10 टिप्पणियाँ

तीन ग़ज़लें- आलोक मिश्रा

1-

बुझती आंखों में तिरे ख़ाब का बोसा रक्खा

रात फिर हमने अंधेरों में उजाला रक्खा

ज़ख्म सीने में तो आँखों में समुंदर ठहरा

दर्द को मैंने, मुझे दर्द ने ज़िन्दा रक्खा

साथ रहता था मगर साथ नहीं था मेरे

उसकी कुरबत ने भी अक्सर मुझे तनहा रक्खा

वक्त के साथ तुझे भूल ही जाता लेकिन

इक हरे ख़त ने मिरे ज़ख्म को ताज़ा रक्खा

मेरा इमां न डिगा पायीं हजारों शक्लें

मेरी आँखों ने तेरे प्यार में रोज़ा रक्खा

क्या क़यामत है कि तेरी ही तरह से मुझसे

जिंदगी ने भी बहुत दूर का रिश्ता रक्खा

2-

ज़ज्ब कुछ तितलियों के पर में है

कैसी खुशबू सी इस कलर में है

आने वाला है कोई सहरा क्या

गर्द ही गर्द रहगुज़र में है

जब से देखा है ख़ाब में उसको

दिल मुसलसल किसी सफ़र में है

छू के गाडी बगल से क्या गुजरी

बेख़याली सी इक नज़र में है

मैं भी बिखरा हुआ हूँ अपनों में

वो भी तनहा सा अपने घर में है

रात तुम याद भी नहीं आये

फिर उदासी सी क्यूँ सहर में है

उसकी ख़ामोशी गूंजती होगी

शोर बरपा जो दिल खंडर में है

हाथ सर पर वो शाखें रखती हैं

कोई अपना सा इस शजर में है

3-

जाने किस बात से दुखा है बहुत

दिल कई रोज़ से ख़फा है बहुत

सब सितारे दिलासा देते हैं

चाँद,रातों को चीखता है बहुत

फिर वही रात मुझमे ठहरी है

फिर समा’अत में शोर सा है बहुत

तुम ज़माने की बात करते हो?

मेरा मुझसे भी फासला है बहुत

इसकी दुखती नसें न फट जाएँ

दिल मुसलसल ये सोचता है बहुत

वास्ता कुछ ज़ुरूर है तुमसे

तुमको वो शख्स पूछता है बहुत

तुमसे बिछड़ा तो टूट जायेगा

उसकी आँखों में हौसला है बहुत

चख़ के देखो इसे कभी तुम भी

इस उदासी में ज़ायका है बहुत

इनकी साँसें गिनी चुनी हैं बस

खून लम्हों का बह गया है बहुत

दश्त को कर लिया था घर मैंने

अब मुझे घर ये काटता है बहुत

इससे बाहर निकल न पाओगे

दश्त माज़ी का ये घना है बहुत

मेरा सुख दुःख समझती हैं ग़ज़लें

ज़िन्दगी को ये आसरा है बहुत

आलोक मिश्रा09711744221

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About irshadkhansikandar

मैं मूलतः शायर हूँ . हाँ रोज़ी-रोटी के लिए फिल्म,धारावाहिक,म्युज़िक एल्बम में गीत लिखता हूँ

10 comments on “तीन ग़ज़लें- आलोक मिश्रा

  1. ज़ख्म सीने में तो आँखों में समुंदर ठहरा
    दर्द को मैंने, मुझे दर्द ने ज़िन्दा रक्खा

    वक्त के साथ तुझे भूल ही जाता लेकिन
    इक हरे ख़त ने मिरे ज़ख्म को ताज़ा रक्खा

    मेरा इमां न डिगा पायीं हजारों शक्लें
    मेरी आँखों ने तेरे प्यार में रोज़ा रक्खा

    आने वाला है कोई सहरा क्या
    गर्द ही गर्द रहगुज़र में है

    जब से देखा है ख़ाब में उसको
    दिल मुसलसल किसी सफ़र में है\

    waahhh wahhh aur wahh..kya badhiya ghazale’n hain bhai…
    तुमसे बिछड़ा तो टूट जायेगा
    उसकी आँखों में हौसला है बहुत…ye she’r hume’n de dijiye .. 🙂

    -Kanha

  2. तीनों ग़ज़लें बेहद उम्दा आलोक जी दाद कुबूल करें …।

  3. Alok teenoN ghazaleN behad umda haiN mere bhai… waah waah

  4. ज़ख्म सीने में तो आँखों में समुंदर ठहरा

    दर्द को मैंने, मुझे दर्द ने ज़िन्दा रक्खा

    साथ रहता था मगर साथ नहीं था मेरे

    उसकी कुरबत ने भी अक्सर मुझे तनहा रक्खा

    वक्त के साथ तुझे भूल ही जाता लेकिन

    इक हरे ख़त ने मिरे ज़ख्म को ताज़ा रक्खा
    इससे बाहर निकल न पाओगे

    दश्त माज़ी का ये घना है बहुत

    मेरा सुख दुःख समझती हैं ग़ज़लें

    ज़िन्दगी को ये आसरा है बहुत
    आलोक सा. बहुत खुबसूरत ग़ज़ले हैं |वा,,,,,,,ह

  5. मेरा इमां न डिगा पायीं हजारों शक्लें
    मेरी आँखों ने तेरे प्यार में रोज़ा रक्खा

    आने वाला है कोई सहरा क्या
    गर्द ही गर्द रहगुज़र में है

    तुम ज़माने की बात करते हो?
    मेरा मुझसे भी फासला है बहुत
    आलोक भाई !! कई अशआर बार बार ठहर जाने पर आमादा कर रहे है !! ग़ज़लो पर दाद !! ऊपर उल्लिखित शेरों की सादगी और गहराई पर विशेष दाद !! –मयंक

  6. Alok bhai teeno ghazleiN khoob kahi haiN aapne… Dili daad kubool kareiN!!!

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