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ग़ज़लें – नवीन

ग़नीमत से गुजारा कर रहा हूँ
मगर चर्चा है जलसा कर रहा हूँ

ज़माने तुझसे तौबा कर रहा हूँ
बदन का रंग नीला कर रहा हूँ

ठहरना तक नहीं सीखा अभी तक
अजल से वक़्त जाया कर रहा हूँ

तसल्ली आज भी है फ़ासलों पर
सराबों का ही पीछा कर रहा हूँ

मेरा साया मेरे बस में नहीं है
मगर दुनिया पे दावा कर रहा हूँ

 

अपनी हद पर ही कमोबेश क़दम रखते हैं
हम समन्दर हैं किनारों का भरम रखते है

जाने किस तर्ह ज़माने में लगा देते हैं आग
वो जो सीने में जलन कम से भी कम रखते हैं

क्या कहा जिस को भी चाहेंगे उठा देंगे आप
आओ इस बार तराजू पे कलम रखते हैं

ये भी सुन्दर है, सितमगर है, सलासिल, सरगुम
अब से दुनिया का भी इक नाम सनम रखते हैं

सिर्फ़ औज़ार के जैसा ही समझते हैं उसे
जिस हथेली पे नज़रबाज़ रक़म रखते हैं

तुम ही कहते थे ग़ज़ल ज़ख्मों को भर देगी ‘नवीन’
तुम भी जिद छोड़ दो और हम भी कलम रखते हैं

 

सुख चमेली की लड़ी हो जैसे
ग़म कोई सोनजुही हो जैसे

हमने हर पीर समझनी थी यूँ
गर्द, शबनम को मिली हो जैसे

ज़िंदगी इस के सिवा है भी क्या
धूप, सायों से दबी हो जैसे

आस है या कि सफ़र की तालिब
नाव, साहिल पे खड़ी हो जैसे

सब का कहना है जहाँ और भी हैं
ये जहाँ बालकनी हो जैसे

क्या तसल्ली भरी नींद आई है
“फिर कोई आस बँधी हो जैसे”

हर मुसीबत में उसे याद करूँ
“आशना एक वही हो जैसे”

 

बदल बदल के भी दुनिया को हम बदलते क्या
गढ़े हुये थे जो मुर्दे वो उठ के चलते क्या

डगर दिखाने गये थे नगर जला आये
हवस के शोले दियों की तरह से जलते क्या

तरक़्क़ियों के तमाशों ने मार डाला हमें
अनाज़ उगता नहीं ख़ाक ही निगलते क्या

हलाल हो के भी हमसे रवाज़ छूटे नहीं
झुलस चुके हुये जिस्मों से बाल उचलते क्या

हरिक सवाल ज़रूरी हरिक ज़वाब अहम
“हम आ चुके थे क़रीब इतने बच निकलते क्या”

 

सब की सुनता हूँ बस अपनी ही सदा काटूँ हूँ
तुझको हमराज़ बनाने की सज़ा काटूँ हूँ

दर्द ने ही तो दिये हैं मुझे तुम जैसे हबीब
और आमद के लिए ग़म का सिरा काटूँ हूँ

है ख़लिश इतनी कि बस उड़ के पहुँच jaaoonवहाँ
बस इसी धुन में शबरोज़ हवा काटूँ हूँ

ये ज़मीं तेरी है ये मेरी ये उन लोगों की
ऐसा लगता है कि जैसे मैं ख़ला काटूँ हूँ

एक भी ज़ख्म छुपाया न गया तुम से ‘नवीन’
हार कर अपने कलेज़े की रिदा काटूँ हूँ

 

ग़म की अगवानी में कालीन बिछाया ही नहीं
हम ने दर्दों को दिलो-जाँ से लगाया ही नहीं

रूह ने ज़िस्म की आँखों से तलाशा जो कुछ
सिर्फ़ आँखों में रहा दिल में समाया ही नहीं

लडखडाहट पे हमारी कोई तनक़ीद न कर
बोझ को ढोया भी है सिर्फ़ उठाया ही नहीं

अपनी कोशिश रही लमहों को युगों तक ले जाएँ
रेत पे हमने लक़ीरों को बनाया ही नहीं

एक बरसात में ढह जाने थे बालू के पहाड़
बादलो तुम ने मगर ज़ोर लगाया ही नहीं

 

सीधी-सच्ची फिर भी अच्छी लगने वाली बात करें
मृगनैनी की चंचल अँखियाँ आईनों को मात करें

प्यार-मुहब्बत में इतना शक़ अच्छी बात नहीं है यार
इस से बहतर मेरे दिल पर ख़ुद ही को तैनात करें

हम उस वक़्त के लमहे हैं जब ये सिखलाया जाता था
कभी-कभी बच्चे बन कर बच्चों की तहक़ीक़ात करें

इश्क़ नहीं मापा जाता है थर्मामीटर से साहब
या तो अपने होठों से या आँखों से बरसात करें

इकतरफ़ा ब्यौहार मुहब्बत को ठंडा कर देता है
बहुत हुआ आयात, कभी ख़ुद भी तो कुछ निर्यात करें

 

सनसनीखेज़ हुआ चाहती है
तिश्नगी तेज़ हुआ चाहती है

हैरत-अंगेज़ हुआ चाहती है
आह – ज़रखेज़ हुआ चाहती है

अपनी थोड़ी सी धनक दे भी दे
रात रँगरेज़ हुआ चाहती है

आबजू देख तेरे होते हुये
आग – आमेज़ हुआ चाहती है

बस पियाला ही तलबगार नहीं
मय भी लबरेज़ हुआ चाहती है

रौशनी तुझ से भला क्या परहेज़
तू ही परहेज़ हुआ चाहती है

हम फ़क़ीरी के ‘इशक’ में पागल
जीस्त – पर्वेज़ हुआ चाहती है

 

जल को ज़मीं, ज़मीन को सरगर्मियाँ मिलीं
तब जा के इस दयार को ख़ुशफ़हमियाँ मिलीं

सूरज ने चन्द्रमा को उजालों से भर दिया
हासिल ये है कि रात को परछाइयाँ मिलीं

अब्रों ने ज़र्रे-ज़र्रे को पानी से धो दिया
बाद उस के आसमान को बीनाइयाँ मिलीं

दैरो-हरम हों या कि बयाबाँ, हरिक जगह
शेखी बघारती हुई अय्याशियाँ मिलीं

उड़ते हुये परिन्द – हमारी ‘व्यथा’ न पूछ
दरकार शाहराह थी – पगडण्डियाँ मिलीं

क़िस्मत को ये मिला तो मशक़्क़त को वो मिला
इस को मिला ख़ज़ाना उसे चाभियाँ मिलीं

जब-जब किया है वक़्त से हमने मुक़ाबला
उस को बुलन्दियाँ हमें गहराइयाँ मिलीं

रहमत का राग अपनी जगह ठीक है मगर
जिसने बढाया हाथ उसे रोटियाँ मिलीं

कितने ही नौज़वान ज़मींदोज़ हो गये
वो तन है ख़ुशनसीब जिसे झुर्रियाँ मिलीं

हमने दिलेफ़क़ीर टटोला तो क्या बताएँ
ख़ामोशियों से तंग परेशानियाँ मिलीं

तुम को बता रहा हूँ किसी को बताना मत
ख़ुद को किया ख़राब तभी मस्तियाँ मिलीं

सौ-फ़ीसदी मिठास किसी में नहीं ‘नवीन’
जितनी ज़बाँ हैं सब में कई गालियाँ मिलीं

 

हवा के ज़ोर पे ज़ोर अपना आज़मा कर देख
न उड़ सके तो कम-अज़-कम पतंग उड़ा कर देख

वो कोई चाँद नहीं है जो दूर से दिख जाय
वो एक फ़िक्र है, उस को अमल में ला कर देख

इबादतों के तरफ़दार बच के चलते हैं
किसी फ़क़ीर की राहों में गुल बिछा कर देख

फिर इस जहान की मिट्टी पलीद कर देना
पर उस से पहले नई बस्तियाँ बसा कर देख

ये आदमी है, रिवाजों में घुल के रहता है
न हो यक़ीं तो समन्दर से बूँद उठा कर देख

वो इक ज़मीन जो बंजर पड़ी है मुद्दत से
“वहाँ ख़ज़ाना गढ़ा है” – ख़बर उड़ा कर देख

लिबास ज़िस्म की फ़ितरत बदल नहीं सकता
नहीं तो बजते नगाड़ों के पास जा कर देख

मुहब्बतों की फ़ज़ीहत ठठा के हँसती है
किसी यतीम के सीने पे सर टिका कर देख

सिवा-ए-स्वाद मशक़्क़त के फ़ायदे भी हैं
न हो यक़ीन अगर तो गरी चबा कर देख

तनाव सर पे चढ़ा हो तो बचपने में उतर
ख़ुद अपने हाथों से पानी को छपछपा कर देख

 

 

मुझे पहले यूँ लगता था करिश्मा चाहिये मुझको
मगर अब जा के समझा हूँ क़रीना चाहिये मुझको
करिश्मा – चमत्कार, क़रीना – तमीज़, शिष्टता

तो क्या मैं इतना पापी हूँ कि इक लाड़ो नहीं बख़्शी
बहू के रूप में ही दे – तनूजा चाहिये मुझ को
तनूजा – बेटी

हिमालय का गुलाबी जिस्म इन हाथों से छूना है
कहो सूरज से उग भी जाय, अनुष्का चाहिये मुझको
अनुष्का – रौशनी, सूरज की पहली किरण

करोड़ों की ये आबादी कहीं प्यासी न मर जाये
हरिक लाख आदमी पर इक बिपाशा चाहिये मुझको
बिपाशा – नदी

नहीं हरगिज़ अँधेरों की हिमायत कर रहा हूँ मैं
नई इक भोर की ख़ातिर शबाना चाहिये मुझको
शबाना – रात

 

मैं दिल की स्लेट पे जो ग़म तमाम लिख देता
कोई न कोई वहीं इन्तक़ाम लिख देता

ख़मोशियों को इशारों से भी रहा परहेज़
वगरना कैसे कोई शब को शाम लिख देता

मेरे मकान की सूरत बिगाड़ने वाले
तू इस मकान पे अपना ही नाम लिख देता

वहाँ पहुँच के भी उस की तलाश थी कुछ और
फ़क़ीर कैसे खँडर को मक़ाम लिख देता

मेरे भी आगे कई पगड़ियाँ फिसल पड़तीं
जो अपने नाम के आगे इमाम लिख देता

बहार आती है मुझ तक, मगर बुलाने पर
तो फिर मैं कैसे उसे फ़ैज़-ए-आम लिख देता

 

हरकत न हो तो आब-ओ-हवा भी न टिक सके
आमद बग़ैर माल-ओ-मता भी न टिक सके

रंजिश कि प्यार कुछ तो है रेत और लह्र में
साहिल पे मेरे पाँव ज़रा भी न टिक सके

हद में रहे बशर तो मिलें सौ नियामतें
हद भूल जाये फिर तो अना भी न टिक सके

पानी बग़ैर टिक न सकेगी धरा, मगर
पानी ही पानी हो तो धरा भी न टिक सके

सच में ये आदमी जो निभाये मुहब्बतें
टकसाल छोड़िये जी टका भी न टिक सके

बदहाल आदमी को डरायेगी मौत क्या
नंगा हो सामने तो बला भी न टिक सके

 

मेरी पहिचान – अनासिर मेरे
मुझ को ढ़ोते हैं मुसाफ़िर मेरे

इस क़दर बरसे हैं मुझ पर इल्ज़ाम
पानी-पानी हैं मनाज़िर मेरे

अस्ल में सब के दिलों में है कसक
ख़ुद मकीं हों कि मुहाजिर मेरे

अब कहीं जा के मिला दिल को सुकून
मुझ से आगे हैं मुतअख्खिर मेरे

 

कारण झगड़े का बनी, बस इतनी सी बात
हमने माँगी थी मदद, उसने दी ख़ैरात

किया चाँद ने वो ग़ज़ब, पल भर मुझे निहार
दिल दरिया को दे गया, लहरों की सौगात

कहाँ सभी के सामने, कली बने है फूल
तनहाई में बोलना, उस से दिल की बात

सर पर साया चाहिये ? मेरा कहना मान
हंसा को कागा बता, और धूप को रात

आँखों को तकलीफ़ दे, डाल अक़्ल पर ज़ोर
हरदम ही क्या पूछना, मौसम के हालात

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

+91 99 670 24 593

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About Navin C. Chaturvedi

www.saahityam.org 09967024593 navincchaturvedi@gmail.com http://vensys.in

7 comments on “ग़ज़लें – नवीन

  1. Kya kehne dada..ek se badhkar ek ghazale’n..maza aa gya..daad qubule’n..sadar
    -kanha

  2. इन ग़ज़लो की जदीदियत इनका विशेष पक्ष है –नये सिम्बल इस्तेमाल करना साहस का काम है क्योंकि हमें उनका मुकद्दर मालूम नही होता !! लेकिन नवीन भाई मे एक सतत और अखण्ड रचनाधर्मी हमेशा सक्रिय रहता है!! शिकेब जलाली, बानी मनचनदा,ज़ेब गौरी और ज़फर इकबाल रिवायत से बगावत की डगर पर चले और एक समय वो आया जब वक़्त ने इनके सामने हथियार डाल दिये!! देवनागरी से ज़हीर कुरेशी और सूर्यभानु गुप्त जैसे नाम है जिन्होने खुद को किसी न किसी सीमा तक स्वीकार्य करवाया है !! ये प्रवृत्ति काबिले तारीफ है और इस साहस और प्र्यास के लिये नवीन को बार बार बधाई !! कुछ शेर बहर सूरत बेहतरीन कहे हैं – बधाई !!!

    ठहरना तक नहीं सीखा अभी तक
    अजल से वक़्त जाया कर रहा हूँ

    मेरा साया मेरे बस में नहीं है
    मगर दुनिया पे दावा कर रहा हूँ

    अपनी हद पर ही कमोबेश क़दम रखते हैं
    हम समन्दर हैं किनारों का भरम रखते है

    ज़िंदगी इस के सिवा है भी क्या
    धूप, सायों से दबी हो जैसे

    बदल बदल के भी दुनिया को हम बदलते क्या
    गढ़े हुये थे जो मुर्दे वो उठ के चलते क्या

    लडखडाहट पे हमारी कोई तनक़ीद न कर
    बोझ को ढोया भी है सिर्फ़ उठाया ही नहीं

    जब-जब किया है वक़्त से हमने मुक़ाबला
    उस को बुलन्दियाँ हमें गहराइयाँ मिलीं

    फिर इस जहान की मिट्टी पलीद कर देना
    पर उस से पहले नई बस्तियाँ बसा कर देख

    तनाव सर पे चढ़ा हो तो बचपने में उतर
    ख़ुद अपने हाथों से पानी को छपछपा कर देख

    मेरे भी आगे कई पगड़ियाँ फिसल पड़तीं
    जो अपने नाम के आगे इमाम लिख देता

    इस क़दर बरसे हैं मुझ पर इल्ज़ाम
    पानी-पानी हैं मनाज़िर मेरे

    कारण झगड़े का बनी, बस इतनी सी बात
    हमने माँगी थी मदद, उसने दी ख़ैरात

    कहाँ सभी के सामने, कली बने है फूल
    तनहाई में बोलना, उस से दिल की बात

  3. Kya kahne dada
    Tamam ash-aar umda aur maze k hain
    Waahh waahh

    Regards
    Alok

  4. अचानक सैलाब सा आ गया आपकी जानिब से ! उम्दा कलाम है साहब।

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