8 टिप्पणियाँ

T-19/23 क्या शबो-रोज़ महकते थे समां था मुझसे-नवनीत शर्मा

क्या शबो-रोज़ महकते थे समां था मुझसे
जब गयी रुत में हुआ नाम किसीका मुझसे

जी! मिरे साथ हैं कुछ ओस सी रातें लेकिन
आंख में बैठा ये सूरज नहीं ढलता मुझसे

दिन के ज़ख़्मों पे कोई जैसे लगा दे मरहम
यूं लिपटता है मियां शाम का साया मुझसे

ख़ार तसलीम हैं सारे ही तिरे आंगन के
ज़िन्दगी किसलिये करती है किनारा मुझसे

जिसके किरदार मुझे तोड़ रहे हैं अब तक
किस तरह होगा बयां ऐसा फ़साना मुझसे

ला मेरी जान ! उठा लूं मैं सलीबें तेरी
क्‍या किसी रोज़ कहेगा ये मसीहा मुझसे

ख़र्च कर ख़ुद को कई ख़ाब कमाये मैंने
अब वही छूट गया है मिरा हिस्‍सा मुझसे

दिल की वादी में सुलग उठता है जंगल कोई
जब चिपकता है तिरी याद का लावा मुझसे

रूह ज़ख़्मी है मगर होठ पे मुस्कानें हैं
सीख लो तुम भी महब्‍बत का सलीक़ा मुझसे

आज कुछ शाम ने भी रंग अजब घोला है
आज कुछ मैं भी हूं ऐ दोस्‍त ख़फ़ा सा मुझसे

था वो इक दौर कि जब दिल में धुनें बजती थीं
अब कोई साज़ बजाया नहीं जाता मुझसे

हमने मिल कर कभी तामीर किया था जिसको
अब लिपटता है उसी शह्र का मलबा मुझसे

नवनीत शर्मा 09418040160

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8 comments on “T-19/23 क्या शबो-रोज़ महकते थे समां था मुझसे-नवनीत शर्मा

  1. ख़र्च कर ख़ुद को कई ख़ाब कमाये मैंने
    अब वही छूट गया है मिरा हिस्‍सा मुझसे…kya gehra sher keh gae hain janaab, bahot khoob

  2. आज कुछ शाम ने भी रंग अजब घोला है
    आज कुछ मैं भी हूं ऐ दोस्‍त ख़फ़ा सा मुझसे

    नवीन यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही मुरस्सा है मगर इस शेर ने फ़िराक़ साहब के दो मशहूर-ज़माना शेर याद दिला दिये. मेरे नज़दीक ये बहुत बड़ी बात है.

    शाम भी थी धुआं-धुआं हुस्न भी था उदास-उदास
    दिल को कई कहानियां याद सी आ के रहा गयीं

    थी यूँ तो शामे-हिज्र मगर पिछली रात को
    वो दर्द उठा फ़िराक़ के मैं मुस्कुरा दिया

  3. वाह…नवनीत दादा….बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है…..एक एक शेर से ताजगी का अहसास….मेरा पसंदीदा शेर है:

    ख़र्च कर ख़ुद को कई ख़ाब कमाये मैंने
    अब वही छूट गया है मिरा हिस्‍सा मुझसे

  4. क्या शबो-रोज़ महकते थे समां था मुझसे
    जब गयी रुत में हुआ नाम किसीका मुझसे
    मुहब्बत इंसान को सँवारती और निखारती है !! मतले मे खुश्बू है मुहब्बत की !!!
    जी! मिरे साथ हैं कुछ ओस सी रातें लेकिन
    आंख में बैठा ये सूरज नहीं ढलता मुझसे
    अहसास कडवे हैं लेकिन उमीद की रोशनी भी साथ है !!!
    दिन के ज़ख़्मों पे कोई जैसे लगा दे मरहम
    यूं लिपटता है मियां शाम का साया मुझसे
    शाम तनहाई और ढलती उम्र की प्रतीक है !! शिकेब जलाली का शेर है
    जाती है धूप उजले परों को समेट के
    ज़ख्मो को अब गिनूँगा , बिस्तर पे लेट के
    जिसके किरदार मुझे तोड़ रहे हैं अब तक
    किस तरह होगा बयां ऐसा फ़साना मुझसे
    उनका ज़िक्र करना मुश्किल है जिन्होने इस फसाने का ज़िक्र मुश्किल कर दिया है !!
    ला मेरी जान ! उठा लूं मैं सलीबें तेरी
    क्याे किसी रोज़ कहेगा ये मसीहा मुझसे
    नहीं यहाँ अपना सलीब खुद ढोना पडता है !!
    ख़र्च कर ख़ुद को कई ख़ाब कमाये मैंने
    अब वही छूट गया है मिरा हिस्सां मुझसे
    बढिया शेर कहा है !!
    दिल की वादी में सुलग उठता है जंगल कोई
    जब चिपकता है तिरी याद का लावा मुझसे
    सिम्बल अच्छे चुने है !!!
    रूह ज़ख़्मी है मगर होठ पे मुस्कानें हैं
    सीख लो तुम भी महब्बठत का सलीक़ा मुझसे
    जिनके होंठो पे हँसी पाँओ मे छाले होंगे
    हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे
    आज कुछ शाम ने भी रंग अजब घोला है
    आज कुछ मैं भी हूं ऐ दोस्तघ ख़फ़ा सा मुझसे
    था वो इक दौर कि जब दिल में धुनें बजती थीं
    अब कोई साज़ बजाया नहीं जाता मुझसे
    खुद से बेपरवाही और वक़्त की सियाही मे घिरना ये तल्ख़ अहसास ज़िन्दगी दे ही जाती है एक वक़्त के बाद !!!
    हमने मिल कर कभी तामीर किया था जिसको
    अब लिपटता है उसी शह्र का मलबा मुझसे
    बहुत अच्छा शेर कहा है !!! एक शहर जिसमे कौमी यकज़हती और सुलहे कुल के मंज़र खूब मिलते थे उसके भग्नावशेष ही अब शेष है !! काफिये का सुन्दर इस्तेमाल किया है !!
    नवनीत भाई !! ग़ज़ल पर दाद !! सभी शेर पसन्द आये –मयंक

  5. Munfarid labo lahja, khyaal ki taazgi, khoobsurat ash’aar.. DheroN Mubarkbaad!!

  6. जी! मिरे साथ हैं कुछ ओस सी रातें लेकिन
    आंख में बैठा ये सूरज नहीं ढलता मुझसे

    दिन के ज़ख़्मों पे कोई जैसे लगा दे मरहम
    यूं लिपटता है मियां शाम का साया मुझसे

    ख़ार तसलीम हैं सारे ही तिरे आंगन के
    ज़िन्दगी किसलिये करती है किनारा मुझसे
    आ.नवनीत भाई साहब
    एक मुक़म्मल ग़ज़ल के लिए ढेरों बधाईयाँ स्वीकार करें |सभी शेर लाज़वाब हैं |ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  7. Bhaiya sadar Pranam. ..aapki ghazal ka muntzir tha kab se. ..Kya Kya behatreen ash’aar samete hai Ye ghazal. .Wahhhh ..

    जी! मिरे साथ हैं कुछ ओस सी रातें लेकिन
    आंख में बैठा ये सूरज नहीं ढलता मुझसे

    दिन के ज़ख़्मों पे कोई जैसे लगा दे मरहम
    यूं लिपटता है मियां शाम का साया मुझसे
    Kya Kehne. …

    जिसके किरदार मुझे तोड़ रहे हैं अब तक
    किस तरह होगा बयां ऐसा फ़साना मुझसे

    ला मेरी जान ! उठा लूं मैं सलीबें तेरी
    क्या किसी रोज़ कहेगा ये मसीहा मुझसे

    ख़र्च कर ख़ुद को कई ख़ाब कमाये मैंने
    अब वही छूट गया है मिरा हिस्सा मुझसे

    दिल की वादी में सुलग उठता है जंगल कोई
    जब चिपकता है तिरी याद का लावा मुझस

    Wahhh Wahhh ..daad

    -Kanha

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