18 टिप्पणियाँ

वो ख़ुश्बू बदन थी-स्वप्निल तिवारी

वो ख़ुश्बू बदन थी
मगर ख़ुद में सिमटी सी इक उम्र तक यूँ ही बैठी रही
बस इक लम्स की मुन्तज़िर
उसे एक शब ज्यों ही मैंने छुआ, उससे तितली उड़ी,
फिर इक और इक और तितली उडी, देर तक तितलियाँ यूँ ही उडती रहीं
छंटी तितलियाँ जब कहीं भी न थी वो
तभी से तअक़्क़ुब में हूँ तितलियों के
इकठ्ठा किये जा रहा हूँ इन्हें मैं
के इक रोज़ इनसे दुबारा मैं तख़्लीक़ उसको करूँगा
जो ख़ुश्बू बदन थी
वो ख़ुश्बू बदन थी….
-स्वप्निल तिवारी
08879464730

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18 comments on “वो ख़ुश्बू बदन थी-स्वप्निल तिवारी

  1. छंटी तितलियाँ जब कहीं भी न थी वो
    तभी से तअक़्क़ुब में हूँ तितलियों के
    इकठ्ठा किये जा रहा हूँ इन्हें मैं
    के इक रोज़ इनसे दुबारा मैं तख़्लीक़ उसको करूँगा…wahhhh… Dada zindabaad..
    sadar pranam
    -Kanha

  2. BaDhiya nazm h swapnil. TitliyoN k t’aqqub ko achchha nazm kiyaa hai. Daad haazir hai.

  3. क्या बढ़िया नज़्म है…. तितली के पैरों की मानिंद रंग बिखेरती हुयी !!!!

  4. स्वप्निल, हर ग़ज़ल के साथ आप पढ़नेवालों को हैरान कर रहे हैं। हम ख़ुशनसीब हैं कि अपने वक़्त के एक कमाल के शायर को ऐसे उभरते हुए देख रहे हैं हम।

  5. वाह, क्या बात है !
    बहुत खूब स्वप्निल भाई !

  6. Its just amazing swpnil bhaiya
    Superb

    Regards
    Alok

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