27 टिप्पणियाँ

T-19/31 चाँद ख़ामोश, मुख़ातिब है सितारा मुझसे-इरशाद खान ‘सिकंदर’

चाँद ख़ामोश, मुख़ातिब है सितारा मुझसे
ये रवैया है बहरहाल तुम्हारा मुझसे

अब तो कह सकता हूँ गर इश्क़ ने पूछा मुझसे
मैंने वो कर दिया जो उसने कहा था मुझसे

बोझ कांधों पे अगर हो तो उठा लूँ मैं भी
बोझ पलकों का उठाया नहीं जाता मुझसे

दरो-दीवार से इक शक्ल उभर सी आयी
बात करने लगा इक दिन मिरा कमरा मुझसे

उनका दुनिया में कोई नामो-निशां तक न रहा
वो जो कहते थे कि क़ायम है ये दुनिया मुझसे

क्या मिरे सर पे कोई सींग निकल आया है
कर लिया क्यों मिरे अपनों ने किनारा मुझसे

दिल से बेहतर न कोई जज है न हो सकता है
सोच तू ही तिरा कैसा है रवैया मुझसे

जो भी बनता था तिरा वो मैं अदा कर भी चुका
और कितना तू वसूलेगा किराया मुझसे

ऐब हो या कि हुनर ये तो जुनूं है मेरा
काम कुछ होता नहीं इसके इलावा मुझसे

मैं हूँ शायर कि मिरी बात असर रखती है
तुझको दुनिया में मिलेंगे न ख़लीफ़ा मुझसे

ज़ख़्म आयें तो ज़रा शाख़ हरी हो दिल की
दुःख सहा जाता नहीं आधा-अधूरा मुझसे

जुर्म गर मेरा सुनोगे तो हंसोगे तुम भी
ये कि मिलता था किसी शख़्स का हुलिया मुझसे

ये भी दिन हैं कि तुझे देखे महीनों गुज़रे
वो भी दिन थे कि नहीं होता था नागा मुझसे

आज तन्हाई की बाँहों से निकल कर भागा
‘साहिबो उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे’

इरशाद खान ‘सिकंदर’ 09818354784

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27 comments on “T-19/31 चाँद ख़ामोश, मुख़ातिब है सितारा मुझसे-इरशाद खान ‘सिकंदर’

  1. भाई इरशाद खान ‘सिकंदर’ की ये ग़ज़ल इस ज़मीन पर मेरी पढ़ी हुई तमाम गज़लो में सर्वश्रेष्ठ है –लेकिन ये मेरा व्यक्तिगत मत है और इससे सहमत होना ज़रूरी नहीं — बहरहाल मैं अपनी बात पर कायम रहूँगा !! ज़बान और भाषा का तो खैर कहना ही क्या !!!! बेशतर अश आर का मफ़हूम इतना गहरा और इतना स्वीकार्य है की स्पष्ट है की शाइर के दिल की धड़कन अवाम की नब्ज़ से हमआहंग है !!! बोझ पलकों का – दरो दीवार में पिनहा शक्ल – दिल का जज होना — (स्कैनर तो सच्चा है !!!) –किस किस शेर की कितनी तारीफ़ की जाय कम होगी –ग़ज़ल भाषा और भावभूमि पर ज़बरदस्त पकड को स्पष्ट इंगित कर रही है –इरशाद भाई !! दिली मुबारकबाद क़ुबूल कीजिये – मयंक

  2. हमेशा की तरह क्या उम्दा ग़ज़ल हुई है दादा

    बोझ कांधों पे अगर हो तो उठा लूँ मैं भी
    बोझ पलकों का उठाया नहीं जाता मुझसे

    वाह्ह्ह क्या कहने

    दरो-दीवार से इक शक्ल उभर सी आयी
    बात करने लगा इक दिन मिरा कमरा मुझसे

    उनका दुनिया में कोई नामो-निशां तक न रहा
    वो जो कहते थे कि क़ायम है ये दुनिया मुझस

    बेहतरीन ग़ज़ल
    सादर
    -कान्हा

  3. UMDA GHAZAL SIKANDAR SAAHAB,
    AGAR IS GIRAH KI ALAG SE DAAD NA DI JAAYE TO NAA-INSAAFI HOGI

    आज तन्हाई की बाँहों से निकल कर भागा
    ‘साहिबो उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे’

    HINDI ME;N KAHA JAAYE TO ”” SATEEK ”” GIRAH … WAAH WAAH
    ”GIRAH PAR KHOOB KHOOB DAAD”

  4. irshad bhai kamal ki ghazal hui hai. bharpoor daad. paDhne / sunne vale se bejhijhak bateiN batiyaatee baDhiya ghazal. jeete rahiye bhai.

  5. बोझ कांधों पे अगर हो तो उठा लूँ मैं भी
    बोझ पलकों का उठाया नहीं जाता मुझसे

    दरो-दीवार से इक शक्ल उभर सी आयी
    बात करने लगा इक दिन मिरा कमरा मुझसे

    उनका दुनिया में कोई नामो-निशां तक न रहा
    वो जो कहते थे कि क़ायम है ये दुनिया मुझसे
    आ. इरशाद सा. एक एक शेर गौहर है ,तमाम ग़ज़ल बेशकीमती है
    ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  6. सिकंदर साहब
    दरो-दीवार से इक शक्ल उभर सी आयी
    बात करने लगा इक दिन मिरा कमरा मुझसे
    क्या शेर है एक दम ताज़ा ताज़ा। …

    ज़ख़्म आयें तो ज़रा शाख़ हरी हो दिल की
    दुःख सहा जाता नहीं आधा-अधूरा मुझसे
    इस शेर पर ढेरों दाद !!!

  7. बहुत उम्दा गज़ल हुई है दादा
    हमेशा की तरह
    सभी शेर खुबसूरत
    दिली दाद कुबूल कीजिये

    प्रणाम सहित

  8. Irshad Bhai bahot achchi ghazal hui hai aapki, yeh sher kuch khaas laga baki se..

    दरो-दीवार से इक शक्ल उभर सी आयी
    बात करने लगा इक दिन मिरा कमरा मुझसे

    Mubarkbaad kubool kijiye!!

  9. irshaad bhai..bahut umdah ghazal hui hai.. aapke lahje ki chamak damak liye..kuch kahaniyon ke taraf ishara karte aur kuch sacchaiyon ki taraf ishara karte hue she’r… daad qubulen

  10. Irshad Bhai bahut sunder gazal kahi hai . Bahut bahut badhai.gazal ke sabhi sher lazabaw.

  11. Irshad Bhai bahut hi sunder gazal kahi hai bahut bahut badhai.Gazal ke sabhi sher lazabaw.

  12. जो भी बनता था तिरा वो मैं अदा कर भी चुका
    और कितना तू वसूलेगा किराया मुझसे

    Waah kya baat hai…

    ज़ख़्म आयें तो ज़रा शाख़ हरी हो दिल की
    दुःख सहा जाता नहीं आधा-अधूरा मुझसे

    Adbhut…

    Aise.khyalat aap hi ke ho sakte hain…waah

  13. Irshaad bhaai lajawaab kar diya is ghazal ne! Tarhi ki sabse achhi ghazlon me se ek. Ji chahta hai bas baar-baar padhta jaaun! salamat rahiye mere bhaai! Zindabaad!

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