28 टिप्पणियाँ

T-19/26 इश्क़ का रोग भला कैसे पलेगा मुझसे-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

इश्क़ का रोग भला कैसे पलेगा मुझसे
क़त्ल होता ही नहीं यार अना का मुझसे

गर्म पानी की नदी खुल गयी सीने पे मेरे
कल गले लग के बड़ी देर वो रोया मुझसे

मैं बताता हूँ कुछेक दिन से सभी को कमतर
साहिबो ! उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे

इक तेरा ख़ाब ही काफ़ी है मिरे उड़ने को
रश्क करता है मेरी जान परिंदा मुझसे

यक ब यक डूब गया अश्कों के दरिया में मैं
बाँध यादों का तेरी आज जो टूटा मुझसे

किसी पत्थर से दबी है मेरी हर इक धड़कन
सीख लो ज़ब्त का जो भी है सलीक़ा मुझसे

कोई दरवाजा नहीं खुलता मगर जान मेरी
बात करता है तेरे घर का दरीचा मुझसे

बुझ गया मैं तो ग़ज़ल पढ़ के वो जिसमें तू था
पर हुआ बज़्म की रौनक़ में इज़ाफ़ा मुझसे

प्रखर मालवीय ‘कान्हा’ 07827350047

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

28 comments on “T-19/26 इश्क़ का रोग भला कैसे पलेगा मुझसे-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

  1. गर्म पानी की नदी खुल गयी सीने पे मेरे
    कल गले लग के बड़ी देर वो रोया मुझसे
    शानदार शेर !!!!

    यक ब यक डूब गया अश्कों के दरिया में मैं
    बाँध यादों का तेरी आज जो टूटा मुझसे
    बहुत उम्दा !

    कोई दरवाजा नहीं खुलता मगर जान मेरी
    बात करता है तेरे घर का दरीचा मुझसे
    जान….. क्या बढ़िया उपयोग है शाबास…. !

  2. is ghazal meiN tazad kaa bhi achchha muzahira hai, shayar ko bahut bahut badhai. khush rahiye kanha.

  3. प्रखर मालवीय ‘कान्हा’
    ग़ुंचा-ए-नौ से बहारों का पता मिलता है। दुआ।

  4. इश्क़ का रोग भला कैसे पलेगा मुझसे
    क़त्ल होता ही नहीं यार अना का मुझसे || वाह वाह !!

    गर्म पानी की नदी खुल गयी सीने पे मेरे
    कल गले लग के बड़ी देर वो रोया मुझसे || वाह लाजवाब !

    इक तेरा ख़ाब ही काफ़ी है मिरे उड़ने को
    रश्क करता है मेरी जान परिंदा मुझसे || क्या कहने भाई वाह !!

    खूबसूरत ग़ज़ल पर मुबारकबाद भाई !!

  5. Prakhar bhaai bahut umda! Ab nikhaar par hai aapki ghazal. Bharpoor daad lijiye.

  6. गर्म पानी की नदी खुल गयी सीने पे मेरे
    कल गले लग के बड़ी देर वो रोया मुझसे
    wah, bilkul nae andaaz ka sher hai, kya kehne

  7. बेटे आपके कलाम के रंग-ढंग मुझे स्वप्निल के इब्तिदाई दौर की याद दिला रहे हैं. स्वप्निल के यहाँ ख़यालात का एक खौलता लावा सा बहता रहता था और वही ढब अब आपके यहाँ नज़र आ रहा है. जीते रहिये, अदब के सफ़र पर तेज़क़दमी से गामज़न रहिये. बढ़िया ग़ज़ल के लिये दाद

  8. इश्क़ का रोग भला कैसे पलेगा मुझसे
    क़त्ल होता ही नहीं यार अना का मुझसे
    इश्क़ इक आग का दरिया है और डूब के जाना है !! अना इसमे साथ नहीं चलती !!
    गर्म पानी की नदी खुल गयी सीने पे मेरे
    कल गले लग के बड़ी देर वो रोया मुझसे
    बहुत सुन्दर प्रतीक –गर्म पानी की नदी !!!
    यक्लख़्त आके आज वो मुझसे लिपट गया
    जो फासला दिलों मे था अश्कों मे ज़म हुआ !!
    मैं बताता हूँ कुछेक दिन से सभी को कमतर
    साहिबो ! उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे
    The greater ones conceit the lesser his ability — !!!
    किसी पत्थर से दबी है मेरी हर इक धड़कन
    सीख लो ज़ब्त का जो भी है सलीक़ा मुझसे
    अच्छा शेर कहा है !!
    कोई दरवाजा नहीं खुलता मगर जान मेरी
    बात करता है तेरे घर का दरीचा मुझसे
    वहाँ की खिडकियाँ कब मानती हैं
    कि उस घर से मेरा रिश्ता नही है -1 मुझे इक बन्द खिडकी ने बताया
    कोई मुझको भुलाना चाहता है -2 दरीचा बात करता है !! तस्लीम !!
    बुझ गया मैं तो ग़ज़ल पढ़ के वो जिसमें तू था
    पर हुआ बज़्म की रौनक़ में इज़ाफ़ा मुझसे
    दाद !! दाद !!
    ‘कान्हा’ कम समय मे आपने इस विधा मे अधिकार हासिल किया है !! और बुलन्दियाँ मिले आपको !! यही हम सबकी कामना है !! –मयंक

  9. Bahut achhii gazal huii hai Prakhar
    dher sari daad

    Alok

  10. मैं बताता हूँ कुछेक दिन से सभी को कमतर
    साहिबो ! उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे …

    बुझ गया मैं तो ग़ज़ल पढ़ के वो जिसमें तू था
    पर हुआ बज़्म की रौनक़ में इज़ाफ़ा मुझसे ..

    इन अश’आर के बाद कुछ कहने को भी रह जाता है क्या ? प्रखरभाई, बने रहिये. दिल खुश कर दिया आपने.
    शुभ-शुभ

    – सौरभ पाण्डेय
    नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

  11. गर्म पानी की नदी खुल गयी सीने पे मेरे
    कल गले लग के बड़ी देर वो रोया मुझसे

    मैं बताता हूँ कुछेक दिन से सभी को कमतर
    साहिबो ! उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे

    इक तेरा ख़ाब ही काफ़ी है मिरे उड़ने को
    रश्क करता है मेरी जान परिंदा मुझसे
    kanha ji bhut khubsurat gazal hui hai ,badhai swekaaren ,tarhi misara nayaab hai

  12. इश्क़ का रोग भला कैसे पलेगा मुझसे
    क़त्ल होता ही नहीं यार अना का मुझसे

    ……sundar matla

    गर्म पानी की नदी खुल गयी सीने पे मेरे
    कल गले लग के बड़ी देर वो रोया मुझसे

    ……waah

    मैं बताता हूँ कुछेक दिन से सभी को कमतर
    साहिबो ! उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे

    …achhi girah

    इक तेरा ख़ाब ही काफ़ी है मिरे उड़ने को
    रश्क करता है मेरी जान परिंदा मुझसे

    …….aaha

    यक ब यक डूब गया अश्कों के दरिया में मैं
    बाँध यादों का तेरी आज जो टूटा मुझसे

    किसी पत्थर से दबी है मेरी हर इक धड़कन
    सीख लो ज़ब्त का जो भी है सलीक़ा मुझसे

    …..patthar se dhadkan dabna…waah

    कोई दरवाजा नहीं खुलता मगर जान मेरी
    बात करता है तेरे घर का दरीचा मुझसे

    बुझ गया मैं तो ग़ज़ल पढ़ के वो जिसमें तू था
    पर हुआ बज़्म की रौनक़ में इज़ाफ़ा मुझसे

    Waah….waah….waah…har ek sher umda aur moti ki tarah ..kanha bhai….kya hi khoobsurat ghazal hui hai….aanand aa gaya….

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: