरा और प्रगाढ होता है !!!
    शहर से दूर निकल आयी थी जिसकी ख़ातिर
    आज इस दश्त में वो ख़्वाब भी खोया मुझसे
    रस्ता भी वापसी का कही बन मे खो गया
    ओझल हुई निगाह से हिरनो की डार भी !! –शिकेब
    तुमने हर सम्त सजा रक्खी है नक़ली दुनिया
    और ये दुनिया नहीं होगी गवारा मुझसे
    सच तुम्हारे सब बहुत कडवे थे पर अच्छे लगे
    फाँस बन कर रह गया बस एक अफसाना हमें –परवीन
    जबसे मौजों को बना रक्खा है हमराह ‘सबा’
    तबसे नाराज़ सा लगता है जज़ीरा मुझसे
    अच्छा शेर है !!
    रश्मि ‘सबा’ जी इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिये मुबारकबाद कुबूल कीजिये –मयंक

    • बहुत शुक्रिया मयंक जी …… साधारण सी ग़ज़ल को आप बहुत ख़ास बना देते हैं ……. ।

  3. पूरी की पूरी ग़ज़ल अच्छी है रश्मी जी
    ढेर सारी दाद

    Regards
    Alok mishra

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