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T-19/29 चाक चलता है मगर कुछ नहीं बनता मुझसे-तुफ़ैल चतुर्वेदी

चाक चलता है मगर कुछ नहीं बनता मुझसे
ख़ुद हुनर करने लगा है मिरा शिकवा मुझसे

अश्क में तैरती यादें ही रहेंगी मुझमें
फिर मिरे दिल ने गयी रात ये पूछा मुझसे

चाशनी घोल दी कड़वाहटें सच की न गयीं
और फिर बदला भी जाता नहीं लहजा मुझसे

मनअ करने से तिरे रास्ता मेरा न रुका
कर लिया देख शबे-हिज्र ने रिश्ता मुझसे

क़हक़हे, अश्के-मुसलसल, कभी बेवज्ह सुकूत
शह्र में होता है सौ-रंग तमाशा मुझसे

एक दरिया सा बहाया था कभी अश्कों का
लोग कहते हैं समंदर हुआ खारा मुझसे

मान ले लोगों की बात और उठा दे मुझको
जल गया है तिरी दीवार का साया मुझसे

ख़ुदकुशी करना भी आसान कहाँ है प्यारे
कह रहा है मिरे माथे का पसीना मुझसे

एक पत्ते सा बहा जाता हूँ उठता-गिरता
रूठ बैठा है ख़यालात का दरिया मुझसे

ये शराफ़त है रज़ीलों से न उलझा जाये
सो मैं ख़ामोश हूँ लड़ती रहे दुनिया मुझसे

मुझसे कट-कट के बिछुड़ते गये साथी लेकिन
एक नज़रीया मिरा अपना न बिछुड़ा मुझसे

तुफ़ैल चतुर्वेदी 9891841503

जिन मित्रों के पास मेरा नया नंबर न हो वो कृपया इसे नोट कर लें. ख़ाकसार ने पुराना नंबर बदल दिया है.

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15 comments on “T-19/29 चाक चलता है मगर कुछ नहीं बनता मुझसे-तुफ़ैल चतुर्वेदी

  1. चाक चलता है मगर कुछ नहीं बनता मुझसे
    ख़ुद हुनर करने लगा है मिरा शिकवा मुझसे
    मतला पहले भी पढ़ चुके हैं हम लोग और कहने की ज़रुरत नहीं कि ख़ूबसूरत मतला है

    अश्क में तैरती यादें ही रहेंगी मुझमें
    फिर मिरे दिल ने गयी रात ये पूछा मुझसे
    ज़िंदगी क्या है ये अहसास की रंगत बता देती है !! अश्क में तैरती यादें ही रहेंगी मुझमें———बेशतर शाइर इस अहसास से वाकिफ़ होंगे —

    चाशनी घोल दी कड़वाहटें सच की न गयीं
    और फिर बदला भी जाता नहीं लहजा मुझसे

    तू गर इश्क में बर्बाद नहीं हो सकता
    जा !! तुझे कोई सबक याद नहीं हो सकता
    मेरी आवाज़ सुनी जाय , सुनी ना जाए
    मेरा लहजा कभी फ़रियाद नहीं हो सकता –वाली आसी

    मनअ करने से तिरे रास्ता मेरा न रुका
    कर लिया देख शबे-हिज्र ने रिश्ता मुझसे
    विसाल नहीं तो हिज्र –कुछ तो मुहब्बत का रंग होता ही है

    क़हक़हे, अश्के-मुसलसल, कभी बेवज्ह सुकूत
    शह्र में होता है सौ-रंग तमाशा मुझसे
    कोई क़ैस कोई फरहाद कोई रांझा – शहर , अदब और मुहब्बत को सभी को फ़साने चाहिए इसलिए ज़रूरी है !!!

    एक दरिया सा बहाया था कभी अश्कों का
    लोग कहते हैं समंदर हुआ खारा मुझसे
    वाह !!!

    मान ले लोगों की बात और उठा दे मुझको
    जल गया है तिरी दीवार का साया मुझसे
    सानी मिसरा मजबूत है और शेर भी बहुत शानदार है !!

    ये शराफ़त है रज़ीलों से न उलझा जाये
    सो मैं ख़ामोश हूँ लड़ती रहे दुनिया मुझसे
    वक्त ने मुस्तकबिल में क्या लिखा –सिर्फ वक्त ही बतला सकता है !! इसलिए ज़िंदगी के जंगल से गुज़रते वक्त – कई रज़ीले -सियार तीतर और रात्रिचर
    बोलने की लियाकत बावजूद बोलते हैं तो उन्हें बोलने दिया जाय !!!

    मुझसे कट-कट के बिछुड़ते गये साथी लेकिन
    एक नज़रीया मिरा अपना न बिछुड़ा मुझसे
    एक व्यक्तिगत बात है ये –लेकिन सच है और इस के लिए प्रशंसा भी होती है आपकी !!!

    दादा !! जिस मन;स्थिति में आप इस वक्त है –उसके बावजूद बेहद उम्दा ग़ज़ल कही है आपने !! –मयंक

  2. बड़े दादा सादर प्रणाम…मत्ला कुछ वक़्त पहले ही पढ़ने को मिल गया था और अब तक उससे बाहर नहीं आ पाया हूँ…एक एक शे’र बेहतरीन और लाजवाब है..बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल ….बड़े दादा जिंदाबाद
    -कान्हा

  3. MOHTARAM TUFAIL SAHAB, AAP KI GHAZAL PADH KAR MUJHE APNE DAADA USTAAD PEER-E-MUGHAAN-E-KHUMKHAANA-E-SUKHAN, USTAAZIUL-ASAATIZA HAZRAT MAULAANA ”” NAATIQUE GILAUTHVI ”” (SHAAGIRD-E-DAAGH DEHLVI) KI EK GHAZAL KA YE MAQTA YAAD AA GAYA.

    SHER-GOYI NAYE ANDAAZ KI TAJDEED-E-KHAYAAL
    DEKHNA CHAAHE TO ”NAATIQUE” MIRA DEEWAAN UTHA

    ”MURASSA GHAZAL” KE LIYE BAHUT BAHUT ” MUBAARAKBAAD”

  4. baDhiyaa ghazal hui hai daadaa. matle ke ilaawaa paseene vaalaa sher bhi bahut khoob rahaa. bharpur daad.

  5. आदरणीय दादा,
    प्रणाम।

    इस ग़ज़ल पर क्‍या कहें। लुट गए हम।
    मतले से लेकर मक़ते तक कई अहसास छाए रहे।
    आहहहा। बहुत ख़ूब।
    सादर
    नवनीत

  6. बड़े भाई
    प्रणाम
    जहाँ से ये तरही शुरू अ हुई थी , उस में ये ग़ज़ल मील का पत्थर है

    चाक चलता है मगर कुछ नहीं बनता मुझसे
    ख़ुद हुनर करने लगा है मिरा शिकवा मुझसे
    इस मतले से आगे जाने को जी नहीं चाहता।

    चाशनी घोल दी कड़वाहटें सच की न गयीं
    और फिर बदला भी जाता नहीं लहजा मुझसे
    … हाय क्या अंदाज़े बयां है !!!!

    एक दरिया सा बहाया था कभी अश्कों का
    लोग कहते हैं समंदर हुआ खारा मुझसे
    मान गए बड़े भाई …… !!!

    एक पत्ते सा बहा जाता हूँ उठता-गिरता
    रूठ बैठा है ख़यालात का दरिया मुझसे
    सादर दंडवत !!!!!!

  7. चाक चलता है मगर कुछ नहीं बनता मुझसे
    ख़ुद हुनर करने लगा है मिरा शिकवा मुझसे

    एक दरिया सा बहाया था कभी अश्कों का
    लोग कहते हैं समंदर हुआ खारा मुझसे

    मान ले लोगों की बात और उठा दे मुझको
    जल गया है तिरी दीवार का साया मुझसे

    एक पत्ते सा बहा जाता हूँ उठता-गिरता
    रूठ बैठा है ख़यालात का दरिया मुझसे

    ये शराफ़त है रज़ीलों से न उलझा जाये
    सो मैं ख़ामोश हूँ लड़ती रहे दुनिया मुझसे
    आ. दादा तमाम ग़ज़ल खुबसूरत हुई है ,ऊपर के अशहार देर तक बिसाते-लब पर रक्श करते रहें |सादर बधाई

  8. Murassa Ghazal hi honi thi aur hui bhi, sabhi ash’aar kamaal haiN!! Mujhe apne sher hi yaad naheeN rahte lekin aapka Matla shayad hi maiN kabhi bhool paooN!!!
    Mubarakbaad dil ki gahraiyoN se kubool kijiye!!

  9. pranam dada..poori ghazal behad umda hai… matla to humne suna hi tha… kya hi accha matla hua hai…

    मनअ करने से तिरे रास्ता मेरा न रुका
    कर लिया देख शबे-हिज्र ने रिश्ता मुझसे
    kya hi umda she’r hua hai ye bhi dada…

    एक पत्ते सा बहा जाता हूँ उठता-गिरता
    रूठ बैठा है ख़यालात का दरिया मुझसे
    aur is she’r me jo image bani hai kamaal hai…. adbhut laga ye she’r mujhe… ji me aata hai chura lun… 🙂 dher saari daad dada….

  10. तुफ़ैल साहब, किस्‍तों में सैराब किया मगर ख़ूब किया
    पहले
    चाक चलता है मगर कुछ नहीं बनता मुझसे
    ख़ुद हुनर करने लगा है मिरा शिकवा मुझसे
    अश्क में तैरती यादें ही रहेंगी मुझमें
    फिर मिरे दिल ने गयी रात ये पूछा मुझसे
    फिर फ़ोन पर

    मान ले लोगों की बात और उठा दे मुझको
    जल गया है तिरी दीवार का साया मुझसे
    एक कमाल से रूशनास कराता ऐसा शै’र, और अब मुरस्‍सा ग़ज़ल। वाह वाह।

  11. दादा प्रणाम,

    मनअ करने से तिरे रास्ता मेरा न रुका
    कर लिया देख शबे-हिज्र ने रिश्ता मुझसे
    Waah….

    चाशनी घोल दी कड़वाहटें सच की न गयीं
    और फिर बदला भी जाता नहीं लहजा मुझसे

    Ye baat har koin nhi kah sakta….

    एक एक शेर उम्दा और बहुआयामी है….

  12. Manaa karne p tire raasta mera na ruka
    Kar liya dekh shab e hijr ne rishta mujh se

    Zinda baad…. Bhai ….. zinda baad…… Kya khoob.. Waah wah

  13. Tarhi me aapki ghazal ka hi intezaar tha Dada. Har she’r aapke khaas lahje ki numaaindagi kar raha hai! Aur matla to khair mere liye haasile-tarhi hi hai. Dili daad qubool ho Dada.

  14. waaaah, kis kis sher ki taarif karun, alfaaz kaasir nazar aa rahe hain, is murassa haseen ghazal ke liye tahe dil se mubarakbaad pesh hai

  15. दादा प्रणाम
    दादा क्या ही अच्छी ग़ज़ल हुई है ,सभी शेर निहायत खूबसूरत और मुकम्मल,कब से इंतज़ार था इस गज़ल का
    कहकहे ,अश्के मुसलसल,कभी बेवज़ह सुकूत
    शह्र में होता है सौ रंग तमाशा मुझसे
    क्या ही अच्छा शेर है वाह्ह्ह वाह्ह

    एक पत्ते सा बहा जाता हूँ उठता गिरता
    अदभुत मिसरा है
    रूठ बैठा है ख़यालात का दरिया मुझसे
    क्या कहने

    दादा पूरी की पूरी ग़ज़ल ही उम्दा है
    मन ही मन हर शेर दुहराये जा रहा हूँ

    दिली दाद कुबूल कीजिये

    प्रणाम सहित

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