10 टिप्पणियाँ

एक हज़ल (मुनव्वर राना साहब से मा’ज़रत के साथ )-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’

भले हम आज घर पर ही तमन्चा छोड़ आये हैं
मगर तुम क्या समझते हो कि पन्जा छोड़ आये हैं
कभी मुमकिन है उससे ही वफ़ा का पाठ तू पढ़ ले
तिरी दहलीज़ पर हम अपना कुत्ता छोड़ आये हैं
रसोई गैस की सर पर पड़ी हर मार जायज़ है
अँगीठी तुमने छोड़ी हम भी चूल्हा छोड़ आये हैं
मुहल्ले भर का दुःख अक्सर वो नन्ही जान हरती थी
जिसे कहते थे सब चालू वो चिड़िया छोड़ आये हैं
तबस्सुम सर झुकाये थी ग़मों का बोलबाला था
हम उस महफ़िल में जाकर इक लतीफ़ा छोड़ आये हैं
अजब चीख़ें ग़ज़ब भगदड़ सबब पूछा जवाब आया
कोई साहब ज़नानाघर में चूहा छोड़ आये हैं
बुढ़ौती में जनाबे शैख़ आँखें सेंकने पहुँचे
वहाँ जाकर ख़याल आया कि चश्मा छोड़ आये हैं
सताया उसने हमको यूँ कि आख़िर तंग आकर हम
कल उसके घर में इक उल्लू का पट्ठा छोड़ आये हैं
हमें आकर सिखाते हैं मुहब्बत कैसे की जाये
किसी तालाब के बदले जो गंगा छोड़ आये हैं
मिले घर पर कहाँ से जब मियाँ कल रात बीवी का
बरेलीवाली के कानों में झुमका छोड़ आये हैं
हमारे वस्ल की तो पोल अब खुलनी ही खुलनी है
अमा तकिया उठा लाए बिछौना छोड़ आये हैं
बड़े अब्बा की इस दीवानगी का क्या किया जाय
उन्हें दुःख है कि वो छम्मो का कोठा छोड़ आये हैं
हमारे वस्ल की राहों में तेरी अम्मी रोड़ा थीं
सो तेरी अम्मी के पीछे हम अब्बा छोड़ आये हैं
बिचारे जानवर कितने डरे सहमे हुए होंगे
बुआ को आज चिड़िया घर में फूफा छोड़ आये हैं
कटोरा ही थमाएंगे बुढ़ापे में उन्हें बच्चे
जो बूढ़ी माँ के हाथों में कटोरा छोड़ आये हैं
बिहार अपना जो छूटा ख़ैर छूटा अस्ल दुःख ये है
कि गमछा लिट्टी-चोखा धोती कुरता छोड़ आये हैं
कहाँ ले आई हमको खींचकर अंगूर की बेटी
तिरे पटियाले के बदले भटिंडा छोड़ आये हैं
अभी तक बद्दुआएँ दे रही है बाबरी मस्जिद
उन्हें,जो उसके आँगन में बखेड़ा छोड़ आये हैं
इसी उम्मीद में गोरा कोई उनको भगा ले जाय
वो शौहर गाँव का काला कलूटा छोड़ आये हैं
वही जो गाड़ते रहते थे अक्सर बीच राहों में
बहुत पीछे वो अपना ज़िद्दी खूँटा छोड़ आये हैं
वो उनका चुपके चुपके आँसुओं में गुफ़्तगू करना
कहीं ग़ुंडों में लगता है कि रज़िया छोड़ आये हैं
पुलिस की रेड पर भागे न उस दम ये ख़याल आया
उन्हें होटल में हम रोता बिलखता छोड़ आये हैं
अमा औक़ात धेले की नहीं जिसकी वो कहता है
कि हम चालीस बीघे में पुदीना छोड़ आये हैं
अभी तक याद आता है हमें उसका महकता जिस्म
कुटाई के सबब कल शब जो लौंडा छोड़ आये हैं
अजी डर भी है कोई चीज़,जब लोगों ने धर कूटा
तो हम वो घर ही क्या सारा मुहल्ला छोड़ आये हैं
बड़ी इज़्ज़त थी बस्ती में न रास आई मगर उनको
वो इक राधा के चक्कर में कन्हैया छोड़ आये हैं
जिसे लेकर सवेरे जंगलों की सिम्त जाते थे
कहीं माज़ी के पनघट पर वो लोटा छोड़ आये हैं
सुना तुमने हमें अब इश्क़ उनसे सीखना होगा
किसी रूना के चक्कर में जो लैला छोड़ आये हैं
भुलक्कड़ तो बहुत देखे मगर ऐसे नहीं देखे
मियाँ युसुफ़ कहीं अपनी जुलेख़ा छोड़ आये हैं
हमें जूता चुराने की तमन्ना ले गयी मस्जिद
हुआ कुछ यूँ कि हम अपना ही जूता छोड़ आये हैं
चलाना ही पड़ेगा आज अपना काम हाथों से
कि हम पाजामा लाये और नाड़ा छोड़ आये हैं
जो तोड़ी एक ककड़ी तो चले आये चचा घर तक
सो उनके खेत में कल शाम भैंसा छोड़ आये हैं
कहा हमने कि छोड़ आये बहुत पीछे हम अय्याशी
हमारे दोस्त ग़ुर्राये कि ‘घन्टा’ छोड़ आये हैं
हम आये जबसे दफ़्तर से गले में जान अटकी है
वहीं टेबल पे रिश्वत का लिफ़ाफ़ा छोड़ आये हैं
कटाई नाक घर भर की उड़ाया माल गल्ले का
तिरी चाहत में हम पुश्तैनी धन्धा छोड़ आये हैं
हमारे प्यार को ठुकराने की हिम्मत जो की उसने
तो हम उसकी सहेली पर पटाखा छोड़ आये हैं
किसी के गाल थोड़ी हैं अजी साबुत सुपारी है
करें अब दांत भी क्या जब सरौता छोड़ आये हैं
तुले रहते हैं सबकी माँ बहन करने पे जो अक्सर
हम उनकी माँद में कल एक डंडा छोड़ आये हैं
कमर लचके वहां तो सारी दुनिया हिलने लगती थी
वो आरा छोड़ आये हैं वो बलिया छोड़ आये हैं
वो इक दिन ऐतिहासिक लाल क़िल्अे से जो हम गुज़रे
तो अपना दिल तिरंगे ही में लटका छोड़ आये हैं
हुई गड़बड़ गिरा बर्तन जगा घर का कोई खूसट
सो मुर्ग़ी लेके भागे और अंडा छोड़ आये हैं
जो हैं सबसे बड़े लुकमान उनका वाक़ेआ सुनिए
मरीज़े-इश्क़ को देकर चिरैता छोड़ आये हैं
न बचते हम भी क़ाबिल मुंह दिखाने के अगर रुकते
सो मजबूरन तिरी इज़्ज़त को लुटता छोड़ आये हैं
ज़माना आज तक जिसकी मिसालें देता रहता है
इक ऐसा चोर की दाढ़ी में तिनका छोड़ आये हैं
जो मरता है तो मर बुड्ढे लगें सब काम पर अपने
तिरे चक्कर में हम भी तो सिनेमा छोड़ आये हैं
तिरी बस्ती के लोगों ने जलाया जी कहा बन्दर
सो हम बन्दर के हाथों में तमंचा छोड़ आये हैं
बुझा दुल्हन का चेहरा तो मियां दूल्हे का मुंह लटका
कहाँ लटकों का वो दिलकश नज़ारा छोड़ आये हैं
हमारे ‘सेन्स ऑफ़ ह्युमर’ की दुनिया यूँ दिवानी है
कि हम मय्यत में भी अक्सर ठहाका छोड़ आये हैं
हमारी क़ाफ़िया पैमाई को आसान मत जानो
इसी से ग़म के चेहरे पर पसीना छोड़ आये हैं
बचा लेना हमें लोगो मुनव्वर राना साहब से
हम उनके अस्तबल में अपना घोड़ा छोड़ आये हैं
पड़ी थी बहती गंगा में हमें भी हाथ धोने की
‘सिकंदर’ क्या बताएँ क्या सुलगता छोड़ आये हैं

इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’-09818354784

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About irshadkhansikandar

मैं मूलतः शायर हूँ . हाँ रोज़ी-रोटी के लिए फिल्म,धारावाहिक,म्युज़िक एल्बम में गीत लिखता हूँ

10 comments on “एक हज़ल (मुनव्वर राना साहब से मा’ज़रत के साथ )-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’

  1. इरशाद साहब,देर से पढ़ी मगर पढ़कर मज़ा आगया। वाह।

  2. speechless dada…bahut bahut badhai aur daad..kamal ki hazal hai..sadar pranam
    -Kanha

  3. MauN is hazal ko khud aap se zabaanee sun chukaa huN. Haalaat ko mauqe m tabdeel karte huye aap ne bahut kuchh kah diyaa hai. Baar-baar paDhne laayak gazal.

  4. हज़ल ही नही एक दस्तावेज़ भी है –जिसमे अपने जवाल पर आमादा युगप्रवृत्तियों पर सटीक व्यंग्य किया गया है –इस तवील हज़ल मे हास्य भी भरपूर है –इरशाद भाई की स्रजनशीलता और मेधा शक्ति के हम सभी काइल भी हैं और मुरीद भी –इस सितारे के आफताब बनने मे देर नही और अदब की बस्तियों मे उनकी शिनाख़्त हो रही है – इन अशार पर मुसल्ल्सल दाद !! –मयंक
    कभी मुमकिन है उससे ही वफ़ा का पाठ तू पढ़ ले
    तिरी दहलीज़ पर हम अपना कुत्ता छोड़ आये हैं
    हमें आकर सिखाते हैं मुहब्बत कैसे की जाये
    किसी तालाब के बदले जो गंगा छोड़ आये हैं
    कटोरा ही थमाएंगे बुढ़ापे में उन्हें बच्चे
    जो बूढ़ी माँ के हाथों में कटोरा छोड़ आये हैं
    अमा औक़ात धेले की नहीं जिसकी वो कहता है
    कि हम चालीस बीघे में पुदीना छोड़ आये हैं

  5. Kya kahne dada
    Maza aa gya padhkar

    Khuub lutf aaya

    Regards
    Alok

  6. बचा लेना हमें लोगो मुनव्वर राना साहब से
    हम उनके अस्तबल में अपना घोड़ा छोड़ आये हैं
    ……. काम तो वाकई बड़े मज़े का है

  7. waah sir ji kamaal ki hazal hui hai mazaa aa gayaa……………..

  8. Irshaad bhai mazedar hazal hui hai… munwwar rana sahab ke astbal men jo ghoda aapne chhoda hai.. usne khuub udham machayabhai…khub lutf aaya.. daad hazir hai.

  9. Irshad bhai achchi hazal ki zarooorat shayari ko bhi hai aur aam insaan ko bhi jise aap in dino poora kar rahe hain.. Mubarkbaad!!

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